पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७५९

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विषमक-विषमन्चर ६६७ समान अक्षर रहनेसे अर्द्ध तथा चारों चरणों में समान | जाती है, उसका नाम विषम कर्म है। २ असदृश कार्य । अक्षर नहीं रहनेसे यह विषमवृत्त कहलाता है। विषमकोण ( स० लो०) वह काण जो सम न हो, सम- (छन्दोम० म स्तवक) । कोणसं भिन्न और कोई कोण । ( Angles other than ६ वर्गमूलोक्त रेखा । ७ अर्थालङ्कार विशेष : / right angles ) प्रत्येक कार्य किसी न किसी एक कारणसे उत्पन्न होता विपमतात ( स० लो०) १ गरी, जिसका चारों है तथा प्रायः स्थलमें उस कारणका धर्म (गुणक्रियादि०) | किनारा असमान हो। २ वीजगणितात अङ्कविशेष। कार्या परिणत होता है। जहां कारणका गुण या क्रिया | ( Irregular solid ) 'विरुद्धभावसे कार्य में दिखाई देती है तथा जहां मारग्ध विषमप्रादि ( स० वि०) एकदेश प्राहि । कार्य निष्फल होता है, फिरसे उससे यदि किसो | विषमचक्रवाल (स क्लो०) वृत्त-भास ( Ellipse)। अनिष्ट संघटनको सम्भावना रहती हैं और जहां विषभचतुरन (संपु०) असमान याहु वा कोणविशिष्ट विरुद्ध पदार्थका सम्मेलन देखा जाता है, वहां विषमा- तुष्कोण क्षेत्र ( Trapce ) 'लङ्कार हुआ करता है। | विषमचतुष्कोण (स.पु.) यह चौकोन क्षेत्र जिसके (पु०) ८ राशिका नामभेद, अयुग्मराशि । मेष, | चारों कोण समान न हो, विषमकोणघाला चतुष्कोण मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ इन सब राशियोंको | क्षेत्र । अयुग्म वा विषम राशि' कहते हैं । (न्योतिस्तवत्त्व ) | विपगच्छद (सं० पु०) विषमः अयुग्मः छन्दा यस्य । सप्त- ६ कङ्कण नामक तालके अन्तर्गत एक प्रकारका ताल । न्छदवृक्ष, छतिवनका पेड़। कडूण नामक ताल पूर्ण, खण्ड, सम और विषमके भेदसे विषमज्या (स० पु०) विपम उप्रो ज्यरः । ज्यररोगभेद । चार प्रकारका है। इनसे विषम ताल तगण द्वारा जिस ज्यरके समयमें ( प्रत्याहिक ज्वरागम समय में ), निर्दिए होता है। जठराग्निविशेष । मन्द, तीक्ष्ण, शोतमें (ज्यरागमन कालोन शैत्य प्रयुक्त कंपन मादिमे), विधम और समके भेदसे जठराग्नि चार प्रकारको है। उणमें गात्रताप आदिमें ) और घेगमे ( धमनी या उनमें से मन्द, तीक्ष्ण और विषमाग्नि यथाक्रम कफ, पित्त | नाडीको गतिमें ) विषमत्य न्यूनाधिक्य दिखाई देता और वायुको अधिकतासे उत्पन्न होती है तथा इन तीनों अर्थात् जिस उपरमें पूर्व दिन ज्वर मानेके समयकी ' अर्थात् कफ, पित्त और वायुफी समता अवस्था समा अपेक्षा दूमरे दिन कुछ पहले या पीछे आये और जिसमें 'ग्निकी उत्पत्ति होती है। जिसको जठराग्नि विषमत्य पूर्णदिनकी अपेक्षा दुसरे दिन शीतका अश शरीर को प्राप्त होती है, उसका साया हुमा अन्न कभी तो तापादिका माग कुछ कम या ज्यादे हो योर नाडीको - अच्छी तरह पच जाता और कभी विलकुल नहीं पचता ।। गतिमें भी ऐसे ही न्यूनाधिक्य अनुभव हो, उसी ज्वरको पैसे घ्यक्तिको यातज रोग उत्पन्न होता है। विषमज्वर कहते हैं। विपमक ( स० लि. ) असमान, जो पराबर न हो। चातिकादि ज्वरके निर्दिविच्छेद समयमें अर्थात् ___(वृहत स० ८१।१६)/७१०१२ या १४।२०।२४ दिनको यथाक्रम वातिक, पैत्तिक विषमकर्ण (स. पु०) चारों समकोणों वाले चतुर्भुज और लामिक ज्यर विच्छेद होने पर भी वातादि दोपफे में किसी दो वरावरफे कोणोंके सामनेकी रेखा | सम्पूर्ण लाघव होने न होते ही यदि अहित. आहार भाचारादिके किये जाये, तो पे वातादि दोष हो प्रवृद्ध चिपमान (सलो०)१ वीजगणिताक अप्रणाली हो कर रसरक्तादि धातुमें किसी एक धातुका अवलम्बन मद । असमान प्रक्रिया द्वारा राशि-निरूपणका नाम। | कर विषमज्वर उत्पादन करते । रसधातुका अव- राशियोको वर्गका वियोगफल तथा मूलराशियोंका योग लम्बन कर जो विषमज्वर होता है, उसका नाम सन्तत , या वियोगफल रहने पर प्रक्रियासे राशियां निकाली । है, रक्तके आनयसे जो विषमज्यर होता है, उसका ( Diagonal)।