पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८२३

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विचिका-विस्ट ७२१ से सम्पन्न नहीं होता। मूत्र उत्पादन करने के लिये विफरी और ग्राण्डोका पनिमा दे। टाइफाइडके लक्षण पोटासी नाइट्रेस, इधर, स्कुल, टिं' कंन्धाराइडिस और उपस्थित होने पर विफटी जगए और पोटी इत्यादि .. जिन सुरा आदि मूबकारक औषध उपवहाा हैं। पल कारक आहार देना उचित है। मूत्रकारक औषध व्यवहार करके समग थोच या बिसूनो (म स्रो० ) विशेषेण सूचयनि मृत्युमिनि बि. निकि उजियेन धोमि उलेएट देना आवश्यक है। सच अब स्त्रियां ङोप । अजीर्णरोगविशेष । . मापसे सायद करना उचित नहीं । फोकि 'विस निका देखा। मल द्वारा 'कुछ परिमाणसे युरिया परित्यक्त होता है। सूत (सं० लि०') ससारधि, सारथियुक्त। धानिक-करिदेशमें कामेण्टेपण, मागाई प्लाटर सिन (स० लि.) विश्खल, खलारहित ।' 'मलग्न भौर शुष्क या माई कपि करना उचित है। • राजतर०७४) ., कमी कमी मूलत्याग करने समय भी अत्यन्त यमन, विसूलण ( स० लो०) छनमा गोर दिची होती है। इसके निवारण के लिये नेकथा, चिसूत्रता ( स० स्त्रो०) विश्वलता। विसाध मारपारकश्लिक स्प्रिट आदि दिया जाता है। ___(राजतरङ्गिनी १॥३६१) . स्थानिक औषधौ इपिगेष्ट्रिगम, सिर और इस पर विसूनित (स० वि०)वितलयुक्त, शृङ्खलारहित । माधान मFिor लेगन और सायकिल पारिवाफे विरण ( स० लो०) १ गोक, दुल। २ चिन्ता, अपर म्लिएर देनेसे कभी कभी उपकार होता है। युरि- फिक। ३ विरकि, चैराग्य। मियाके लिये निद्रायेा रहने पर गरदनमें लिएर देना बिसरित (स' को०) अनुताप, दुःख । उचित है। राइफाइडका लक्षण रहनेसे सेण्डिमको विमूरिता (स० सी० ) विसरिताज्यर । का नासको व्यवस्था है। विसूर्य (२० लि.) सूर्णरहित । (हरिवंश ) विशेष निकित्सा शोर मीपघकोमास अगस्याम विन्य (सं.वि.) सृष्टि करने योग्य । शिराम लयणलका जेक्सन करने रागी का मुख. (भागवत ६१२) मएल इयल दिखाई देता है और अन्यान्य लक्षणोंका खिन् ( म० लि. ) विक्षिप् । प्रसरणशील, लाव होता है। किन्तु.यह उपकार क्षणस्थायों है। कैलानेवाला। अत्यन्त काम्प रहनेसे.. मिनिम माता नाइट्रो. पिस्त ( स'. लो० ) १ विस्तुन, चौड़ा। २ निर्गत, ग्लिसरित दिया जाता है। अथवा, ५ मेन मावाने निकाला हुआ। ३ कपित, कहा हुआ। • फ्लोराल हाहास चमडे में जैक करना चाहिये। विष्कृत्यर ( स० वि०) वि-स-करप ( शनि सार्सम्या प्रतिषेधः चिकित्मा-जहां कालराया जा हुआ. क्वरम् । पा ३।२१६३) हस्खस्पैति तुक प्रसरणशील, फैलाने. हो, यहाँक अधियोमियों को नित्य दो वार १०।१५ घाला। मिनिम माना सलपयरिक एसिर हिल जलमें मिला, घिस्य (स०नि०) वि.सप वियप। विसर्पणशील । कर मवना देना चाहिये। सुम्याद स्वाय इथ्य नियरिसूमि (सस्त्री०) वि सूप-क्ति। विसरण, प्रसरण- मितरूपसे आहार कराना चाहिये। यहांका जल या फैलाय। दूध कदाधि पीना न चाहिये। मल और मृतदेह विसमर ( त्रि०) विशेपेण सरति तच्छोलः वि. कायोलिक पसिह छिडकना चाहिए। घरमें चूना पोत परच (संघस्यदः क्मरन् । पा श२।१६०) प्रसरणशोल, कर उसमें पिसइन्फेकटेएटोको छोरना चाहिए। फैलानेवाला! (अमर) - पय-पहले सांगूदाना अरामट, वाली, विफटो, विकेन विस्ध (सनि०) विसृज-क। १ विक्षिप्त, फेंका मए आदि तरल बाप देना उचित है। रमननिवारण हुआ। २ विशेष प्रकारसे एट, जिसको सृष्टि या होने पर दूध दिया जा सकता है। दस्त कने पर रचना विशेष प्रकारसे हुई हो। ३ परित्यक्त को Vol XxI 181 int.