पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७८१

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विपुपरेखा-विष्कम्भ ६८३ अतिकम कर जव फिरसे विपुवरेखा पर पहुंचते हैं, तब गलभावमें अक्षरेता और द्राधिमाकी आवश्यकता होती वासन्तिक समदिनरानि ( Vernal equinor) होतो है। है। प्रत्येक द्राधिमा रेखा उत्तर-दक्षिण लम्भावमें विपुच; सूर्य प्रायः २श्वी दिसम्यरको दक्षिणमें मकरकान्तिसे रेखाके ऊपर गिरी है। इसको माध्यन्दिन रेया भी २३ ४६५ अयनांश धीरे धीरे उत्तरको ओर हटने लगते कहते हैं। प्रत्येक अक्षरेग्वा मो माध्यन्दिन रेखासे जहां हैं तथा प्रायः २१यों मार्गको विपुवरेखा पर पहुंचते हैं। लम्ब भावमें एक दूसरेसे मिलती है, यहां ३६० डिग्री इस दिन पृधियोके उष्णमण्डल में तमाम दिनरातका मान मधवा चार समकोनोंकी उत्पत्ति हुई है। बराबर रहता है। इस दिनको धासन्तिक वा महा। विस्तृत विवरण विषुव और पणिवी शब्दमें देखो। ..तिषुषसंक्रान्ति कहने हैं। इसके दूसरे दिनसे सूर्य क्रमशः विषुवन् ( स० क्लो०) १ विषुव । २ व्यापक । विपुवरेनासे उच्चरको ओर जाने लगते हैं तथा २२वीं (ऋक् १८४१०) जनको २३४६५ मा वक्रभायने कर्कटकान्ति मा वियूकुद (स. त्रि०) द्विखएडविशिष्ट, जो दो खंडों में कर फिरसे दक्षिण विपुवरेखाको भोर साप्रमर होते हैं। विभक्त हो। (भाष० ओ० ५॥३॥२२ ) इसके बाद ये २४वीं सितम्बरको विषुवरेखा पर पहुंचते ' विपूचक (० पु० ) विचिका, विसूचिका नामक हैं। इस दिनको शारद या जलविपुत्रसंक्रान्ति कहने हैं। रोगविसूचिका देखो। अनन्तर सूर्य दक्षिणको भोर २२यीं ।देसम्यरको मार विचि (सलो० ) विपूनीन मनः । मान्ति मीमा पर आते हैं। इस प्रकार सूर्य विपुवरेन्या । (भागवत ४।२६:१६) के ऊपर उत्तरसे दक्षिण तथा दक्षिणसे उत्तर अयनमें निपूचिका ( स० स्त्री० ) यिसूचिका रोग। परिभ्रमण करते है। बङ्गालमें साधारणतः स्यों चैत, घी। विसचिका देखो। मापाद, आश्विन और घी पीपको ऐसा हुमा करता ' यिपूचीन ( स० स्त्री० ) १ इहलोको सर्वत्र गमनशील, है। पृथिवीकै कहिपत मेरुदण्ड (Axis )का मध्यविन्दु : इस संसारमें तमाम जानेयाला। (ऋक १११६५३८ ) 'मोर विपुवरेखाका मध्यविन्दु यदि एक सरल रेखासे । २ मर्वताप्रसन, तमाम फैला हुआ। मिला दिया जाये, तो ये दोनों रेणार' एक दुसरे पर विपत् (म० वि०) सर्पगलमें परिवर्तमान, ममी लम्वरूप में पड़ेगी। जगह मौजूद। विषुवरेपा और मेरुदण्ड रेखाके संयोजक विन्दुसे | विषोढ़ (म त्रि.) वि-मद क्त। अहिष्णु, असहन. उत्तर और दक्षिणमें कर्यटक्रान्ति तथा मकरकान्ति तक | कागे। जो वडा तिर्याक्-पृत्त कल्पित होता है, उमको रविमा पौषधी (स. स्त्री०) विषस्य मोपधी। नागदन्ती। कहते हैं। इस रेखाके किसी न किसी म्यान पर सूर्य | (रत्नमाला) प्रहण वा चन्द्रग्रहणके समय मूर्या, चन्द्र और पृथियो | विक (सपु०) विधा, वह हाथी जिसको अवस्था ये ममो समसूत्रभायमें रहते हैं । पृथियों अपने मेरुदण्ड बीस वर्षकी हो गई हो। (शिशुपालवध १८१२७ ) (Axis)-फे चारों और पश्चिमसे पूर्णको भोर घूमती | विष्कन्ध ( म० क्लो०) गनिनिधर्शक, वह जो गतिको है। इससे नमोमण्डलका पूर्णसे पश्चिमकी भोर रोकता हो। ( अथर्व १।१६।३ सायण) आवर्शित होना दिखाई देता है। विन्धदूपण ( स० ति०) विनिवारक, विन दाधा पूर्ण जव विपुथरेसाफे ऊपर आते हैं, तब पृथ्वी भरमें | रोकनेवाला। (भथये २।४१) दिन रात्रिका परिमाण समान ( Equal ) रहता है । इस विष्कम्भ ( स० पु०) १ फलितज्योतिष के अनुसार मत्ता. . कारण इस रेसाको पिपुवरेखा या निरक्षरेना (Equator) ईस योगौमसे पहला योग। यह आरम्मके पांच दंखों- कहते हैं। भौगोलिक हिसाबसे स्थानको दूरी निर्णय को छोड़ कर शुभकार्यके लिये बहुत अच्छा समझा करनेमें विपुवरेखाके बाद उत्तर और दक्षिण समान्त. जाता है। इस योग में जन्म लेनेवाला मनुष्य सब Vol XxI, 171