पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७८२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


६८२ विष्कम्मक-विष्टम्भनं वातोंमें स्वाधीन, घर आदि बनाने में पटु और भाई-बन्धु, । हैं। जैसे, कबूतर, मुरगा, तीतर, वटेर, लावा आदि। . स्त्री-पुत्र आदिसे सदा सुखी रहता है। इनका मांस मधुरः कंपाय रसात्मक, बलकारक, शुक्र ___ २ विस्तार। ३ प्रतिवध, साधा। ४ रूपकाङ्ग वर्द्धक, त्रिदोषनाशक, सुपथ्य और लघु होता है। भेद, नाटकका अङ्कविशेष। ... (भाषा० पूर्व ख० ) : _____नारकाङ्कके प्रथम अर्थात् प्रस्तावना कालमें जो जो सुश्रुतमें यिनिकर पक्षीका विषय रम प्रकार लिम्ना : विषय कहा जाता है, उसे संक्षिप्तमायमै पृथक रूपसे । है-लाव, तीतर, कपिञ्जल, यति, यत्ति का, वर्तक, दिखलानेका नाम विष्कम्भ है। यह शुष्क और मङ्कीर्ण | नात का, पातीक, चकोर, कलविङ्क, मयूर, फ कर, उपचक्र, के भेदसे दो प्रकार है। जहां एक या दो मध्यम पान! कुपकुट, सारङ्गः शतपत्रक, कुतित्तिरि, कुरवाहुक और .. द्वारा कार्य सम्पन्न होता है यहां शुद्ध । जैसे मालतो | यवलक आदि पक्षी विकिर जाति के हैं। इनके मांसका माधधर्म-श्मशानमें कपालकुण्डला । फिर जहां नीच | गुण-लघु, शीतल, मधुर, कपाय और दोपशान्तिकर ' और मध्यम पात्र द्वारा फिया कल्पित होती है, वहां हैं। (मुश्चत सूत्रस्था०) सङ्कीर्ण अर्थात् विमिश्र होता है, जैसे रोमाभिनन्दमें- २ दवींकर नामक जाति अन्तर्गत पर प्रकारका .. क्षपणक और कापालिक । कहनेका तात्पर्य यह कि सांप । (मुश्रत सबस्था० ४ अ०) . प्रस्तावित बाहुल्य विषयक मध्यसे असार गर्भ गौर विष्कुम्भ (सपु०) विषकम्भ देखो। नीरस अर्थात् रसात्मक नहीं है, ऐसी अतिरिक्त वस्तुका | विष्ट (सं० वि०) विश पत। १ प्रविष्ट। २.आविष्ट । परित्याग कर सिर्फ मूल प्रस्तावके अपेक्षित पदार्थ | ३ आश्रित । दिखाना ही नाटकमें विष्कम्मका कार्य है। विटकर्ण ( स० वि०) विष्टः कर्णे यस्य । प्रविष्टकर्ण, (साहित्यद० ६०)। जिसके कामि घुस गया हो।' ५ योगियों का एक प्रकारका ध । ६ वृक्ष. पेड़। विएप ( सं० स्त्री.) स्वर्गलोक । (ऋक ११४६३) . ७ अर्गला, व्योड़ा। ( भरत ) ८ पोतभेद । पराह-विष्टप (सं० क्ली० ) जगत्, भुवन । पुराण ८० अध्याय नथा लिङ्गपुराण ६१।२८ श्लोक विष्टपुर (सं० पु०) ऋषिभेद । ( पा ११२३) इसके परिमाणादिका विवरण है। | विष्टब्ध (स० वि०) वि-स्तम्भ-क्त । १ प्रतिबन्ध, बाधा. विष्कम्भक ( संपु०) विष्कम्भ-स्वार्थे कन् । युक्त। २रुद्ध, रुका हुआ। विष्कम्भ देखो। विष्टन्धि (स' स्रो०) वि-स्तम्भ-क्तिन् । विष्टम्म । विकस्मिन् (स'० पु०) विष्कम्नाति रुणद्धीति विस्कम्भ- विष्टम्भ (स० पु०) वि-स्तम्भ-धन । १ पतिवन्ध, रुका- . गिनि। १ अर्गल, व्योड़ा। २ शिय, महादेव। यर। २ भाक्रमण, चढ़ाई। ३ एक प्रकारका रोग। . इसमें मल रुकनेके कारण रोगोका पेट फूल जाता है। . विष्कर (स० पु० ) वि- अपव्युट च । १ अर्गल, विशेष विवरण अनाह और विवन्ध शब्दमें देखो। ' ध्योड़ा। २ पक्षी, चिड़िया । ३ दानवभेद । (त्रि०) विशेषरूपसे स्तम्भयिता, विशेषकपणे स्तब्धकारक। , (भारत भीष्म ) (ऋक हा८६।३५) , . विष्फल ( स० पु०) विषं विष्ठां कलयति भक्षयतीति | विष्टम्भकर ( स० त्रि०) विष्टम्म फरोति कृ अप्, यद्वा .. , कल-अच् । प्राम्यशूकर, पालतू सूअर । करोतीति कर, विष्टम्भस्य करः । विष्टम्भजनक, आध्मान... " विष्किर (स० पु०) विकिरन्तोति वि- विक्षेपे इगुप | कारक । धेतिक, (विरिकरः शकुनिर्यिकिरो वा । पा ६।९।१५० ) इति । विष्टम्मन (सपु०) १ रोकने या संकुचित करनेकी सुर, परिनिविभ्याति पत्वं । १ पक्षिभेद, वे पक्षो जो किया । २ वह जो रोकता, वा संकुचित करता हो।' भन्नको इधर उधर छितरा फर नमोसे कुरेद कर खाते : . (शुक्भया ६४५) (भारत)