पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७९

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. वात-पाधि ७७ 'माकान्त रहते हैं। कहीं कहीं बालकों को भी यह पीडायोड़ा और लाल होता है, उसके अधाक्षेपमें अधिक परे- हुआ करती है। अधिक हा न मधिकं गरम देश | 'टस पाया जाता है। कमो कमो सामान्य एलबुमे रहता या मोंगो जगहमें योस करने, शारीरिक अस्वस्थता और है। उत्ताप एक सप्ताह तक बढ़ कर पीछे कम हो जाता मनाकर रहने तथा गागे बालो गांठ में चोट लगनेसे यह है, किन्तु प्रातःकालमें स्खला यिराम देखा जाता है। बहुत रोग उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। . . . . . जगह 'तापमांग १०० से १०४ तक, कभी कभी ११० से १. पसीना निकलते समय शीत लगने, देर तक भोंगा ११२ तक हो सकता है। उत्ताप अधिक होनेसे सभी लक्षण 'कपड़ा पहन कर रहने और मनियम आहार करनेसे यह अत्यन्त गुरुतर हो जाते हैं। रोगी बड़ा दुर्यल हो जाता ' रोग घर दशाता है। चोर्य रोकने अथवा वचीको हमेशा है और मस्थिरता तथा धीच वीवमें पता है। प्रायः स्तन पिलाने, किसी कारणयश त्वकको क्रियाका लोप होने अधिक प्रलाप और अन्यान्य विकारों के सभी लक्षण उप. (जैसे स्कालेर फियरम ) और अधिक अङ्गं हिलाने स्थित होते हैं, अन्तो जोण्डिस, रक्तस्राय, उदरामय या हुलानेते यह रोग हो सकता है। श्वासमछ द्वारी मृत्यु हुआ करतो है । हमिएड आकारत

शारीरिक परिवर्तनमें बड़ी घड़ी गांठोंके फाइब्रोसि | होनेसें रागी की कार्दियेक स्थानमें अयच्छन्दता और

'रस् और साइनोरिएल विधान प्रदाह के चिह्न देखे जाते वेदना मालूम होती है। है। साइनोपिएल विनि' आरक्तिम और स्थूल तधा! "मचराचर जंघा, केनो, गुल्क और मणिबन्धको सभी यहांती सभो रतनालियां स्कीन होते देखो जाती है। सन्धियां आक्रान्त होती हैं; किन्तु दूसरी दूसरो प्रन्धियां भी प्रन्थि लिम्फ, तरले सिरम् गोर को कभी मयांद रहता। पीड़ित होतो । क्रमशः बहुत सन्धियाम ही प्रदाह है तथा उसके बीच कार्टिलेज क्षत हो सकता है। निकट- उत्पन्न होता है। कमी मी एक सश्विको जलन दूर की सब जगई सिरम् द्वारा स्कोत होतो हैं । इपिएडा-होती और दूसरी सन्धिको जलन बढ़ जाती है। हमेशा दोनों 'भ्यन्तरमें विशेषतः भालभोंके ऊपर स्तर स्तरमें फाइमिन पार्यो की सभी सम सरिधयां एक साथ माकान्त होते देखा जाता है। पेरिफाइटिस, एएडोकोर्खाइटिस, माइ-1 देखी जाती है। पीड़ित सन्धि स्फोत, उत्तप्त, चंदना गोका रिस्, मेनिचाइटिस् तयाँ कभी को लुरिस युक्त तथा ललाई लिये होती है। चारों पाश्यों के विधान और न्यूमोनियर्फ लक्षण मौजूद रहते है। खून घेशी सिरमके द्वारा स्फोत तथा वहांका समक्षा अंगुलीसे • फाइयिन् उत्पन्न होता है तथा उसमें सभायता सदन . दबानेसे घस जाता है । अङ्ग हिलाने डुलानेले घेदना होतो अशफा तीसरा श फाइमिन रहता है, किन्तु इस पीड़ा है। घेदना कनकन तथा समय समय पर यह ऐसी मसाब में यह द्विगुण रहता है । मून चूसकर कांचर्फ गिलासमें - हो...जातो है, कि रोगी चिला कर रोने लगता है। . निगेसे उस पर गायी चरबी या तेलके समान मलाई सन्धिके अधिक कति होनेसे कभी कभी वेदना कम हो पड़ जाती है। . . . . . .

. जाती है। .. ...

'--'साधारण लक्षण-सरोवर ज्ञात और कम्प द्वारा सर्पदा पएटोकाइटिस, पेरिकाद्वारिम, निमो. • पोड़ा शुरू हो कर पोडे ज्यर माता । चमड़ा गरम तथा| निया तथा प्लुरिसि उपस्थित होते हैं। लोको अपेक्षा • पमोमेसे भरा रहता है, कभी फगो उस पर फुन्सियों होते। पुरुषमें मधिक परिकार्दाइटिस् द्रष्टिगोचर होता है। "देखी जाती हैं । पसीनेसे एक प्रकारको हो गन्ध निक कारण जवान पुरुष हमेशा कटकर पयसाय अवलम्यन लती है गांठमे घेदना होनेसे रोगीका मुख मलिन भार, करता है। कहीं कहीं पेरिटोमाइटिस, मेनिजाइटिस, कटकर होता है। नाही ते मे चलना है। प्यास, कोरिया, टेन्सिलाइटिस्, मायालमिया, ससरोटाइटिस अधिक लगती है, भूप कम हो जाती है, जोम | या माइराइटिम देखे जाते हैं। परधिमा, भार्टि कोरिया ..मैलसे भर जाती है, मल रद हो जाता है, यस्थिरता तथा पर्षिउरा मादि चर्मरोगोंगे मो इष्टिगोचर होता. प्रति कमो कभी प्रलाप भादि लक्षण वर्तमान रहते भून दिन हपिण्डको परीक्षा करमी उमित है। युवक मेगा , Vol, XXI. 20