पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७९४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


६९० विष्णु पूर्वाधृत.ऋक का भाव निम्नलिखित ऋकों में भी भाष्यमें विष्णुके निविक्रम अवतारको माहात्म्यविषयक पुनरुक्त हुआ है। यथा- काका उल्लेख किया है। विष्णुका परम माहात्म्य __ "सखे विष्णो वितरं विक्राम्य छौ हिलोकं बज्राय ! भी इस ऋक में गया है। विष्को हनावत' रिणनाय मिधून इन्द्रस्य यतु । द्वितीय , क में लिखा है, कि विष्णुको महिमाका . प्रसवे विगृष्ठ ।" अरत नहीं है। इनकी महिमा अनन्त है। विष्णुका .. यहां भी इन्द्रने विष्णुको सखा कह कर सम्योधन माहात्म्य सयों को विदित होना असम्भव है । भगवान्ने किया है तथा नृत्रासुरको वध करने के लिये विष्णुको , धुलोकको ऊपर उठाये रखा है। विष्णुपी शकिसे ही सहायता ली है। भगवान् जो इन्द्रादिके भी मपूज्य । घलोक ऊपरसे नहीं गिर सकता। पृषिथ्यादि भी धन्धु है, इन सब ऋकोंमें हम उमका प्रमाण पाते हैं। भगवान् कत्तक विधृत है। इसके द्वारा भगवान् इससे हमें यह भी मालूम होता है, कि भगवान् इन्द्रके। शक्तिके यदुल कार्यकारित्य सम्बन्ध एक माभाम सखा हैं। ऋग्वेदमें इन्द्र और विष्णुका म्तय अनेक पाया जा सकता है। . . म्धलों में ही पफत निबद्ध हुआ है। कोई कोई समझते हैं, कि भगवान सूर्य के ही दूसरे ___ भगवान जो सभी जीवों के सुखसमृद्धि देनेमें मय नामसे ऋग्वेदमें परिचित है। यह यात अयौक्तिक और देवताओंसे अधिक शक्तिशाली हैं, ६ष्ठ मण्डल ४८ , अप्रामाणिक है। भगवान के अनेक कार्य सूर्य के मद्दश सूक्तको १४वी ऋक में हम उसका प्रमाण पाते हैं । है। किन्तु वे स्वयं सूर्य नहीं हैं, पर हां सूर्यमें . ' यथा- अनुमविष्ट अवश्य रहे है। भगयान्फे ध्यान में भी उन्हें । हे पूपन ! मैं तुम्हारा स्तव करता है, तुम इन्द्रको तरह : "सायिनोमण्डलमध्यवती" कहा गया है। सूर्य उन्हों की दयालु हो, वरुणकी तरह अद्भुत शक्तिशाली हो, अर्यमा. ' शक्तिसे शक्तिमान हैं. इसका मी यथेए प्रमाण मिलता की तरह शानी हो तथा भगवान की तरह मव प्रकारको है। उद्ध त ७ मण्डल के सूक्तको चौथी क पढ़ने. भोगसम्पत्तिके दाता हो । इत्यादि । । से मालूम होता है, कि "इन्द्र और भगवान् इन्होंने ऋग्वेदके पष्ठमण्डलके ५० सूक्तको १२वी' ऋक में। सूर्ण, अग्नि और ऊपाको उत्पादन , कर यजमानके रुद्र सरस्वती आदि देवताओं के साथ भगवान्फे समीप लिपे विस्तीर्ण लोक निर्माण कर रखा है।" .. प्रार्थनासूचक स्तव है। यथा- । उद्ध, त पञ्चम शक में इन्द्र और भगवानने मिल कर "ते नो रुद्रः सरस्यतो सजोषा मिड हष्मत्तो विष्णु असुरका महोर किया है, इसका उदाहरण दिया. गया ... मुंडन्तु वायुः। रिभुक्षा वाजो देयो विधाता पर्जन्या है। भगवान द्वारा शम्बर आदिकी पुरी-विनाशका वाता पिप्यतामिपां नः" विवरण ऋग्वेदमें सूताकारमें वर्णित है । पुराणमें इसका अर्थात् रुद सरस्वती भगवान् और वायु ये सभी विशेष विघरण देखने में आता है। धचि नामक असुरको सुखदाता हैं। घे दम लोगों पर कृपा दरसाये। रिभुक्षा दलबल के साथ सहार करनेका विवरण भी इस सूक्तमें बाज, पर्जन्य और बात हम लोगों की शक्ति बढ़ावे।। दिखाई देता है। सप्तम मण्डल के ३५ सूक्तको ध्वी ऋको, ३६ सूक्तको अधिकांश स्थलों में "उरगाय" शब्द भगवान्के . ६ ऋकमें, ३६ सूक्तकी ५ कमें, ४० सूक्तको ५ ऋकमें, विशेषणरूपमें व्यवहत हुमा है। श्रीमद्भागवतपुराणमें .. ४४ सूक्तको १ ऋक्में तथा १३ सूक्तको स्वा' अकौ | मो इस शब्दका बहुल प्रचार दिखाई देता है। उरगाय- अन्यान्य देवताओं के माथ विष्णुका उल्लेख है। शब्दका अर्थ है. बहुजन द्वारा गीयमान । विष्णु जो .. सप्तममण्डल के ६ सूक्तको प्रथमसं सात अर्को वैदिक देवतामों में प्रधानतम देवता तथा सूर्य, शादिके विष्णुफा यथेष्ट माहात्म्य कीर्तित हुआ है। उत्पादक हैं, यह भी ऋग्वेद में लिखा है। श्रीभागवतम इस सूक्तको प्रथम ऋषको ध्याच्या सायणने अपने जो श्रयण, कोत्तंन, स्मरण, पादसेवन, गर्जन, मान '