पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८४०

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७३४ • वोजक-बोजगणित पुरमें चिन्ता और इस धीज द्वारा सोलह बार जप चोजकसार ( स० पु० ) १ विजयसारके वोज । २ मातु- कर देह पूर्ण करणान्तर दोनों नासापुट धारण लुङ्गसार, बिजौरा नीबूका सार या सत्त। ' करे। इस पोजको ६४ वार जपनेफे दाद, कुम्मक वोजका ( स० स्रो०) कपिलद्राक्षा, मुनका ! कर याम कुक्षिस्थित काले 'पापपुरुपके साथ देह धोजकाय (स.वि०) वोजशरीर, आदिदेह । शोपण कर लें और बत्तीसवार इस पोजको. जप कर घाजकाह ( स० पु. ) मातुलङ्गवृक्ष, विजौरा नोवूका पेड़। वायु शुद्ध करें। इसके बाद दक्षिण नासिकामे रक्तवर्ण वीजकृत् (सं० सी० ) योजं पोय करोति पद्धयतीति क. . "" इस वहिनयोजको चित्ता कर यह वीज सोलह पार कि तुच । १ व औषधं जिसके खानेसे वीर्य बढ़ता जप कर वायु द्वारा देद पूरण करें और दोनों नासिकाको हो, वोर्या बढ़ानेवाली दया। १ चौकारक, चोळ पकड़ फर इस यीनको ६४ बार जप द्वारा कुम्भक कर पढ़ानेयोला। . काले पापपुरुषके साथ देवको मूलाधारस्थित अग्नि यांजकोश (१०) धोजाना कोशः माधार इव ।१ पद्मः । द्वारा वहनपूर्वक फिर इस बीजका बत्तीस पार जप द्वारा वीजाधारनकिका, कमलगट्टा । पर्याय-घरारक, कर्णिका, यामनासिका द्वारा वायुरेचन करें। इसके बाद शुक्ल पारिकुज । २ शृद्धाटक, सिंघाडा। ३ फल जिसमें वर्ण "3" इस चन्द्रवोजको वाम नासिकामें ध्यान कर घोज रहते हैं। इस वीजको सोलह बार जप द्वारा ललाट देशमें चन्द्रको ला कर उभय नासिकाको पकड़ कर "1" इस वरुण. यीजकोशक (सं० लो० ) वृषण, अंडकोश । '.. योजको ६४ यार जप कर मातृकावर्णमय ललारस्थ यंत्र. .. (वयनि० ) . . से गलित अमृत द्वारा सारी देह रचना कर "ल" इस पोजगणित (सं० क्लो०) अङ्कविद्याविशेष । (Algebra) पृथ्वीवीजको ३२ बार जप द्वारा देहको सुदढ चिन्ता जिस शास्त्रमें वर्णमालाके अक्षरोंको संख्यास्वरूप मान कर दक्षिण नासिकासे वायु रेचन फरें। कर और कई साङ्केतिक विहाँको व्यवहार कर राशिः । ___ इस तरह मातृकान्यास, कराडन्यास, पीठन्यास, विपयफे सिद्धान्तोंको युक्ति के साथ संस्थापित किया ऋष्यादि न्यास आदिमें भी शरीरके यथास्थानमें चीजका जाता है, उसका नाम योजगणित है। . . आधार कल्पना कर उन स्थानों को स्पर्श करनेके समय वीजगणित अङ्कशास्त्रकी एक शाखा है। इसके द्वारा उस उस वोजसशाको चिन्ता करें। देवताविशेष | पाटोगणितमें प्रचलित नियमायलोसे विभिन्न और करङ्गादिन्यास और वीजमन्त्रक विभिन्नत्व लिपिवद्ध | अचिन्त्यपूर्व अङ्कसाधन शिक्षा प्रणाली सीखी जा हुआ है। विस्तारके भयसे उन सयोंका उल्लेख यहां नहीं सकती है। क्रमोत्कर्ष के स्तव विचारसे इस शास्त्र के साथ किया गया। प्रत्येक देवताके नाम-शब्द में ये सब संक्षेप पाटोगणितका चाहे जिस ताहका पार्थक्य दिखाई क्यों में दिये गये हैं। विशेष विवरण न्याय और षटचक्रमें देखो। न दे, किन्तु पाटीगणित शास्त्रेसे ही इसकी उत्पत्ति हुई वोजक (सपु०) १ मातुलुङ्गवृक्ष, विजयसार या पिया- है। इस सिद्धान्त पर पहुंच कर सर आइजक न्यूटनने माल नामक वृक्ष । पर्याय -पोतसार, पोतशालक, वोजगणितको 'सार्वजनीन गणितविद्या' (Universal वन्धूकपुष्प, पियक, सर्जक, मासन । गुण-कुष्ठ, विसर्प, | arithmetic) नामसं अभिहित किया है। यद्यपि इस गेह, कृमि, श्लेष्मा और पित्तनाशक केशवृद्धिकर तथा| नामसे इसका अर्थ परिस्फुट नहीं होता, तथापि इमसे रसायन । ( भावम० ) (क्ली०) वीज स्वार्थे कन् । २ विजौरा इस शास्त्रको अभिव्यक्ति बढ़ाई गई है। न्यूटनके पिछले नोवू । ३ सफेद सहिजन । ४ योज, योआ। वीज देखो। समयके सर्वप्रधान अविद पण्डित सर विलियम रोयान . वोजकर ( स०पु०) उड़दको दाल जो बहुत पुष्टिकर हेमिल्टन वोजगणितको "विशुद्ध कालविज्ञान" (Science मानो जाता है। • of Pure Time) कहते हैं। डोमार्गनने इस संज्ञाको : - घोजककटिका (स स्त्रो०) दीर्घकटिका, बड़ी ककड़ी। परिम्फुट करनेके लिये "क्रम गणना" ना रखा है। ,