पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७३४

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.६४६ विश्वामित-विभ्यावत. महाभारत आदिपर्घ १७६ अध्यायसे हम जान सकते विश्वामित्रकपाल ( स०सी०) नारिकेलका स्वर्पर, नारि. हैं, कि विश्वामित्रने इक्ष्वाकुघंशीय राजा कल्मापपादके। यलका खोपड़ा । (रसेन्द्रमा० स०) पौरोहित्यमें व्रती होनेको इच्छा की, किन्तु राजाने विश्वामितप्रिय ( स० पु. ) विश्वामित्रस्य प्रियः । घसिष्ठको मनोनीत किया था। इस पर विश्वामित १ नारिफलवृक्ष, नारियलका पेड़ । (शब्दरत्ना०) फ्रोधित हो कर वसिष्ठके घोर. शनु हो उठे। एक वार २ कार्तिक । राजाज्ञा अबहेलगाके लिये पसिष्ठपुत्र 'शपित्रविको विश्वामृत (स.नि.) घिश्यममृतयसि जीपयसि । मारा। इस पर ऋपिपुत्रने अमिशाप दिया, "राजा | विश्वका जीवनकारी। राक्षस होगा।" विश्वामित्र इस अवसर पर राजाने विश्वायन (सं० त्रि०) १ साक्ष, जो विश्वको सब बातें शरीरमें एक राक्षस प्रवेश करा कर सिद्धउद्देश्य सिद्ध कर | जानता हो । २ सातगामी, सति विचरण करनेवाला ।' उस स्थानसे चले गये। पहले ही शक्नि राजा द्वारा ३ विश्वात्मन, ब्रह्म। . मुक्त हुए। इस तरहसे वसिष्ठफे सभी पुत्र विश्वा. विश्वायु (स. त्रि०) सर्याधिपति, सोंके मालिक, सभी मित्रको आशासे मक्षित हुए थे। मनुष्यों के ऊपर जिसका आधिपत्य है। (ऋक १४२१) ___पुराणमें विश्वामित्रके योगबलका यथेष्ट परिचय | विश्वायुपोपस् ( स० वि०) जोयनकाल पर्यन्त देवादि. मिलता है। और तो क्या उन्होंने ब्रह्माकी तरह द्वितीय का पोषक, यावज्जीवन उपभोग्य । (भूक १७६IE) . स्वर्गको सृष्टि कर स्वयं महत्व प्रचार किया है। किंवदंतो विश्वायुयेषस (स० वि०) सर्वागतवल, सर्जन वलीयान् ।। है, कि नारियल, सहिजन आदि कई पक्षको सृष्टि विश्वा 'अग्नि विश्वायुवेपस मर्या न घाजिन हित। मित द्वारा हुई थी। महर्षि विश्वामित्रका अध्यवसाय '. . (शक ८४३३२५) . चर्मनिदर्शन हैं। यसिष्ट शब्द देखो। 'विश्वायुपेपस सर्वागतयलमनि' (सायण) । २ आयुर्वेद पारदर्शी सुश्रु तके पिता । । विश्यायुस (सं०नि०) इण गतौ विश्व-इ-उस भावे णिच ' "अय शानदृशा विश्वामित्र प्रभृतयोऽविदन् । (उण् २।११६) इति उस् । १ च्याप्तगमनशील, सर्गवगामी । अय' धन्यन्तरि: काश्या काशिराजोऽय मुच्यते ॥ "पादिसदमिद्विश्वायु" (ऋक १।२७३.) .. . विश्वामित्रो मुनिस्तेषु पुत्र सुथ तमुक्तवान। ' 'हे आने विश्वायुर्थ्याप्तगमनः स त्य'। (सायण) वत्स ! वाराणसी गच्छ व विश्वेश्वरवल्लभाम् ॥" २ समिक्षक। (भावप्र.) • "विश्वायुरग्ने गुहा गुहं गाः।" (ऋक १६६) विश्नस्मिन् नास्ति मित्रं यस्मात् । ३ परममित्र, 'हे भग्ने विश्वायुः विश्व सर्वमायुरन्नं यस्य स त्वम् ।' सारे विश्वमे मोपरि मित्र । (सायण) "जनके नाभिरामाय ददौ राज्यमकपटकम् । विश्वाराज ( स०नि०) विश्वेषु राजते यः विश्वेषां रार विश्वामित्र पुरस्कृत्य वनवास' ततो ययौ ॥" (उ राजा इति धा। (वोपदेव ) विश्व-राज-क्किप विश्वस्य विश्वामित्र-राहुचार नामक ज्योतिर्मन्धके प्रणेता। घसुराटोः इति दीर्घ (पा ६ः३३१२८) हलादायेवात्त्यमन्यत्र विश्वामिननदो (सं० स्त्री०) विश्वामित्रा नामकी नदी।। विश्वराजावित्यादि। १ सर्वशासयिता, सबके ऊपर । (भारत भीष्म०) शासन करनेवाला। (तैत्ति०स० १।३।२।१) विश्वराज देखो । ३ परमेश्वर। .. .. विश्वाक्टव (सपु०) एक विश्वस्त राजानुवर। • * कोयीतकीबाझगाके ४थे अध्यायमें वसिष्ठने "हतपुत्रोंकी . ' (राजतर० १६१८) पुनः प्राप्तिको कामना" कर पसिष्ठ यज्ञ किया। पञ्चविशवाझपमें विश्वाय -मनोरथका पुत्र । शृङ्गार, भृङ्ग, अलङ्कार भी वसिष्ठ पुत्रहतः' कहे गये हैं। :- - ... | और मल नामक इनके चार विद्वान पुत्र थे।