पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८३८

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..: - वीज वीज (सं. फ्लो०) विशेषेण कार्यरूपेण जायते अपत्य , पारिजातसरस्वती घोज ॐ हो इसौ ॐ ह्री सरस्वत्यै .. तया च जायते इति, वि जन 'उपसर्ग च संज्ञायां इति ड , नमः। गणेशवीत गः। हेरम्यवीज-ओं गू. नमः। अम्पेयामपीति. उपसर्गसा दीर्घः, यद्वा विशेषेण जिते । हरिद्रा गणेशवीज-ग्न । लक्ष्मीयोज श्री। महालक्ष्मी. कुक्षि गच्छति शरीरं वा इंज-गतिकुत्सनयोः पचाधव वीज-ओं ऐं ह्रीं श्रीं पली हसौं जगत्प्रसूत्यै नमः । सूर्य - या योजते गच्छति गर्भाशयमिति बोज-अच । १ मूल | वीज ओं घृणिसूर्ण मादित्य । श्रीरामघोज-रामायै फारण । (गीता ७१०)२ शुक्र, वोर्य। नमः। जानकीवल्लभाय हुं स्वाहा । विष्णुयोज-ओं नमो मनुष्यशरीरके शक्तिरूप इस शुक या तत्प्रवर्तित | नारायणाय। श्रीकृष्णवीज-गोपीजनवल्लभाय स्वाहा । मोजो धातु ही वीर्य नामसे पुकारा जाता है । इसो वीर्य । वासुदेववीज-ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'। पाल- से जोवोत्पत्तिकिया परिचालित हुआ करती है। बिना गोपालवीज-गो फ्ली कृष्णार्प । लक्ष्मी वासुदेव वीजनिपेकफे सन्तानोत्पत्ति नहीं होती। . ॐ ह्रीं ही . श्री श्री लक्ष्मी वासुदेवाय नमः । (शुक्र शब्दमें विस्तृत विवरण देखो। दधिवामनवीज-30. नमो विष्णवे . : सुरपतये ३ तेज ! ४ शसाका बोज, बीमा। ५ अंकुर ।६ महावलाय स्वाहा। इयप्रोवयोज- ... " , शसादिको फल । ७ माधार । ८ निधि । १ तत्त्व । १० ॐ उदगिरत प्रणयोद्गोध सर्यवागीश्वरेश्वर । मूल । ११ तत्वावधान । (मेदिनी) १२ मजा । (राजनि०) "सर्वदेवमयाचिन्त्य सर्व बोधय - बोधय ॥... १३ मन्त। (तन्त्रसार) नृसिंहवीज-उम वीर महाविष्णु ज्वलन्त सर्वतोमुखम् . देव-पूजाके निमित्त विहित मन्त्रादिफे मूलतत्त्व नृसिंह भीषण माझे मृत्युमृत्यु' नमाम्यऽम ॥" रूप जो संक्षिप्त मन्त्रवचन है, वही उस देवताका योज | नरहरिवीज-आ ह्रीं क्षौं टु फट. हरिहरपोज-- कहा जाता है। प्रत्येक देवताका ही एक एक बीजमन्त्र | भो ही हौ शङ्करनारायणाय नमः हो हो । राह- है। उसी चीजमन्त्रसे उनको पूजा होती है। तन्त्रोक्त वोज-ॐ नमो भगवते वराहरूपाय भूर्भुवः पतये भूपति- दीक्षाग्रहण के समय जिस कुलके जो देवता हैं, उसी त्व' मे देदि ददापय स्वाहा । शिववीज-हौं। मृत्यु. देवताका चीज दीक्षाप्रहणकारीके नाम राशि अ-क:यह / अय-यो जुसः। दक्षिणामूर्ति-भों नमो भगवते आदि चक्रानुसार स्थिर कर देना होता है। दीक्षित व्यक्ति दक्षिणामूर्तये मह्य मेघां प्रयच्छ स्याहा। चिन्तामणि- उसी चीजमन्त्र के साथ देवताको आराधना कर सिद्धि | रक्षम र य ऊ:। नीलकण्ठ~ो नी' ठ:: नमः लाभ कर सकते हैं। पुरश्चरण आदिमें भी इस मन्त्रको | शिवाय । चण्ड-कद्ध फट । क्षेत्रपाल-ओं क्षौं क्षेत्रपा. जप करना होता है। तन्त्रसारमें भिन्न भिन्न देवताका | लाय नमः ।. बटुकभैरव-यों ही बटुकाय मापदुद्धरणाय वीज इस तरह लिखा है- कुरु कुरु वटुकाय हो । त्रिपुरा-हसरें। इसकलरी भुवनेश्वरीका चीज-हों। अन्नपूर्णाका बीज -हो। हसरौः। सम्पदप्रदभैरवी-हसरें। इसकलरी इसरौं । नमो भगवति माहेश्वरि अन्नपूर्णे स्वाहा । त्रिपुटादेवोका | कैलेशभैरवा-सहरैः। सह कलरी। सदरौं । सकल योज-श्री ही पली त्वरिता योज...ॐ ह्रो हु खे | सिद्धिदाभैरवी सहैं . 1. सहकलरी सहौं ।' चैतन्य चले क्ष स्त्री हो ही फट । नित्या वोज ऐपली नित्य | भैरवो-सहैं । सकल हीं। सहरी । कामेश्वरीभैरवी-. क्लिन्ने मनवे स्वाहा। धनप्रस्तारिणो-ऐं हो नित्य: । सहैं । सकल हो। नित्यक्लिन्ने मददचे सहरी । पर- क्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा । दुर्गायीज-ॐ ह्रीदुर्गायै नमः। फटा भैरयो-सरल फसहो । नित्यभैरवो-हस कलरडौं । महिषमहिनीयोज-ॐ महिषमहिनी : स्वाहा। जय- | रुद्रभैरवी-हसखपरै। इसकलरी | हसौः भुवनेश्वरी दुर्गायोज-ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षणि स्वाहा । शूलिनोयोज- भैरवो हस। हसकल हो । हसौः । सकलेश्वरो-सहैं। ज्वल ज्वल शूलिनो , दुराग्रह हु फट स्वाहा । स ल हो । महोः ।. त्रिपुराधाला-ऐं क्लीं सौः पागीश्वरोपोज़-वद · वद .बाग वादिनी । स्वाहा । | नयकुटा पाला-~ली सौ. मैं । इसकलरों । सौः ।