पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८३९

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योज _ सर हसकलरी 'इसरोः । मान्नपूर्णा भैरया--मो हो । गृध्रगणपरियून हुं फट् स्वाहा । महाकालो-ओं में .. श्रों को नमो भगवति माहेश्वरी अन्नपूर्णे स्वाहा।। म को को पान, गृहाण हु'फट स्वाहा। (तन्त्रमार) श्रीविद्या-कएईलहो। सकल हल हों। सकल हो। इन सब चीजमन्त्रों में उक्त देवताओं को पूजा करना छिन्नमस्ता-श्री क्ली में ब्रज बैरेचिनोये हू हूं फट । होती है । पूजा-प्रणाली तन्तसारमें विशेषरूपसे वर्णित

स्वाहा।

है। तत्तत् देवनाम शब्दोंमें विशेष विवरण देखो। । श्यामा-फ्री को फ्री हं हूं. हो ही दक्षिणेकालिके वीजाभिधानतन्त्रमें योजके पे सब नाम निर्दिए हैं, • का.को की हूँ हो ही स्वाहा । गुह्यकालिफा-को! जैसे-माया, लजा, परा, सावित्, त्रिगुणा, भुवनेश्वरो, -को कोई हो हो गुह्यकालिके क्रों क्रीं क्रों ! हल्लेम्बा, शम्भू वनिता, शक्तिदेवो, ईश्वरी, शिया, महा हो हो स्वाहा । भद्रकालो-क्लो कोक्लो है हूँ ही हो। माया, पार्वती, संस्थानकृतरूपिणी, परमेश्वरी, भुवना, 'म्वाहा | महाकाली-क्री की को दी ही महाकालि ) धात्री, जीवनमध्यगा इत्यादि । क्रों को ही हीं स्वाहा । श्मशानकालो-क्रों को हह तन्त्रसारमे लिखे वीजमन्त्रादिको भी साङ्केतिक ही स्वाहा । तारा हीं स्त्री फट । चण्डाप्रशूलपाणि- सशाचे वर्णित हैं। यथा-श्री-कूच घीज, पु- भों हा शिवाय फट । मातङ्गिनी-ओहो क्लों हूँमायाधीज, ही कामयाज, फ्ली-वधूवीज, स्त्री = मानङ्गिनी फट् स्वाहा । उच्छिपवाएडालिनी-सुमुखी देवी वाग्योज, ठि- विम्ययोज । इस तरह विभिन्न घायु. महापिशाचिनी ही 33: ठः । धूमावती-धू'धू पाहा। बीज, इन्द्रवीज, शिवोज, शक्तियाज, रमायोज, रति. भद्रकालो-हो कालि महाकालि किलि किलि फट चीज आदिका भी उल्लेख देखा जाता है। ये म पोज ' स्वाहा । उन्छिष्ठगणेश-- ओ हस्ति पिशाच शिखे स्वाहा। मूलतत्त्वके सांझपाकार हैं। फिर भी, प्रत्येक योजसे 'धनदा हो श्री देवि रतिप्रिये स्वाहा। श्मशान- एक पक स्वतन्त्र अर्थ हांग्रह भी होता है। सब चीजोंका कालिका-ऐं ही श्री क्लो। कालिके-ऐं ही स्त्री अर्धा बहुत गुप्त है। इसलिये तान्त्रिक माचार्यों ने साधा की । घगला-ओं ह्रीं सगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं रणके लिये वे सब विशदरूपसे व्यक्त नहीं किये हैं। सुख स्तम्भय जिहावां कीलय कीलय धुद्धि' नाशय, दीक्षापद्धतिक नियमक्रमसे साधक सामान्याध्य स्थाप. - लो ओं स्वादा। कर्णपिशाची-ओ' कर्णपिशाचि : नादि भासनोपवेशन तक यावतोय पूजाफर्म समापन कर यदानोतानागत शब्द' ही स्वाहा । मञ्ज घोप--को मूलमंत्र उच्चारण कर देवताको नमस्कार करें। इसके बाद ही थी। तारिणी-को' फो' कृष्णदेवि ह्रीं क्ली । फर ' इस मन्त्रसे गन्धपुष्प द्वारा करशोधन और अदुवं मत्स्यती-ऐं। कात्यायनी-ऐनी श्री चौं चण्डि. ताललय ध्वनित कर छोटिकामुद्रामे दशो दिशागोंको बांध फायै नमः । दुर्गा-दूं। विशालाक्षो-ओ, ही विप्रा. कर 'र'मन्त्रमे जलधारा द्वारा वेटन कर अपनी देहको घहि लाक्षी नमः । गौरी-हीं गौरी रुद्रदयिते योगेश्वरि प्रकारको चिन्ता कर भूतशुद्धि करें। भूतशुद्धिय समय पर फट स्वाहा । ब्रह्मधी- ही नमो ब्रह्मश्री राजिते राज. चक्रभेद हो प्रधान अङ्ग है। पहले अपने अङ्क में दोनों हाथ , पूजिते जये विजये गौरि गान्धरि त्रिभुवनहरि सर्व उत्तानमावले म्यापन कर 'सोऽह' इम मन्त्री हृदय. लोकयशङ्करि सर्वस्त्रीपुरुषवशङ्कर सुयुद्धदुर्घोरराये हो मध्यस्थित प्रदीप कलिकाकृति जोवात्माको मूलाधारस्थित - स्वाहा । इन्द्र-इन्द्राय नमः । गरुड़ क्षिप ओं स्वाहा। कुलकुण्डलिनीके साथ युक्त कर सुपुरमा पधमें मूला. विषहराग्नि -स्वख। हनुमान-हनुमते रुवात्मकाय : धार, अधिष्टान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध गौर आशास्थ फट । घोरसाधनहुँ पयननन्दनाय स्वाहा। परनामेद कर शिरस्थित अधोमुख सहस्त्रदल कमलके • श्मशानमरखो--- श्मशानभैरवि नरमधिरास्थियमाभक्षा कर्णिकान्तर्गत परम शियमें योगित कर उसमें पृधि. सिद्धि मे देहि. मम मनोरथान् पूरय हुँ फर म्वाहा) शदि चतुधि शक्ति नत्त्वविहीन हुमा है. मन ही मन ज्यालामालिका-मो. नमो भगवति ज्वालामालिनो, इस प्रकार चिन्ता कर "".इस यायुयोनको वाम नासा. Vol. XXI. 184