पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७५१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विप यनिक हिसावसे सलफारेटेड हाइट्रोजन गैसका प्रति- कारक यन्त्रद्वय अविरत देहसे मूत्र पथसे यह विप शरीर द्वन्द्वी है, तब इस क्लोरिन गैसके वाघाणसे उसकी | से अपमारित किये देते हैं। यदि किसी कारणवश विपक्रिया नष्टं की जा सकती है। किन्तु फ्लोरिन गैस दैहिक रक्त के साथ यह गदार्य अधिक परिमाणसे प्रयोगके समय यह भी मनमें रखना चाहिये, कि क्लोरिन रिमिश्रित हो जाता है, ना रोगी अचेतन और घोरतर गैस अपने भी भयानक विष है। सुतरां किसी तरह तन्द्राम मभिभूत हो जाता है और उसमे प्रायः ही उसको अधिक मासा तथा असावधानीके साथ इसका मृत्यु हो जाती है। व्यवहार न होने पाये। पित्त । । । नाइट्स मपसाध और फ्लोरोफार्म बहुल | दूसरा विष पित्त है। देहफे रक्तके साथ पित्त द्रव्य स्पर्श और चैतन्यापदारक है नया उसी उद्देशसे विमिश्रित होनेसे कामला आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं । इनका व्यवहार भी होता है। वासरोध संगठन करना स्नायषीय यन्त्र विकृत हो जाते हैं . मानसिक शक्ति हो इन सब पिपोंका कार्य है। विनष्ट हो जाती है। रोगो मशानावस्था मृदु मृदु प्रताप प्रतिकार-कृत्रिम श्वास-प्रभ्यास मीर ताडितप्रवाह करते करते विलकुल अचेत हो जाता है। द्वारा इस अवस्थाका प्रतिकार होता है। इस तरह विविध रोगोत्पादक दैहिक उत्पादन द्वारा १०। हादोकानों का बाप्प-वेनजोलिन, पिट्रा भी कई तरहसे देह विपाक हो जाती है। प्राव्य और लियम आदिसे जो पाययीय पदार्थ निकलता है, उसके प्रतीत्य चिकित्सकों का सिद्धान्त है, कि दैहिक पदार्शमें द्वारा भी विपक्रिया संगठित होती है। इन सब यायवीय । हो यहुविध रोगोंका कारण निहित है और तो फ्या- रिपोंसे भ्यास रद्ध होकर मृत्यु हो जाती है। दैदिक शर्वरा आदि अतिरित मात्रा में रक्त में विमिश्रित प्रतिकार--कृत्रिम श्वास-प्रणाली लम्बन और होने पर भी देदका स्वास्थ्य विनष्ट कर सांघातिक रोगको ताहितप्रवाहसे इस अवस्थाका प्रतिकार होता है। सटि करते हैं। ददिक विष। विषाणु। जीवदेहके अभ्यन्तर ही बहुल विषपदार्थ विद्यमान इस समय बैक्टेरिमोलजी नामके जीवाणु और है। सुनिपुणा देव-प्रति अपने सुन्दर विधान के लिये उभिदाणुतत्त्यका जो अभिनव वैधानिक मान्दोलन चल प्रतिनियतके सय विष देसे मपसारित कर जीयोंकी रहा है, उसमें कई जीवाणु और उभिदाणु मानवदेहके मृत्युमुखसे रक्षा करती है। लिये भयानक विष प्रमाणित हुए है। उक वैज्ञानिकांकी कार्यानिक एसिड। गयेपणासे म्भिर हुमा है, कि हैजा, प्लेग, टाइफापेड इन सब वियोंमें हम कार्यानिक एसिमको यात इससे फीवर ( तपेदिक ज्यर), धनुएडार, चेचक आदि संघातक पहले ही कह चुके हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं, रोग इन सब जीयाणु गौर उद्भिदाणु विपके हो क्रिया- कि देहा कार्यानिक पसिन बहुत मघातक पदार्थ है। मान है । फुस्फुस और कर्गपधले कार्यानिक पसिड अधिक परि-| पेसब रोगयीजाणु माहा, पानोय या वायुके .माणसे बाहर निकलता है, इससे हमारा स्वास्थ्य और साथ देहफे भीतर प्रवेश करने गया देवसस्पृष्ट जोयन अव्याहत रहता है। किमो कारणसे कार्यानिक होने पर इन सब रोगोंके लक्षण प्रकाशित होते हैं और एसिडका निकलना बन्द हो जाये, तो तुरन्त देव-राज्यमें ये क्रमसे ही भीषणतर हो रोगीका जीवन नाश करते भोषण विशृङ्खला उपस्थित हो जाती है . और सहसा है। इस समय अघिकांश व्याधियां ही रोगयीजाणुक मृत्युका लक्षण दिखाई देता है। देहप्रवेश विषमय फल अपधारित हुई है। युरिया। इन सर्व संघातक विपोंके कार्याध्वंसके लिये दूसरा विष-पदार्थो युरिया है। वृक्क नामक मूब.आधुनिक वैष्ठानिक प्रक्रियासे एएटो टफसिन सिराम Vol, ExI 160