पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८०१

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विष्णुपुर ७०१० 'नवजात शिशुको यहीं छोड स्वामीको अनुगामिनी हुई।। प्रवाद है, कि रघुनाथ ही विष्णुपुरके प्रथम मल्ल इस घटनाफे. बाद श्रीकाशमितिया नामक वागदी जाति- राजा थे । इस राजवशने प्रायः ११०० वर्ष राज्य किया का एक लकड़हारा उस पश्य को अपने यहां उठा ले गया । राजा रघुनाथ वा आदिमल्लने बड़े यत्नसे समृद्धिशाली . . और सात वर्ष तक उसका लालन-पालन किया। एक विष्णुपुर नगरको बसाया था। बहुत समय तक विष्णुः दिन किसी ब्राह्मणको उस शिशु पर नजर पड़ गई । उसके पुर राज्य मल्लभूमि और जङ्गल महाल कह कर प्रसिद्ध ... सौन्दर्य पर विमुग्ध हो तथा उसे राजोचित लक्षणाक्रान्त रहा अभी ये सब स्थान वर्द्धमान, पांकुड़ा और घोर- देख्न घे उसको गपने यहां उठा ले गये। यह ब्राह्मण भूम जिलेके अन्तर्गत हो गया है। दारिद्रयवशत: उस बालकको गाय चराने तथा भरण- विष्णुपुरके राजा अधीनस्थ वाग्दोघीरोंकी सहायता. पोपणके लिपे गृहकार्य में नियुक्त करनेको वाध्य हुए थे। से महाराष्ट्रीय विश्लधकालमें मुर्शिदायादफे नयाघको घाग दियों ने उनका नाम रघुनाथ रखा था। एक दिन भासो मदद पहुचाई थी। विष्णुपुर राजाको सहा- रघुनाथको एक गाय अपने दलसे कहीं निकल गई।। यतासे मराठोंका दमन हुया था। घिष्णुपुरके राजा रघुनाथने अगलमें उसे तमाम हुँदा, पर यह गाय नही | मुर्शिदाबाद नवावके करद गजाओंमें बहुत प्रसिद्ध थे।

मिलो। आखिर भूख-प्याससे कातर हो यह उसी ' विष्णुपुर-राजगग महापि घंशीय क्षत्रिय हैं,

निज'न घनमें एक वृक्षके नौवे सो रहा। जय यह खूब | सालदेव और पुरादेयोके सेवक और राजगण माम- ..गाढ़ी नोंदमें सो रहा था, तब एक भयङ्कर गोखुरा सांप बेदीय कुथुमोशाग्ना है। इनके ऋषि विश्वामित्र है। पासपाली गुल्मलतासे निकल कर चालकके पास माया | आज भी इन्हें यज्ञोपवीत धारणकै समय पवित्र 'गाथा' • और उसके ऊपर अपना रजित फण फैला कर सूर्या.. मन दिया जाता है। यिष्णुपुरके ५६ रागामें कुछका किरणको रोकने लगा था। विवरण नीचे दिया जाता है। एक दिन नदी में स्नान करते समय रघुनाथने सोने वाग्दियोंने राज्याभिषेककालमें १म रघुनाथसिंहको का एक गोला पाया और उसे अपने मालिकको दे दिया। | आदिमलकी उपाधि दी। मादिमलने ७१५ ई० मे जन्म मालिकने उसे बालकके भविष्य उन्नतिचिहस्वरूप समम् । प्रहण किया। घे १ मलाग्दमें यहाँक राजा हुप तथा . पड़े हर्षसे रख लिया। इसके कुछ समय बाद यहां । ३४ वर्ष तक उन्होंने राज्य किया। उनको रानी चन्द्र . जङ्गली राजाकी मृत्यु हुई। अन्त्येष्टिक्रियाको तैयारी कुमारो पश्चिम प्रदेशस्थ सूर्यवंशीय राजा इन्द्रसिंहकी . बड़ी धूमधामसे हुई। सभी देशोके लोग निमन्तित कन्या थीं। उन्होंने पान्येश्वरीफे नामसे एक मन्दिर . हुए। दरिद्र ब्राह्मणने भी पुत्र रघुको ले दूसरे दूसरे बनवाया था। लेघप्राममें उनकी राजधानी थी। .ग्राह्मणों के साथ राजपुरीमें प्रवेश किया। जब ग्राह्मण २५ राजा जयमल्ल पादमे यिष्णुपुरके राजा हुए। • भोजन हो रहा था, उसी समय स्वगीय राजाका सवारी ७४६ ईमें उनका जन्म हुआ तथा ३३ मल्लादिमें ये राजा '. • हाथो सूड़ बढ़ाना हुमा आया और रघुनाथको मपनी हुए । ३० वर्ष राज्य करके ६४ मल्लाब्दमें उनका देहान्त पोट पर बैठा कर शून्यराजसिहासनकी ओर अग्रसर हुआ। उनको रानी दोनुसिंह नामक पश्चिम प्रदेशीय हुमा । यह अद्भुत घटना देख पहले तो सभी लोग सूर्यवंशीय राजाको कन्या थी। राजा जयमलने सात पत्राहतको तरह पड़े रहे, बादमें इसे दैविक घटना चरविहारोदेवके नाम पर एक मन्दिर बनवाया। वे समझ उन लोगोंने आनन्दकोलाहलसे दिङमण्डलको ! क्षमताशाली राजा थे। उनके समय यिष्णुपुरका सैन्य- -गुजा दिया। राजमनीने घालकको राजमुकुट पहनाया। बल बहुत बढ़ गया था। और उसे राजपद पर अभिषिक्त किया। इस समय ३य राजा (धेनुमाल)का जम्म ७७६ में हुआ | गायक, यादक, पन्दी गौर धर्मयाजकगण फूले न समाये । उन्होंने ६४ मलाइदमें राजा हा कर कारह वर्ष तक राज्य और सभी अपना अपना कर्त्तव्य पालन करने लगे। किया । “मतिपर सिंह नामक पाश्चात्य सूर्यवंशीय Vol. xxI, 176 .