पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७४०

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विप चाफ्य, चेष्टा और मुखको विवर्णता आदि लक्षण देख । • दूषीविष। कर विपदाता शल को पहचान लें। | . स्थायर और जङ्कम ये दोनों तरहफे विष 'जीर्णत्व देश, काल और पात्रभेदसे सपिपका मसाध्यत्व। आदिके कारण दूषीविष कहलाते हैं। जो विप .. पीपल-वृक्षके नीचे, श्मशान, वक्ष्मीकके ऊपर गौर | अत्यन्त पुराना है, विपन्न औषध द्वारा भी. वीर्यः चतुष्पथ-इन सय स्थानों में, प्रभातम और संध्या समय, | होन या दावाग्नि वायु और धूप भादिक शोषणसे भरणी और मघा नक्षत्रमें तथा शरीरक चर्मस्थानमें निवीर्य, अथवा जो स्वभावतः ही दश गुणों में एक, दो, . दंशन करनेसे यह विप असाध्य होता है। दव्योंकर | तीन गुणहीन है, उसको दुपीविप कहते हैं। दूपी यिष . नामक एक जातिके सर्प होते हैं, ये सर्प चक्र लागुल, अल्पवार्य है, इससे यह प्राण नष्ट नहीं करता; किन्तु फफा फणधारो और शीघ्रगामी हैं। इनके विपसे शीघ्र ही । नुबन्ध हो कर बहुत दिनों तक शरीरम अवस्धान करता प्राण विनष्ट होता है। ये मेघ, वायु और उष्णताक है। दृषीविष-प्रस्त मानव मलभेद, भ्रम, गदगद धापय, संपेगिसे द्विगुण तेजोयुक्त होते हैं। के और विरुद्ध चेष्टा के कारण नाना तरह के फ्लेश होते. ऊपर जो कहे गये, उनको खाई और भी कई प्रकार- । है । शरीरके किसो स्थानमें इस दुपोविपके रहनेसे के असाध्य विप हैं । उन सब तरहक विपोंसे प्राण | शरीरमें विभिन्न प्रकारफे रोग और उपद्ध होते हैं । शीत- संहार अनिवार्य है। अजीर्ण-प्रस्त, पित्तात्मक, रौद्र- में और वातवर्पास कुल दिनको दूपीविष प्रकुपित होता पीड़ित, पालक, वृद्ध, क्ष धित, क्षीण, क्षताभियुक्त, मह । है। दूषोविध प्रकोपले पहले निद्राधिक्य, देहकी गुरुता' और कुष्ठरोगाक्रांत, रुक्ष और दुयल व्यक्ति या गर्भिणी इनके शरीरमें विष प्रवेश करने पर किसी तरह प्रशमित और शिथिलता, भाई, रामदर्श तथा शरीरमें वेदना नहीं होता। उत्पन्न होतो है । दूपीविष प्रकुपित होने पर अन्न । भचिकित्स्य विष्ण-पीडितके लक्षण। • भोजन करने में मत्तता, मपाक, अचि, गानमै मण्डला. शस्त्र द्वारा क्षत होने पर भी जिसको देहसे रक्तक्षरण • कृति कोढ़को उत्पत्ति, मांसक्षय, हाथ और पैरमें सूजन नहीं होता, लता द्वारा मारने पर भी जिसको देवमें लताक के, अतिसार, श्वास, पिपासा, ज्या तथा उदरी या चिह्न निकल नहीं पाता या शीतल जलसे स्नान कराने } उदररोग बढ़ता है। पर जिसके शरीरके रोंगटे खड़े नहीं हो जाते, ऐसे विप- कृत्रिमविष। पीड़ित व्यक्तिको चिकित्सक त्याग कर दें। जिस गर और दूपोषिपभेदसे कृत्रिम विप दो तरहका है । विषपीड़ित व्यक्तिका मुख स्तब्ध, केश शातन, नासिका | उनमें दूषोविपमें विष संयुक्त रहता है। किन्तु गरविष- वक, भोया (गरदन) धारणशक्तिहीन, दए स्थानको में वह संयुक्त नहीं रहता। त्रियाँ अपने मतलव गांउने. सूजन रक्तमिश्रित गौर काली तथा दोनों घुटने सटे हो के लिये पुरयों को स्वेद, रजा या अन्यान्य असत मल, वह रोगी भी परित्याजा है । जिस विषपीड़ित रोगी अन्न गादिके साथ गरविष विला देती है गीर शत, के मुखसे गाढ़ी राल, मुख, नासिका, लिङ्ग और गुह्यद्वार |· द्वारा भी ऐसा विष खिलाया जाता है । गरविष देहमे आदिसे खून गिरता हो भौर सपने जिसे चार दांतोंसे १. प्रवेश करने पर देह पाण्डुवर्ण गौर कृश हो जाती है। काटा हो, ऐसे व्यक्तिको चिकित्सा निष्फल है । जो विप परन्तु मन्दाग्नि, उदर, प्रहणी, यक्ष्मा, गुल्म, धातुक्षय, पीड़ित व्यक्ति उन्मादकी तरह घोलता हो, ज्वर और आंत- ज्वर और इस तरह कई प्रकारको रोग कमसे उपस्थित सार आदिक उपद्र्यसं जिसको देह आक्रांत हो, जो यात विचिकित्सा नहीं कर सकता हो, जिसका शरीर काला हो गया हो | और जिसके नासाभङ्ग मादि अरिष्ट लक्षण सम्यकपसे ____ इस समय संक्षेपमें विषकी चिकित्साका विषय परिस्फर हो चुके हों, ऐसा रोगी भी चिकित्साके योग्य वर्णित किया गया. । सबसे पहले. स्थावर विषकी नहीं। चिकित्साके, विषय . पर कुछ लिखा जाता है।