पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७३२

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६४४ विश्वामित्र पिनष्ट होगा। भाप उनको उनके अभिलपित ब्राह्मणत्व ) ये दोनों ही विभिन्न समयमें महाराज सुदासके कुल- पर प्रदान कर जगत्का मङ्गल कीजिये।" । पुरोहित थे। यह पौरोहित्य पद उस समयके राजा ___ प्रमाने फिर विश्वामित्रके यहां जा कर उनसे | और ऋपि.समाजमै विशेष गौरव जनक और शक्ति- कहा,-"विश्वामित्र ! तुमने आज तपोयलसे ब्राह्मणत्य | साधक था। इसमें जरा भी सन्देह नहीं । लाम किया, अब तुम्हारा मङ्गल हो।" इसके बाद चिरा. ___समय आने पर यह परस्पर, आन्तरिक विद्वपके - भिलषित वर पा कर विश्वामित्र परम प्रसन्न हो कर कारण . परस्परको अभिशाप दे कर दोनों आपसमें ब्रह्मासे कहने लगे, "भगवन् ! यदि आज मैं ब्राह्मण्य शत्रु ता करने लगे। वसिष्ठने निश्वास त्याग कर विश्वा. और दीर्घायु लाम करने में समर्थ हुआ, तो चतुर्वेद, मित्रके सौ पुत्रोंको मार डाला। बदले में वसिष्ठके सौ भोङ्कार और वपटकारमें ब्राह्मणकी तरह मेरा अधिकार | पुत्रों को विश्वामित्रने भी शाप दे फर भस्मीभूत कर हो तथा ब्रह्मपुत्र पशिष्ठ मुझको ब्रह्मर्षि स्वोकार करें।"] दिया। पुराणों में यह घटना दूसरी तरहसे वर्णित की ___ विश्वामित्रके अन्तिम प्रस्तावकी मीमांसाके लिये गई है। विश्वामित्रने योगवलसे एक नरघातक राक्षस देवतामोंने घसिष्ठफे पास जा कर उन्हें सन्तुष्ट किया। को राजा करतापपादकी देहमें प्रवेश करा कर. उसके देवताओं के अनुराधसे प्रसन्न हो घसिष्ठने विश्वामित्रके द्वारा वसिष्ठके सौ पुत्रों को भक्षण करा दिया। विश्या साथ मित्रता स्थापित की और उनको ब्रह्मर्षि' कह कर | मित्रके शापसे पे सौ पुत्र क्रमान्यसे सात सौ जन्म ग्राह्मणत्व स्वीकार किया। दूसरी ओर विश्वामित्रने भी पतित चाण्डाल योनिमें जन्मते रहे। ब्राह्मण्यविभव प्राप्त कर वसिष्ठका यथोचित सम्मान ऐतरेयवाह्मणों लिग्ना है, कि इक्ष्वाकुवंशीय राजा किया । (रामायण ११५०.७० स्वर्ग) हरिश्चन्द्रने अपुत्रककी अवस्थामें एक बार प्रतिक्षा की इसके सिधा महाभारतमें दूसरी जगह लिखा है, कि । थी, कि जब मेरे पुत्र होगा, तो मैं वरुणदेवताको बलि- विश्वामित्रने सरस्वती नदीको आशा दो, कि तुम | प्रदान करूंगा। समय आने पर राजा माहयको एक वसिष्ठको मेरे यहां ला दो, मैं उसको मार डालूगा। पुत्ररत्न लाभ हुआ। राजाने उसका रोहित नाम सरस्वती विश्वामितको अवहेलना कर अन्य पथसे प्रवा रखा। कुमार दिनों दिन चन्द्रकलाकी तरह बढ़ने लगा। हित होने लगी। यह देख विश्वामित्रने सरस्वतीके कई तरहफे छलसे राजा बहुत दिनों तक प्रतिक्षा रक्षा में जलको रक्तवर्ण बना दिया । सरस्वती वसिष्ठको | निश्चेष्ट रहे। इधर रोहित पितृप्रतिक्षा रक्षासे आत्म. विश्वामित्रके निकटसे दूर ले गई। वलिदान करना अस्वीकार कर छः वर्ष तक जंगल महर्षि विश्वामित्र और ब्रह्मर्षि वसिष्ठमे बहुत दिनों | जंगल घूमता रहा। कालकमसे अजीगरी नामक एक तक जो प्रतियोगिता चल रहो थी, वह क्षत्रिय-जीवनमें ऋपिसे उनको भेट हो गई। उन्होंने १०० गो दे कर उनके ब्रह्मण्यविरोधका श्रेष्ठतम परिचय है। इस घटनाको पदले में ऋषिके मध्यम पुत्र शुनःशेफको खरीद लिया। बहुतेरे अपने अपने समाजके श्रेष्ठ प्रति-पादनार्धा ब्राह्मण रोहितने शुनाशेफको पिताके सम्मुख बड़ा कर दिया। और क्षत्रियका विरोध अनुमान करते हैं। ऋग्वेदमें वरुणदेवने रोहितके बदले में शुनाशेफको प्रहण करनेको भी इसका बारम्बार उल्लेख है। ऋग्वेदमें दोनों ऋषियों- खीकार कर लिया। ऋषितनय बेदमन्त्रों से स्तुति का हो श्रेष्ठत्व निरूपित हुआ है। विश्वामित्र तृतीय कर देवोंको सन्तुष्ट कर आत्मरक्षा करने में कृतकार्य मण्डलके गायत्रीयुक्त मन्त्रोंक द्रष्टा और वसिष्ठ! हुएं और विश्वामित्रने उसको प्रहण किया। हरिश्चन्द्रः. 'सप्तममण्डलके मन्नद्रष्टा ऋषि कहे जाते हैं ।। के इस यज्ञमें विश्वामित्र ऋपि पुरोहित थे। ऐतरेयव्राह्मणके ११६ मन्त्रको पढ़नेसे मालूम

* महामारत भादिपर्व १७५ अ० और १८६ में विश्वा- होता है, कि राजा हरिश्चन्द्र के राजसूय यशकालमै

मित्र और वसिष्ठके परस्पर विरोधकी बात है। } विश्वामित्रने स्ययं होताका कार्य किया था,--"तस्य ह