पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७६५

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विपमञ्चराङ्क शलौह-विपयवाण ६७१ मुट्ठो चायल द्वारा एक पुनलो तय्यार करे और उसकी मिला कर जल द्वारा मन करे। २ रत्तोकी गोली बना हल्ली रङ्गमें रंग दे, पाछे चार हल्दा रङ्गको पताकाये कर सेवन करनेसे विषमज्वर नए होता है। और पोपलको पत्तीफे घने दोने हरिद्रा रससे भर कर विषमज्वरान्तकरस (स' पु०) विषमज्वरको एक औषध । उसके चारों ओर स्थापन करे। उक्त पुतलीको वोरण । प्रस्तुत प्रणालो-हिंगुलत्थ पारा और गन्धक, वरावर चाविका ( वेनाको पत्तेसे बने पांच या मामन भाग ले कर अच्छी तरह पोसे। बादमें कजली बना विशेष ) पर "विष्णुर्भमोऽ" इत्यादि मन्त्रांसे सङ्कल्प कर पर्पटीवत् पाक करे । यह पर्पटी तथा पारेका कर निम्न मन्सका ध्यान मोर मन्त्रपाठ करना चौधाई भाग स्वर्ण, मुक्ता तथा शङ्ख और मीपकी चाहिये,- भस्म तथा लोह, ताम्र, अन प्रत्येक पारेका दूना; रांगा "ज्वरस्निगद निशिराः पह भुजो नवमोचनः । मूंगा, प्रत्येक पारेका आधा, इन्हें एक साथ ले कर भस्मारयो रुद्रः कामान्तकयमोपमः ।" घृतकुमारीके रसमें मई न करे। बादमें दो सीपमें उसे पीछे नौ कौड़ी दे गन्ध पुष्प, धूप आदि खरोदे ।। भर कर फरियाग्नि (वनगाईको माग )में पुटपाक तदन्तर उनसे पूजा कर सन्ध्या समय निम्नोक्त मन्त्र पाठ विधिके अनुसार पाक करे और पोछे २ रत्तीको गोली कर ज्वर लगे हुए व्यक्तिको निर्गञ्छन करना होगा। बनाये । इसका सेवन करनेसे विषमज्वर, प्लीहा, (तीन दिन तक ऐसा हो करनेका विधान है ) मन्त्रः यकृत्, मादि नाना प्रकार के रोगोंका प्रतिकार होता है। .. "ॐ नमो भगवते गरुड़ासनाय नायकाय स्वस्त्यस्तु , इसका अनुपान पीपलचूर्ण', हींग और सैन्धव वस्तुता स्वाहा ॐ के रैपशं धनतेयाय नमः ओ हो । लवण है। क्षः क्षेत्रपालाय नमा ओ हों ठ ठ भो भो ज्यर शृणु । मिषमता (सं० स्त्री ) १ विषम होने का भाव, असमानता। शृणु हन हन गर्ज गर्ज ऐकादिक शाहिक बाहिक चातु. २ पैर, विरोध, द्रोह। किं साप्ताहिक अ मामिक मासिकं नैपिकं मौहर्शिकं विषमत्रिभुज (सं० पु. ) वह त्रिभुज जिसके तीनों भुज फट फट ह' फट् हन हन हन मुश्च मुञ्च भूम्या गच्छछोटे बडे हो, असमान हो। (Scalenn triangle ) म्वाहा" यह मन्त्र पाठ समाप्त कर किसी वृक्षों, मशान- विषमस्व ( को०) विधमका भाव या धर्म, विषमता। मे या चतुष्पयने उक्त पुतलीको विसर्जन देना चाहिये विपमदलक ( स० पु०) यह सोप जिसके दोनों दल । और इन पूजाकी पास्तुको दक्षिण तरफ पवित्र स्थान पर असमान हो, जैसे अइष्टर सोप ( orster )। रग्य देनेकी विधि है। विषमनयन ( स० पु० ) विषमाणि अयुग्मानि (बीणि ) मिया इसके सूर्यायदान, सूर्यका स्तय, पटुक- नयनानि यस्य । १ शिव, महादेव । (नि.) त्रिनेत्र भैरव स्तष, माहेश्वरकवच मादि पाठ और प्रक्रियादि विशिष्ट, तीन आंखोवला । द्वारा भी विषमज्यरका अपनादन किया जाता है। विषमनेत्र (स.पु०) शिव, महादेव । विषय बढ़ जानेके कारण उसका विवरण यहाँ दिया न | विषमन्त्र ( स. पु०) विपनियत को मन्त्रो यन्त्र । सर्प गया। धारक, सपेरा। पर्याय-जाङ्गली। (जटाधर) __पाश्चात्यमतसे विषमज्वर---पाश्चात्य चिकित्सक- विषमपद (स'०. नि०) १ असमान पदचिहविशिष्ट । गण विषमज्वरको मलेरिया ज्या कहते हैं। स्त्रियां राप। २ मतमान चरणयुक्त। विषमज्वराङ्क शलौह (स. क्ली०) विषमज्वरकी एक (अभाति० १६३६) एक औषध । प्रस्तुतप्रणाली-रक्तचन्दन, सुगन्धवाला, विषमपलाश (स० पु०) सप्तपलाश, छतिवनका वृक्ष । माकनादि, धीरणमूल, पीपल, हरीतकी, सोंठ, शुन्दि, विषमपाद (स० वि०) असमान चरणयुक्त। स्त्रियां आंवला, चित्रका मोथा और विङ्ग प्रत्येकका चूर्ण) राप्। १ सोला, जारित लोहचूर्ण १२ तोला, इन्हें एक साधी विषमयाण ( स०.पु.) पञ्चचाण, कामदेव। .