पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८०२

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विधापुर राजकुमारी काञ्चनमणि उनकी पत्नो थी। इनके पांच । तथा उसके प्राचीरगान में कमान बडो को गई। उन्होंने पुत्र थे । ज्येष्टपुत्र हो राज्याधिकारी हुए। किन्तु ) मुर्शिदाबादके नवाव विरुद्ध सेना भेजी थी। अन्त में अभी उनका वश लोप हो गया है। उन्हें राजरूपमें स्वीकार कर १६७००० मुद्रा राजकर - १६ वे राजा जगत्मलने २७५ मल्लान्द (880 ई०)में देनेके वाद घे अपने राज्य लौट आये। वीर हम्बीर देखो। जन्मप्रहण किया। ३१८ मल्ल शकमें (१०३३ ई० मे ) घे ५५, राजा गोपालसिदका' जन्म ६७२ म० अ० में । राजा हुए और ३३६ मल्लशक (१७५१ ई०में ) उनका | और देवान्त १०५५ 'मल्लाद ( . १७०८ ई० ) में देहात हुआ। उन्होंने गोलकसिहको कन्या चन्द्रावती हुआ। चे ३८ वर्ष तक राज्य कर गये। उन्होंने का पाणिग्रहण किया था। इस समय विष्णुपुर एक | तुङ्गभूमिके . राजा रघुनाथ तुङ्गको कन्यासे विवाद . जगद्विख्यात नगर था, यहां तक कि स्वर्गके इन्द्रभवनसे किया। उनके राजत्यकालमे. पांच देवमन्दिर भो वह मनारम समझा जाता था। उस समय विष्णु बनाये गये। उनके राज्यकालमै मास्कर पण्डितका पुरको सौधराजि श्वेतमर्मर पत्थरको बनी हुई थी। अधिनायकता परिचालित महाराष्ट्रीय सेनादलने विष्णु- पुरी नाट्यमञ्च, तोपनाना, वासगृह, और परिच्छदा., पुर दुर्गके दक्षिण तोरण पर आक्रमण किया। राजा गार विराजमान था। हस्तिशाला, सैन्यशाला, अश्व सेनाओं के साथ स्वयं युद्धक्षेत्रमें उपस्थित थे, किन्तु शाला, शस्यागार, अस्त्रागार, कोपागार और देवमन्दिर उनकी अदृष्टदेवी शत के पक्षमें थो, इस कारण उनको विष्णुपुरकी शोभा बढ़ा रहे थे। राजा जगत्मल्लक हार हुई। अन्तमें मदनमोहन देवकी कृपासे उन्होंने पुनः समय बहुत दूर दूर देशके वणिर्कोने विष्णुपुरमे आ कर । शन ओ को परास्त किया। कहते हैं, कि मदनमोहनको आढ़त खोला था। कृपासे गोपालसिहके आग्नेयास्त्रने स्वयं ही विपक्षोदलं १३३वे राजा रायमल्ल ५६४ मल्लाद ( १२७७ ई. में' पर अग्नि उद्गारण की यो। . सिंहासन पर बैठे और ५८७ म० भ० (१३०० ई०में) किसी दूसरेका कहना है, कि राजाने इस युद्ध में . स्वर्गको सिधारे। उन्होंने २३ वर्ष तक राज्य किया था। अच्छा पराक्रम दिखाया तथा असाधारण शिक्षा गौर .. उनका पत्ता नन्दलालसिंहकी कन्या सुकुमारी वाई थी। शक्तिधलसे अनेक विपक्षो . सेनाओंको यमपुर भेज उनके समय दुर्गका भी वडी उन्नति हुई थी। इस समय दिया था, किन्तु जब उन्होंने देखा, कि वे रणक्षेत्रमें अनेक प्रकारके आग्नेय अस्त्र दुर्गमें लाये और रखे गये प्रधान सेनापतिको मार, नहीं सकते तथा मराठोंके थे। सेनाओंको सुन्दर परिच्छेदसे सजानेकी व्यवस्था विरुद्ध अवधारण करनेको उनमें शक्ति न रह यो। उनका सनाओंके माक्रामणसे कोई भी उस ! गई, तब उन्होंने दुर्गम आश्रय लिया। इसी समय समय विष्णुपुर पर आक्रमण करनेका साहस नहीं' मराठादलने असीम साहससे राजदुर्ग पर चढ़ाई कर करता था। . दी, किन्तु राजाको सुशिक्षित कमानवाही सेनादलकी ४८' राजा वार हम्योरने ८६८ , मल्लादमें जन्म । लगातार अग्निदृष्टि से तंग आकाचे लोट जानेको बाध्य लिया। वे ८८१ म० अ० (१५६६ ई० ) में राजा हुए। हुए। युद्धमें महाराष्ट्र-सेनापति पञ्चत्यको प्राप्त हुए, उन्होंने २६ वर्ष राज्य किया। उनके चार स्त्री और विष्णुपुरकी सेना विपक्षके द्रव्यादि लूट कर दुर्गमें वापिस . २५ पुत्र थे। गृन्दावनसे श्रीनिवासाचार्या जो लाखलं । आई। उन्होंके शासनकालमें वर्द्धमानके राजा कीर्ति । अधिक बोष्णव प्रन्ध साथमे लाये थे, वे इन्होंके कौशल- ' चन्द्र बहादुरने विष्णुपुर पर माफमण कर राजाको से लूटे गये । आखिर वे श्रीनिवासाचार्याक निकट । परास्त :. . ..इसके कुछ समय बाद ही फिरसे वैष्णव-धर्ममें दीक्षित हुए। तभीसे मल्लरा दोनोंने विरुद्ध अनधारण किया था। निवासाचार्य के वंशधरोंफ मन्तशिष्य हैं। विष्णुपुरफ सिंहासन पर बैठे के समय नीन देवमन्दिर बनाये गये, दुर्ग पi. -- जामकुण्डो देश मिला। तथा:

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