पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८२

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८. वातंव्याधि या राइने Mistick.), पोको पेशी रोगाकान्त | - (Vapour bain) कराया जाता है। कहीं कहीं भीगा या .. होनेसे 'डॉडिनिया ( Dorshiynini) F कमर पेशीमें सूखा कापिं और जोक लगानेसे फायदा होता है। - .. गान्त होनेसे लम्यगा( Limlongo) यी पंडरको रोग पुराना हो जाने पर लोग मा पमोनिया, . पेशी मोगान्ति होनेसे प्लुगडिनिया (iirteltodyain ) | पोटाशी आइगोड, गोपेकम् मेजिन, आर्सेनिक, नाना कहते हैं। इनमेंसे कितने ही विषयोंको विस्तार रूगसे प्रकारके. घालसम्, फलचिकम, टि एफटिया रेमिमोती , गालांचना.फरनेको जरूरत है। . .. . .. तधा मेजेरियन आदि व्यवहार करनेको विधि : कभी कभी-याए पंजरेके नीचे की पेशी तथा एर पुराने योगदादायित धान र दाभो. कटल्स पेहोरालंस और सेरेल्स मैगनस आदि मांस | डिन, लिष्टर, अनेक प्रकारकी मालिश ताहित सात पेंशी.माझास्त होती है । निश्याम प्रध्यामा तथा खांसने या तथा फरिगोन्स (Corrigini) लोहगान शादि सलीन रहितकी मोनेके समय उसका घेदना बढ़ जाती है। कभी किया जाता है। . भा.प्लुरिसफे साथ इसका भ्रम हो सकता है। किन्तु गनोरियासे होनेवाला यातरोग (Gonorheat Rheuniotisni) प्लरिसिमेंवर लक्षण और 'मर्दन Frict oil) | · , प्रमेह रोगीकान्त व्यक्तिको एक प्रकारका पातरोग मौजद रहते हैं। समय समय पर जोर खांसी होनेसे होता है । डा गैरोष (Dr. Gatrhd) ने उसे पामिपर। यक्षारोगोफेसगान दोनों पंजरगे पीड़ा होती है। के समान पोड़ा बतलाया है, किन्तु डा. हचिन्सनने लम्वेगा-इसमें कमरको पफ वगलगे गथवा दोनों (Dr. llutchinson) उस प्रत यातरोग फहा हैं। । यगलमें हमेशा.कन कन् वेदना होती रहती है। रोगीको , घुटनों यह रोग अधिक देवी जाता है। किन्तु उठने बैठनेमे बड़ा दर्द होता है। यह यक हो कर चलता · दूसरी दूसरी सन्धियों: मी पीड़ित होती हैं। है। क्यानेसे तथा यहुन जगह उत्तापसे घेदना होती है। मंदानित लिम्फ और सिरम निकलता है। पीड़ित । राइनेक-इसमे सर्यदा मस्तक-चालक पेशी माकान्त | सन्धि देवनगे स्फीत, चमकीलो तथा पाकृष्ट होती है, होती रहती हैं। रोगोका का एक और टेढ़ा हो जाता कभी कभी उससे मयाद भी निकलता है। यह है . और हिलाने लानेसे वेदना होती हैं। इनके पीड़ा ईमेशा होती रहती है और सन्धिको वीचमे मध्य अलाये की पभी प्लाएटर फोसिया, डायफ्राम् और लिंगेमेएट गौर कार्टिलेज क्षनं होनेसे सभी ग्रन्धिया किन

चक्षगालककी पेशी मी माझान्त हो सकती है। दिखाई पड़ती है। कभी कभी अगसंचालनसे रोगोको

. तरुणायस्थामे पोहित. पेशी स्थिरतासे रखनी उसमें गालि स्पर्शका अनुमय होता है। समय समय चापिए । 'रोसिनियामे आमारत पाच एक टुण्डा पर अचलसन्धि (Anclhylosis) उस्थित होती है। रिफि प्लाटर द्वारा प्राप करें। लग्येगो पोडामें पम्प्लायम् | ' साधारण लक्षणों में शारीरिक अस्वस्थता, दुर्यलता फेरि द्वारा प्राप कर उसके ऊपर फलानेलका ये डेस या त्यादि लक्षण दिखाई देते है ।स पोड़ाके मोगकाल में कर रस्सना उचित है।. दुसरे दुसरे तरोफेस माष्टर्स | एएटोकाइटिस, पेरिकााइटिम तथा लुरिसि उपस्ति प्लाटर, तार्विनका संक अथवा पपिहेड फोमेण्टेपण | हो सकते हैं। एएडीकाटिस होनेसे प्राय: एण्डोका- · विधेय है। शुरुमा उत्तापसे येदना बढ़ती है। फमी डियम क्षत होता है। : : :.. कमो कोमलतासे मलनेसे उपकार होता है, लभ्येगो पीड़ा घुटना आक्रान्त होने से उसे माएटयर एत घाइके में मफियाफा कसन करने से दर्द कम हो जाता है। (ic. Intyres splint) ऊपर रह कर फोमेएट करना कोष्ठ-परिकारके लिपे गाभ्यन्तरिक विरेचक मोपय देना। चाहिये। प्रमेह रहने पर गइले उसे माराम करनेको श्रीपध

उचित है उसके बाद पोटाशी पोकाय पा माइभोषित प्रयोग करना उचित है और रात में सोमसं पायरको ,'

भयया मोटि सालिसिलेट मेयन तवां संतको अपोम प्रयोग करना • चाहिये । यदि रोगायल पसीना निकालने के लिये उग पानी और पापस्नान हो तो पहले शराब पीछे पोटाशी हिमोदि तपायात-