पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८०४

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७०२ - विधणुपुर राजकुमारी काञ्चनमणि उनकी पत्नी थी। इनके पांच । तथा उसके प्राचौरगान में कमान खड़ो की गई। उन्होंने । पुत थे । ज्येष्ठपुत्र हो राज्याधिकारी हुए। किन्तु : मुर्शिदावादफे नवायक विरुद्ध सेना भेजी थी। अन्त में अभी उनका वश लोप हो गया है। उन्हें राजरूपमे खाकार कर १६७००० मुद्रा राजफर , . १६ राजा जगत्मलने २७५ मल्लान्द (880 ई०) देनेके बाद वे अपने राज्य लौट आये । वीर हम्बीर देखो। । जन्मग्रहण किया। ३१८ मरल शकमें (१०३३ ई०में ) ये . .५५वे राजा गोपालसिंहका जन्म ६७२ म० अ० में राजा हुए और ३३६ मल्ल शक ( १७५१ ई० में ) उनका और देहान्त , १०५५ मल्लाद ( १७०८ ई० ) में देहान्त हुआ। उन्होंने गोलकसिंहकी कन्या चन्द्रावतो. हुआ। वे ३८ वर्ष तक राज्य कर • गये।' उन्होंने का पाणिग्रहण किया था। इस समय विष्णुपुर एक! तुङ्गभूमिकं 'राजा रघुनाथ तुङ्गको कन्यासे यियाह जगद्विख्यात नगर था, यहां तक कि स्वर्गके इन्द्रभवनसे | किया। उनके राजत्यकालमें पांच देवमन्दिर भी वह मनोरम समझा जाता था। उस समय विष्णु-1 बनाये गये। उनके राज्यकालमें भास्कर पण्डितका परको साँघराजि श्वेतमर्मर पत्थरकी बनी हुई थी। अधिनायकता परिचालित महाराष्ट्रीय समादलने विष्णु. पुरोमें नाट्यमञ्च, तोपनाना, वासगृह, और परिच्छदा पुर दुर्गके दक्षिण तोरण पर आक्रमण किया। राजा गार विराजमान था। हस्तिशाला, सैन्यशाला, अश्व सेनाओं के साथ स्वयं युद्धक्षेत्रमें उपस्थित थे, किन्तु शाला, शस्यागार, अस्त्रागार, कोपागार और देवमन्दिर उनको अदृष्टदेवी शत्र के पक्षमें थो, इस कारण उनको विष्णुपुरकी शोभा बढ़ा रहे थे। राजा जगत्महलके हार हुई । अन्तमें मदनमोहन देवको कपासे उन्होंने पुनः समय बहुत दूर दूर देशके वणिकोने विष्णुपुरमे आ कर शव ओ'को परोस्त किया। कहते हैं, कि मदनमोहनको आढ़त खोला था। कृपासे गोपालसिहफे आग्नेयास्त्रने स्वयं हो विपक्षोदल १३३वे राजा रायमल्ल ५६४ मल्लाद । १२७७ ई० )में · पर अग्नि उद्गोरण को थो। सिंहासन पर बैठे और ५८७ म० अ० (१३०० ईमें) किसी दूसरेका कहना है, कि राजाने इस युद्ध में स्वर्गको सिधारे। उन्होंने २३ वर्ष तक राज्य किया था। अच्छा पराक्रम दिखाया तथा असाधारण शिक्षा गौर उनका पता नन्दलालसिंहकी कन्या सुकुमारी वाई थी। शकिपलसे अनेक विपक्षो । सेवागोंको यमपुर भेज उनके समय दुर्गको भी बडी उन्नति हुई थी। इस समय दिया था. किन्तु जब उन्होंने देखा, कि वे रणक्षेत्रमे अनेक प्रकारफे आग्नेय अत्र दुर्गमे लाये और रखे गये प्रधान सेनापतिको मार नहीं सकते तथा मराठों के थे। सेनाओंको सुन्दर परिच्छेदसं सजानेकी व्यवस्था विरुद्ध अस्त्रधारण , करनेको उनमें शक्ति न रह थी। उनका सेनाओंके आक्रामणसे कोई भी उस गई, तब उन्होंने दुर्गमें माश्रय लिया। इसी समय समय विष्णुपुर पर आक्रमण करनेका साहस नहीं। मराठादलने असीम साहससे राजदुर्ग पर चढ़ाई कर करता था। दी, किन्नु राजाको सुशिक्षित कमानवाही सेनादलकी ४८वे राजा चार हम्बारने ८६८ मल्लाप्दमें जन्म लगातार अग्निदृष्टि से तंग आ कर लौट जानेको वाध्य लिया। वे ८८१ म० अ० (१५६६ ई० ) में राजा हुए। हुए। युद्ध में महाराष्ट्र-सेनापति पञ्चत्वको प्राप्त हुए, उन्होंने २६ वर्ष. राज्य किया। उनके चार स्त्री और विष्णुपुरकी सेना विपक्षके द्रष्यादि लूट कर दुर्गमें वापिस . २५ पुत्र थे। मृन्दावनसे श्रीनिवासाचार्या जो लाखस। आई। उन्होंके शासनकालमें वर्द्धमानके राजा कीर्शि. अधिक बोष्णव अन्य साथमे लाये थे, वे इन्हीं के कौशल- चन्द्र बहादुरने विष्णुपुर पर आक्रमण कर राजाको से लूटे गये । आखिर वे श्रीनिवासाचार्य के निकट परास्त किया। इसके कुछ समय बाद ही फिरम बष्णव धर्ममें दीक्षित हुए । 'तमीसे मल्लराजवश श्री. दोनोंने मिल कर मराठोंके विरुद्ध अनधारण किया था। निवासाचार्यके वशधरोंफ मन्त्रशिष्य हैं । वीर इम्योर- ! राजाके वड़े लड़के विष्णुपुरम सिंहासन पर बैठे के समय नीन देवमन्दिर बनाये गये, दुर्ग परिखाशोभित । तथा • छोटेको जागोरस्वरूप जामकुण्डो देश मिला।