पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८१३

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विसर्प ७११ . प्रन्थिविसर्प-स्थिर, गुरु, कोठन, मधुर, शीतल, | होनेसे लङ्घन, घमन, तिक्तद्रव्य सेवन तथा राक्ष और स्निग्ध आदि अभिष्यन्दो अन्नपानका सेवन और | शीतल प्रलेपन प्रशस्त है। आमोपान्वित विसर्प पित्त- श्रमगहित्य आदि कारणोंसे श्लेषमा और वायु कुपित स्थानगत होनेसे भी इसी प्रकार चिकित्सा करनी होगी, होती है। यह प्रकुपित और प्रदुद्ध बलवान् श्लेष्मा ! उसमे विरेचन मोर रक्तमोक्षण विशेष हितकर है। माम और घायुरकादि दूष्य चतुष्टयको दूषित कर प्रन्धिविसर्प दोपायित यिसर्प पफ्याशयसम्भूत है। उसमें रफ्न उत्पादन करता है। प्रदुए कफस जब घायुका रास्ता | और दोप रहनेसे पहले यिशक्षण क्रिया कर्त्तव्य है। दन्द हो जाता है, तब यद्द वायु उस अवरोधक कफको पोंकि, बामदेोप रहनेसे उसमे स्नेहनक्रिया हितजनक हो अनेक भागोंमें विभक्त कर कफाशयमें धीरे धीरे नहीं है। यातोल्बण और पित्तोल्बण विमर्प यदि लघु- प्रधिमाला उत्पादन करता है। यह प्रथिमाला कृच्छ | दोप हो, तो तिफ्तकघृत हितकर है, किन्तु यदि पैत्तिक पाक है अर्थात् प्रायः नद्दा पकतो और कृच्छसाध्य हो विसर्प महादोषान्वित हो, तो उसमें विरेचन प्रशस्त है। जातो है। विमर्ग रोगका दोपसञ्चय अधिक परिमाणमें रहने से इस प्रकार दूषित वायु रक्तबहुल यक्ति के रक्तको घृतप्रयोग कर्त्तय नहीं है, यहां विरेचन कराना आवश्यक दूषित कर यदि शिरा, स्नायु, मांस और त्वको प्रन्थि है। क्योंकि घृतपानसे चे सश्चितदोष उपस्तब्ध हो माला उत्पादन करे तथा यह प्रधिमाला तीन वेदनाम्यित, त्व, मांस और रक्तको सड़ा देते हैं। अतएव बहु स्थल, सूक्ष्म वा वृत्ताकार और रत्तवर्ण हो, तो उनके दोपाकान्त विसर्परागमें विरेचन और रक्तमोक्षण विशेष उपतापसे ज्यर, अतिसार, हिका, भ्यास, कास, शोप, प्रशस्त है। कारण, रफ्त ही विसर्पका आश्रयस्थान है। मोह, वैषर्ण, अरुचि, अपरिपाक, प्रसेक, पमि, मूर्छा, | कफज, पित्तज और कफपिच विसर्परागर्म मुलेठी, नोम गङ्गभङ्ग, निद्रा, भरति और अवसाद आदि उपद्रव उप | और इन्द्रजीफे कपायमै मैनाफलका करक मिला कर और स्थित होते हैं। यह यिसर्पराग भी यमाध्य है। पोछे उसे पिला कर वमन करावे। परवल के पत्ते और . सानिपातिकविमर्ग--जो सब निदानसम्भूत, सर्भः | नीमके काढ़े या पीपलके काढ़े अथवा इन्द्रजौके काढ़े में लक्षणयुक्त तथा सम्पूर्ण शरीर व्याप्त, सर्मधातुगत, मैनाफलका चूर मिला कर उसके पान द्वारा यमन कराने आशुकारी भीर महाविपजनक होता है वही माग्नि-1 से भी उपकार होता है। मदनकल्कादियोग भी इस गेगमे पातिक विसर्ग है। पह भो असाध्य है। विशेष उपकारी है। वातज, पित्तज और कफज यिसर्प साध्य है। यथा- | ___हाथ और पांचका रफ्त खराब होनेसे पहले रक्तको विधान इनकी चिकित्सा करनेसे उपकार होता है। निकाल साले। रपत यदि यातान्वित हो, तो शह द्वारा, अग्निविमर्प और कर्दमाण्य विसर्प पहले असाध्य कह | पित्तावित हो, तो जोंक द्वारा और यदि कफाधित हो, कर उल्लिखित हुआ है, किन्तु इन दोनों विसर्पो में यदि तो अलावू द्वारा रक्तमोक्षण करे । भरीरके जिस स्थान में ज्यरादि उपद्रवरहित पक्षोमर्ग अनुपहत, शिरा, स्नायु | विसपं होता है, उस स्थानकी नजदीकयालो शिराओं की और मांस क्लिन्नमात्र हो अर्थात् मांस सड़ कर न गिरे | जल्द येध कर डालना चाहिये। क्योंकि यदि रफ्त नहीं तथा उस सववसे शिरा और स्नायु न दिखाई देतो हो, | निकाला जायेगा, तो रक्तक्ल दसे त्वक, मांस और तो इसमें यथाविधान स्वस्त्ययनादि देव चिकित्सा और | स्नायुका भी क्लद उत्पन्न होगा। फौष्ठादिदोप उपत उपयक्त ऑपधादि द्वारा साधारण चिकित्सा करनेसे | प्रकारसे हटा दिये जाने पर भी यदि स्वक मोर मांसको माराम भी हो सकता है। प्रधिविसप मो यदि ज्यराति । आधय कर कुछ दोष रह जाये, तो वह अपदोषाकान्त सारादि उपद्रवरहित हो, तो उसकी भी चिकित्सा की विसर्प निनिफ्त याद्यक्रिया द्वारा प्रशमित होगा। . जा सकता है। गूलरकी छाल, मुलेठो, पदमकेशर, नीलोत्पल, निकित्सा-मामहापारिबत पिसके कफस्थानगत । नागेश्वर और प्रियंगु इन्हें एक साथ पोस घृतयुक्त कर