पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७४

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१२ वातव्याधि तथा मुक्के मारनेको तरह दर्द होता है और निश्चल हो । लेना चाहिये। भौजनके लिये पुरानी मुगको दाल, एक .. जाता है। औरसाठी चायलका भात हितकर होगा। गन्ध सृण, हरी "

. कुपित वायु यदि मैदाधातुमें मिल जाये तो मांसगत दकी, सोंठ और पुष्करमूल सघ मिलाकर २. सोले, जल :

बायुःसा लक्षण होता है। विशेषता यह है, कि शरीरमें । माघसेर, शेप आध पाव; विल्य, गुड़च, देवदार और सोठ-.. फाड़ा हातागार थाढ़ा वेदना होता है। ये सब मिलाकर दे तोले, जल आघ सेर, शेष आप पाया, '. . . .फुपित यायु अयिका यदि आश्रय ले, ते। अस्थि । अतिविपा, पीपल और विटलवण-पेसप दो तोले, जल , . और उंगलियां पर्यो में येदना, शूल, मांसक्षय, वलहास आध सेर, शेष आंध पाग---यह तीन प्रकार का मामवा' . तथा अनिद्रा होती है और शरीरगे हमेशा दटे रहता है। में विशेष उपकारी होते हैं । सिया इनके चिरैता, इन्द्रयय, . कुपित वायु यदि मजा आश्रय करे तो ऊपर जैसे हो आंकनादि, 'फुटको, भातश्च और हरोतको(योगोइन सब लक्षण दिखाई देते हैं और यह किसी तरह माराम नहीं । द्रयों में प्रत्येक माध माघ तोला मिला फर-अच्छी तरह होता.। चूर्ण कर, इस चूर्ण को माघ तोलाले करगर्मामोसे मेघन कुपितघायु घोयंगत होनस योर्य जल्द गिरता है या करना चाहिये। इसके सेयनसे आमाशयगत घायु बिदू तामन करता है। त्रिोंके भामगर्भपात या गर्भ शुष्क होता है। शुकको विकृति होती रहता है। रित होती है। यह भीषध छ। दिन तक माना चाहिये। । स्वगत वायुरोगमे स्नेह मर्दन और स्वेद प्रयोग ये औषध एक साथ न कूट पीस कर दूसरी रोतिसेगी । विशेष उपकारी है । रक्तमें प्रवेश किये वातरोगमें शातल सेपन की जा सकती हैं। इस प्रस्पेक भाध तोला औषध . अनुलेपन, विरेचन, रक्तमोक्षण, मांसाधित यात विरेचन को अलग अलग छः दिनों तक संवन किया जा सकता: मौर निरूहवित्ति प्रदान, मस्थि और मजागत वात में है। यदि ऐसा करना है। अर्थात् पृ पृथक सेयन करना देवके भीतर और बाहर स्नेहका प्रयोग विशेष उपकारक हो तो पहले दिन यमनको दवा ले के कर लेना चाहिये। होता है। शुक्रगत वायुके प्रशमनके लिये मनको प्रस. इसने दूसरे दिन से घा लेना मारम्भ करना आवश्यक . न्नता, सम्पादन और हृदयप्राहा अनि पानीय, बलकारक है। पहले दिन चिरैताका, दूसरे दिन इन्द्रयय, तासरे दिन और शुक्रजनक द्रव्य संधन करना उचित है। | आफनादिका चूर्ण फासे सेवन करना उचित है। यह छः - स्थानविशेषको वातपाधिका विषय कहा जाता है। दिनों तक संघन करना पड़ता है, इससे 'पटकरण पाग दुपितवायु कोष्ठसमूहमें यदि अवस्थानं करें ते। मलमूत्र भी कहते हैं। . : : ... को रोकता है और वध्न, हृद्रोग, गुल्म, अश (यवासीर) पछाशयगत यायुके लक्षण -दुपित घायु अब पका- मोर पाश्वशूल पैदा करता है। आमाशय, अग्न्याशय, शयमे पहुँच जाती है, तो पेट में गढ़ गढ़ शम्द होने . पकाशय, मूत्राशय, रकाशय, उन्द्रक भोर फुस्फुस इन्हीं लगता है, दर्द, वायुको क्षुब्धता. 'मूत्रकृच्छ, मलमूत्र की सयोंको कोष्ठ यो फोठा' कहते हैं। इन्ही कोठोंम समाई | Rध्यता (सकायट); मानाद, और स्थानमें दर्द होता दुईयायुका ऊपरो निदान घतलाया गया है। इसके | इस यातय्याधिमे 'अग्निवृद्धिकारक और उदरावर्तनांशक .. 'प्रत्येकका लक्षण कहते है।" .. .. क्रिया करनी होगी । इसमें स्नेहविरैचम भो ' .

- भामाश्रय आधित पातमें दुषित वायू माशपमें 'हितजनक है। उदरंगत यान में क्षार और चूर्णादि भग्निः ।

समाजाने पर हदय, पाश्य उदर पोर नाभिदेशमै येदना, | प्रदीपक द्रष्य भी सेषनीय है। कांख या मिगत बातमें । तृष्ण, उद्गार याहुल्य, यिसूचिका ('इजा') खांसी, भएठ सोंठ, इन्द्वयप और चिरैताका चूर्ण जरा सुमसुमा . शाप और दमा रोग उत्पन्न हो जाते हैं। नाभि मौर गर्म ) जलफे साथ सेवन करना चाहिये। . . . स्तन इन दोनों के वोचके स्थानको भमाभाशय कहते है। गुहागत ग्रासके लक्षणे - गुह्यगत बातमें मल 'मोर - । भामाशयगत यायुमें पहले लंघन, पोछे अग्निदोप्ति यातकर्माका अवरोध, शल, उदरामान, आश्मरी (पथरी) कारक मार-पाचक भोपध और यमन या तीक्ष्ण यिरेवन गौर शर्यरी (चीनी) उत्पन्न होती है और जंघा