पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७३७

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विश्वेश्वर-विष इनके सिवा बल्लाल दर्गाके लादेशसे इन्होंने कायस्थ | विश्नकसार (स की० ) काश्मोरके पफ पवित्र तीर्थ- धर्म-दीप या कायस्थ-धर्मप्रकाश या कायस्थपद्धति नामक क्षेत्रका नाम । ( राजतर० ५।४४)। पक अन्य लिखा था। इनका बनाया हुमा जातिविवेक विश्वौजस् ( स० वि०) व्याप्तवल । नामक एक दूसरा अन्य कायस्थपद्धतिका प्रथम भाग । (भृक् १०५५।८ सायण) है। इनके पिताका नाम दिनकर और पितामएका नाम विश्वोपत्र ( स० स० ) विश्व पामापधम् । शुण्ठी, रापरुष्पा था। पिता दिनकरने अपने नाम पर दिनकरी । साँठ। ( राजनि०) द्योत प्रन्ध लिखना मारंभ किया, परन्तु वे अपने जीवन । विश्व्या : म क्लो० ) सनत्र, सब जगह। कालमै उसे समाप्त न कर सके, शेषाङ्क विश्वेश्वरने । (ऋक २१४ ) समाप्त किया था । निरूढ़ पशुवन्धप्रयोगमें इन्होंने : विष (सं० क्लो०) विषक। १जल ( अमर ) २ पाकेशर स्वस्त आपस्तम्यपद्धतिका उल्लेख किया है। ये गागा (अमरटोकामे रायमुकुट । ३ मृणाल । ४ आमको कोदो। मट्ट, नामसे मी प्रसिद्ध थे। इनके भतीनेका नाम ५यत्सनामविप । (पु०को०) ६ सामान्य विष । (राजनि०) कमलाकर था। पर्याय,-क्ष्वेड़, गरल, माहेय, ममृत, गरद, गरल, कालकूट। विश्वेश्वर भट्ट मौनिन्-एक कथि। कयीन्द्रचन्द्रोदयौ । कलाकूल, हारिद्र, रक्तङ्गिक, नील, गर, घोर, हालाहल, इनकी रचनाका उल्लेख है। हलाहल, गिन्न, भूगर, जाङ्गल, तीक्ष्ण, रस, रसायन, विश्वेश्वर मिश्र-एक सुपण्डित । विरुदायलोके प्रणेता | गरजङ्गल, जागुल, काकोल, यत्सनाम, प्रदीपन, शोलिक- रघुदेवके पिता।

केय, ब्रह्मपुत्र । (रत्नमाना)

विश्वेश्वर सरस्वती-१ प्रपञ्चसार-स'पदफे प्रणेता गोर्या- अमरकोपके पातालयमें विप विषयमें नौ प्रकार के णेन्द्र सरस्वतीके गुरु और अमरेन्द्र सरस्वतीके शिष्य । भेद निर्दिष्ट हुप हैं- २ कलिधर्मसारसंग्रह, परमहंसपरियाजक-धर्म-संग्रह "पुसि क्लीवे च काकोलकासकटहलाइताः । यतिधर्मप्रकाश, यतिधर्मसमुच्चय, यत्याचारसग्रहीय. सौराष्टीकः शौकिकेयो ब्रह्मपुत्रः प्रदीपनः ।। यतिसंस्कार-प्रयोग गादि प्रन्योंके प्रणेता। ये सर्व दारदो यस्सनाभश्च विणमेदा अमी नम ॥" (अमर) विश्वशरके शिष्य भोर गोविन्दसरस्वतीके प्रशिष्य तथा इसके सिवा हेमचन्द्रमें भी विप विषयमें बहुतेरे भेद मधुसूदन सरस्वती और माधव सरस्वतीके गुरु थे। दिखाई देते हैं। नीचे विपके नाम, लक्षण और गुणा. इनका दूसरा नाम विश्वेशरानन्द सरस्वती भी था। गुणके रिपेयमें संक्षिप्त मालोसना की जाती है। ३महिम्नस्तबटीका प्रणेता। विषके नाम भौर सक्षय । विश्वेश्वर सूनु-रुद्रकल्पतरुमिवन्धके रचयिता। भावप्रकाशके पूर्वबएडमें लिखा है, कि विपके पर्याय विश्वेश्वरस्थान ( स० झो०) विश्वेश्रस्य स्थानम् ।। दो हैं-गरल और श्येड़। इसके नौ मेद हैं, जैसे- विश्वेश्वरका स्थान, काशीधाम । 'स्वयं विश्व श्वर इस | यस्सनाम, हारिद्र, शक क, प्रदीपन, सौराष्ट्रिक, ङ्गिक, स्थानमें विराजमान हैं, इस कारण काशीधामका नाम कालकूट, हालाहल और ब्रह्मपुत्र। जिस विषवृक्षका विश्वेश्वरस्थान पड़ा। पत्ता निशिन्दाके पत्तेकी तरह है, मारुति-पत्सको नाभि विश्वेश्वरानंद सरस्वती-विश्वेश्वर सरस्वती देखो। को सदृश है और जिसके निस्टयती अन्याग्य वृक्षलनादि विश्व श्वराम्बु मुनि-सुदीपिका नामको सारस्यतटीका- निस्तेज हो यथोचित वृद्धि प्राप्त हो नहीं सकते उसको (व्याकरण) के प्रणेता। ये ब्रह्मसागरके शिष्य थे। वत्सनाभ कहा जाता है। दारिद्र--इस विषवृक्षका मूल विश्व श्वराश्रम-तर्कचन्द्रिका रचयिता । कोई कोई तक- हरिद्रा (हल्दो) के मूलकी तरह होता है । शुफ्तुक-यह दपिकाफे प्रणेता विश्वनाथाश्रमको तथा इन्हें एक ही विषरक्षको गांठोंका घिचला भाग शपतुफ या मत्तूकी तरह व्यक्ति समझते हैं। | चूर्णपदार्थो से भरा रहता है। प्रदीपन-यह विप लोल Vot xxI. 103