पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७४३

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६५५ देहतन्तुकं अपचय कर विष समूद । चहारदीवारी बहुत कमजोर हो जाती है। अत: वहाँ - इस श्रेणोफे सब घिपोंमें पारय (पारा ) घरित द्रव्य | "शामकपम्प" व्यवहार करना युक्तिसंगत नहीं। स्निग्ध. ही सबसे पहले उल्लेखनीय है। इसके सिवा सल कारक पानीप, वालोंका जल और अफोम घटित क्यूरिक एसिड, नाइट्रिक पसिष्ठ, दाइसोकोरिक एसिड, औप? हा प्रयोग करना कर्तव्य है। भिन्न भिन्न विषम माकोलिक एसिड, कार्यनिक एसिड, पोटाश, भिन्न भिन्न प्रकारका द्रव्य विपचिकित्सा व्यवहत सोडा, पमानिया, याइसलफेट भाव पोटास, फटकारी, होता है। यद्यपि इस श्रेणोफे समी विषों में हो प्रायः पएटमनो, नाइट्रेट आच सिलयर और शार पदार्थाने एक समान लक्षण दिखाई देते हैं तथापि विष द्वग्य- विविध कार्वनेट समूह भी हम श्रेणीके अन्तर्गत हैं। । विशेष चिकित्सा द्रष्यादि और प्रयोग प्रकार स्वतन्त 'इम विषों द्वारा देव विषाक्त होने पर निम्नलिखित पर्णित हुए हैं। नोचे कई प्रधान और प्रचारित विष. लक्षण दिखाई देते हैं। किसी पदा के गलेके नीचे द्रयों की चिकित्सा प्रणालीका उल्लेख किया जाता है-- जाते हो मुममें, मुखगहरके नीचे तालुमें, और आमाशय ! (१) करोसिव सपलिमेट-सको संस्कृत और में भारयन्त जलन पैदा होती है। मामसे यह जलन सारी | हिन्दोमें रसक कह सकते हैं। किन्तु रसकर मतड़ियों में फैल जाती है। इसके बाद दुनिघार्य धमन- विशुद्ध करोसिय सवलीमेट नहीं है। इसमें बहुत परि- का उपप दिखाई देता है । खनिज पसिन अपया णाममै कालोमेल मिला रहता है। आयुर्वेदीय किसी माफ जालिक पमिह सेपन फरनेसे सो के होती है, उसी किसी औषध रसकपूरका प्रयोग देखा जाता है। कैसे निकले पदार्थ पका घरको सतह पर पडनेसे उमसे । जारफे रसकपूर, कालोमेल और करोसिय सव पसिाकी क्रिया तुरन्त दिखाई देती है। अर्थात् इस लोमेटके परिणामको स्थिरता नहीं है। किन्तु इसमें स्थान पर युद्दा उठता रहता है। इस यमनमें भी जव करोसिय सयलोमेटका परिणाम अधिक रहता किमी तरह शान्तियेोध नहीं होता। के-के साथ रन- है, तब इस पदार्थाका अल्पमात्रामें व्यवहार करने पर भी कणा भी दिखाई देती है और तो फ्या, अभयहानलीका भयानक विपलक्षण दिखाई देता है। पाश्चात्य गान इस विषमे अपनित हो कर उसको झिल्लियों तक चिकित्सा शास्त्र में भी करोसिव सबलीमेट विविध विश्लिष्ट और विच्युत होता है और यान्त पदार्थके साथ' रोगों में दामाज पारलोराइस नामसे व्ययत होती मिल जाता है। यायुमें दराधमान होता है। उदरके। है। इसकी माला एक प्रेनके ३२ भागसे १६ भाग-तक ऊपर हाथ फेरना भी रोगोको असह्य हो . उठता है। है। किन्तु रसकर ८प्रेन मात्रा तक व्यवहत होता भयर ज्वर होता है। मुम्बके मांस , आदिम गनेक है। रसकपूरमें हाइमा पारलौराकका भाग अपेक्षा- स्थल में स्पष्टतः क्षत दिखाई देते हैं। विपका परिमाण! कृत अनेक कम रहनेसे रतनो मात्रा व्यवहत हो सकता अधिक रामेस थोड़ी दी दरमें रोगीको मृत्यु हो जाती है।। है। एक प्रेन करोसिव सवलीमेट सेवन करनेसे मनुष्य- सन्द मृत्यु म होने पर भी मुख में और साड़ियों में क्षत। की मृत्यु होती देखा जाता है। इसकी प्रतिपेधक औषध हो निदारुण यातनाका लश भोग करते करते अनशनसे विम्य या अण्डेका राल-पदार्थ है। हिम्बकी राल-जलों हो रोगीकं दुःखमय जीवनका भात होता है। घोल कर तुरन्त सेवन करानेसे विष शोधित नहीं हो चिकित्सा। सकता। प्रचुर परिमाणसे पुना. पुनः हिम्बको राल इन सब विपपीड़ित रोगीको चिकित्सा सबसे सेयन फरा कर यमनकारक मोपधों द्वारा घमन कराना पहले मन्वनाली गौर आमाशयको धो डालनेकी वडी | उचित है। जरूरत है। इसीलिये पाश्चात्य चिकित्सकगण मुका. (२) खनिज पसिर-सालपरिक, माइट्रिक मल माइफेन नलिका यत्र के द्वारा आमाशय धो डालने. हाइड्रोक्लोरिक, आदि खनिज पसियों द्वारा विषाक्त होने को प्यवस्था करने है। विपको क्रियासे भामाशयको | पर क्षार, कानेट और चक: गादि दण्य सेवन करना