पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७८४

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वामि स्वाधीन, घर आदि बना.. स्त्री-पुत्र आदिसे सदा सुग्यो र ___ २ विस्तार। ३ प्रतिय भेद, नाटकका अङ्कविशेष। .. नाटकाङ्कके प्रथम अर्थात विषय कहा जाता है, उसे . . दिखलानेका नाम विष्कम्म के मेदसे दो प्रकार है।. .. द्वारा कार्य सम्पन्न होता . . . माधधर्म-श्मशानमें कपाल और मध्यम पात्र द्वारा ! . सङ्कीर्ण अर्थात् विमिधः .::, क्षपणक और कापालिक . . प्रस्तावित बाहुल्य विषय.. गोरस गर्थात् रसात्मक परित्याग कर सिर्फ । दिखाना ही नाटकमें वि ५ योगियों का एक ७ अर्गला, ज्योड़ा। पुराण ८० अध्याय इसके परिमाणादिका विष्कम्मक (स.पु० • उत्थाय मूत्रपुरीपोत्सर्गः कुर्यात्, ': रातो दिवा चोदछमुखः सन्धयोश्च ।" । . (विष्णुसंहिता ६०). " लिखा है, कि मालमुहर्स (रात्रिके . ....अन्तिम दो दण्ड ) में उठ कर रातको " . दिन तथा प्रातः और सायं दिनरात्रि के सन्धिकालमें उत्तरमुख हो कर विष्ठाका त्याग होता है। घाससे ढको जमीनमें, जोते हुए वेत-

: वृक्षछायाम, खारी जमीनमें, शालिस्थान में,

. यु. स्थानमें, गर्शमें, वल्मीकम, पथमे, रथ: पर, की विष्ठाके ऊपर, उद्यान में, उद्यान वा जलाशयफै . विष्ठात्याग निपिद्ध है। . . . . . . अङ्गार, भस्म, गोमय, गोष्ठ, ( गाय चरनेका स्थान) • आकाश और जल आदि स्थानों में तथा घायु, अग्नि, .. 'चन्द्र, सूर्य, स्त्री, गुरु तथा ब्राह्मणके सामने अनयगुण्ठित । ... मस्तफसे विष्ठात्याग न करे। विष्ठात्यागके बाद. देले .. वाईटसे गलको मार्जन कर लिङ्ग पकड़ते हुए उठे। पीछे उद्धत जल और मिट्टोसे' गन्धलेपक्षयकर शौच करे । इसके बाद मिट्टीको पेशावके द्वारमे एक घार, मल.. द्वारमें तीन बार तथा पाए हाथमें दश यार, दोनों हाथ, .. सात बार और दोनों तलमे तीन तान धार लगाये। यह नियम गृहस्थके लिये है । यति वा ब्रह्मचारीक . लिये इसका दूना बताया गया है । गन्ध नहीं रहे, यही शौचका उद्देश्य है, किन्तु जलादि द्वारा गन्ध जाने पर . मा उक्त प्रकारसे मृत्तिकाशीत्र अवश्य करना होगा। ( विसंहिता ६० म०) में लिखा है, कि उत्थान स्थानसे नीर तीर जहां जाकर गिरे, उतना स्थान बाद . करना चाहिये । मायादी जगहफे .. . .. .. : नहीं। विष्ठा, और सि. नाना प्रकार मूत्रत्यागके. समय : चाहिये। मालाकी .. है। जूता और करना मना है। . 5. जलसे शौच : . विकस्मिन् (सपुर णिनि । १ अर्गल, २ यिष्कर (सं.पु. व्योंड़ा। २ पक्षी, .. . विष्कल (सं० पुल , फल अच् । प्रार विष्किर (सं० पु. धेतिक, (विधि - सुट, परिनिधि भन्नको इधर उधर