पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८११

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विसज्यं -विसर्प 08 यिम (सं० वि०) यि सृज-यत् । सिर्जनीय, विस- पहिर्भागमें प्रकुपित हो कर वहिर्विसर्प तथा पहिरन्तः जन करने योग्य। दोनों स्थानमें प्रकुपित हो कर यहिरन्तास रोग पिसा:(सं० पु०) वि.सृप-घम् । रोगविशेष । पर्याय उत्पादन करता है। विसर्गि, सचिवामय । (राजनि०) चरक, इस रोगका वामका उपघात, मल, मूत और भ्यास, प्रश्वा. विषय यों लिखा है-अग्निवेशके पूछने पर माने यने सादिका मार्गसंरोध अथवा उनका विघट्टन, तृष्णाका कहा था, कि यह रोग मानवशरीरमें विविध प्रकारसे मतियोग, मलमूलादिका धेग-पम्य तथा अग्निवलका सर्पण करता है, इस कारण इसका नाम विमर्श हुआ | आशय, इन सब लक्षणों द्वारा अन्तर्विस स्थिर करना हैं। अश्या परि अर्थात् सान सर्पण करनेके कारण होता है। इसे परिसन भी कहते हैं। ____इसके विपरीत लक्षण द्वारा अर्थात् पक्षामका - कुपित वातादिदोपसे यह रोग सात प्रकारसे उत्पन्न अनुपघात, मलमूलादिमार्गका असरोध और अविघटन, होता है। रत, लमीका, त्वक् गौर मांस ये चार दूष्य । तृष्णाका अनतियोग, मलमूत्रादिवेगकी अयथावत्प्रवृत्ति हैं तथा वायु, पित्त और कफ ये तीन कुल मिला कर तथा अग्निवलका असक्षय पे सप वहिर्विस के लक्षण सात धातु विसर्प रोगको उपादान सामग्री है। रक्त- है। उक्त सभी प्रकारके लक्षण तथा निम्नोक्त असाध्य लसोकादि चार धातु गौर पातादि तीन दोपोंसे यह रोग लक्षण दिखाई देनेसे उसको अन्तर्वदिविसर्ग कहते हैं। उत्पन्न होता है. इस कारण इसको सप्तधातुक भी जिसका निदान बलवान् है तथा उपद्य अति कष्टप्रद है कहते हैं। और जो विसर्प मोगत है यह रोगीफे प्राण लेते हैं। निदान-लपण, आम, कटु और उष्णवीर्ण रस अति-। वातविसर्पका लक्षण-रुक्ष और उणसे अथवा माता सेवन, अम्ल, दधि और दधिके जलसे प्रस्तुत । रुक्ष और उष्ण घस्तु अधिक परिमाणमें खानेसे घायु शुक्त, सुरा, सौवीर, विकृत और यहुपरिमित मय, शाक, सञ्चित और प्रदुए हो रसरकादि द्रव्य पदार्थो को दूषित आद्रकादि द्रव्य, विदाहिद्रष्य, धिकूर्चिका, तक्रकूर्चिका कर यह रोग उत्पादन करती है। उस समय भ्रम, उप और दधिको अल सेवन, दधिकृत शिलरिणी सेवनके । ताप, पिपासा, सूचीवेधवत् और शूलनिखातवत् वेदना, वाद विण्डालुकादि सेवन, तिल, उड़द, कुलथी, तैल, अनकुटन, उद्वेष्टन, कम्प, ज्यर, तमक, कास, मस्थि- पिष्टक तथा प्राम्य और मानूपमांस सेवन, अधिक भगवत् और संधिभगवत्-यत्रणा, वियता, वमन, भोजन, दिवानिद्रा, अपकद्रव्यभोजन, अध्यशन, शतबन्ध अयचि, अपरिपाक, दोनों नेत्रका आकुलत और मजलत्व प्रपतन, रोद्राग्नि आदिका अतिसेवन, इन सब कारणोंसे तथा गात्रमे विपीलिका-सञ्चरणवत् प्रतीत होती है। वातादिदोपत्नय दूषित हो कर यह रोग उत्पन्न करते हैं। शरीरके जिस स्थानमें विसर्प विसपण करता है, वह महिताशो व्यक्तिके उक्त प्रकारसे दूषित पार्तापत्तादि । स्थान काला या लाल हो जाता है, वहां सूजन पड़ता है रसरक्तादि पदार्थो को दूपित कर शरीरमें विसर्पिन तथा अत्यात वेदना हातो है । इससे सिवा उस स्थानको होता है। . विसर्ग शरीरका दिप्रदेश, अन्तःप्रदेश और शांति, सङ्कोच, हप, स्फुरण पे सर लक्षण दिखाई देते वहिरन्तः, इन दोनों प्रदेशोंकी आध्रय फर उत्पन्न होता है। इससे रोगी अत्यंत पीड़ित हो जाता है। यदि है। ये यथाक्रम बलवान है अर्थात् पहिाधित विसर्ग चिकित्सा न की जाय, तो यहांका चमड़ा पतला हो की अपेक्षा अन्त:श्रित तथा उससे • यहिरातः दोनों | जाता है और लाल या काली फुसियां निकल जाती हैं। 'प्रदेशाधित विसर्ग.भयङ्कर होता है। यहि गांधित ये सब फुसिया जल्दो फट जाती है तथा उससे पतला विसर्प साध्य, गन्तर्मार्गाधित कृच्छसाध्य तथा उभया. विषम दारुण और अल्पस्राव निकलता है। रोगीका श्रित विसरोग असाध्य होता है। ' ' मलमूत्र और अधोवायु रुक जाती है। घातादिदोषत्रय भोतरमें प्रकुपित हो कर अन्तर्विसर्प, पित्त विसर्पका लक्षण-उष्ण पके सेवन तथा _Vol. xx! . 178