पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७८३

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विष्टम्नयिषु-विष्ट ६८३ _ विष्टम्भायपु ( स० वि०) सस्तम्भयिषु, स्तम्भन करनेगें । विष्टम्हा (सं० स्त्री०) वर्ण केतकी, पोलो केतको। कहीं . उत्सुका - कहीं विटारहा, ऐसा भी पाट देखने में माता है। . विष्टम्भी (स' नि०) विष्टम्नातीति वि-स्तन्भ-णिनि । विष्टरोत्तर (सं० वि० ) कुशाच्छादित, कुशसे मढ़ा हुआ । • १ विष्टम्भरोगजनक, जिससे पेटका मल रुके। विष्टम्भी- रिटान्त (सं०नि०) ध्यातायसान, जिसका अयसान हुमा 'स्याम्तीति विष्टम्भ-इनि । २ विष्टम्भरोगविशिष्ट, जिसे हो। (ऋक्, १०९३१३) विष्टम्मरोग हुआ हो। विष्टार (सं० पु० ) १ छन्दोविशेष, पंक्ति छन्द । (छन्दो विष्टर (म० पु०) विस्तीर्खाते इति विस्तृ अप् । (वृक्षास नाग्नि च पा ३३॥३४ ) "विस्तीर्यान्तेऽस्मिन्नराणोति, नथाविष्टरः । पा ८३६३) इति निपातनात् पत्यं । विष्टारः पंक्तिछन्द । छन्दका बोध होनेसे विस्तृ १ पिटपो, गृक्ष । २ पोठादि स्थान । ( अमर ) ३ फुशा | घातुका पत्व हो र विटार पद बनता है। २ विस्तुन । सन, कुशका बना हुभा आसन । विष्टार शब्दका विस्तृत अर्थ घेदमें प्रयुक्त हुमा है। विवाहकालमे मम्प्रदाता जामाताको विष्टरासन । लौकिक प्रयोगमें छन्दः यही अर्थ होगा। देते हैं। इसका लक्षण-सार्द्ध द्वितय वामावर्तावस्थित विष्टारपंक्ति (सं० स्त्री०) पक्तिछन्दोमेद। इसके प्रथम अधोमुख असंख्यात दर्भमुष्टि अर्थात् एक मुट्ठी साप्रशा और शेष चरणमें ८ तथा द्वितीय और तृतीय चरणमें को उसके अग्रभागमे वामावर्तसे ढाई पेंच दे कर उसके । १२ पद रहते है । (शुस्मयन: १५५४ ) अगले भागको नीचे की ओर रख देनेसे विष्टर बनता है। विद्यारहतो (सं० स्त्री० ) वैदिक छन्द । इसके प्रथम और होमकालमें कुश धारा जो ब्रह्माको प्रस्तुत कर वद्विस्था . शेष चरणमें ८ तथा द्वितीय और तृतीय चरणम १० पद पन करना होता है; यह ब्रह्मा भी इसी प्रकार बनाया रहते हैं। (क माति० १६६) जाता है। किन्तु उसका अप्रभाग ऊपरको और रहता | विटारिन् (सं० त्रि.) विस्तृ-णिनि । विस्तीर्यमाण 'और उसमें दक्षिणावर्शसे ढाई पेंच देना होता है । विष्टर अवयय, जिसका आकार बड़ा हो । (अयये० ११४१) और ब्रह्मामे सिर्फ इतना ही प्रभेद है। भवदेवमट्टने विटारूहा (सं० स्त्री० ) विष्टयहा, स्पर्ण केतकी, पोली कहा है, कि पचास अग्रकुशसे ब्रह्मा और परोस सान- केतको। (राजनि०) . . कुशसे विटर बनाना चाहिये। किन्तु रघुनन्दन संस्कार ! विष्टाय ( सं० पु.) १ स्तोमपाठक समयका विभागमेद । तत्वम इस संख्याका विषय तथा विष्टरदान-काल में दो । २ विष्टुतिका एकांश । (माट्या० २६६) - हायसे पकड़वा देनेका विषय स्वीकार नहीं करते। विष्टि (सं० स्रो०) विपक्तिन् १ प६ काम जो विना 'ममी ५ या ७ साप्रकुशासे विपर बनाते हुए देखा.! कुछ पुरस्कार दिये कराया जाय, घेगार । २ येतन, तन जाता है। जब इसकी कोई निहिए संख्याका नियम स्वाद । ३ कर्म, काम । ४ वर्षण, वर्षा। ५प्रेषण, नहीं है, तब इसोको शास्त्रमणत समझना होगा। ' भेजना। ६ विटिमद्रा । ७ फलितज्योतिषक ग्यारह विटरमाज ( स० लि०) प्राप्तासग, जिसे आसन मिला । फरणों से सातयां करण । पक्षिकामें यह करण न्याङ्क द्वारा अभिहित होता विटरभ्रया (स' पु०) विरायिव श्रघसी यस्य, या यिष्टर विष्टिभद्राका निरूपण-विष्टिकरणको ही विष्टिमा अश्वत्धवृक्ष ध या नियां तत्र वसतीति । (उप्प | V२२६) कहते है । इसके अलाया तिर्थावशेषमै विभिटा भगवान् विष्णु, कृष्ण । होता है । किस किस तिथिक किस किस शमे विष्टि- 'विष्टरस्प ( स० वि०आसन पर बैठा या सोया हुआ। भद्रा होती है, उमा विषय नोचे लिखा जाता है। विष्टरा ( म० खा) गुण्डासिनी नामकी घास। । शुक्लपक्षकी एकादशा और चतुर्थीफ शेपा, अष्टमी और विष्टराज ( ०) रौप्य, चांदी। पूर्णिमा पूर्याद्ध में, कृष्णपक्षकी तृतीया और दशमी. विएराश्य { सं० पु० ) पृथुके एक पुत्र का नाम । ( हरिवंश०) । के शेपार्द्ध में तथा मप्तमो और चनुदगीके पूर्गम पिष्टि.