पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८४४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


७३८ . . वाजगणित यशवत्ती हो लिभोना ने अपने प्रथमें उभय शास्त्रके । शेपोक्त प्र अरवी भाषामें लिखा सर्वप्रधम गणित - सम्बन्ध विभिन्न भाषसे विशद् आलोचना की है। प्रय है। सन् १२०२ ई०में लिभोनाओंने यह प्रथ प्रणयन किया ; लुकास सीवारों। पीछे फिर १२२८ ई०में उन्होंने यह संशोधनपूर्वक वीजगणित विषयक सर्वप्रथम मुद्रित प्रथका नाम- प्रकाश किया था। मुद्रायन (प्रेस) के आविष्कार होनेसे Summa de Arithmetica, Geometria, Propar. २०० वर्ष पहले यह प्रचलिखा गया था। मानव जाति / tioni. et Proportionalita लुकास पेलिभोलास उस समय इस विद्याके अनुशोलनमें आग्रहन्धित न उर्फ मी घागों,नामक एक संन्यासी इसके रचयिता होनेकी वजह यह जनसमाजमें अविदित रह सकता है, । हैं। सन १४६४ ई०में यह ग्रंथ प्रचलित था।' उन इसमें आश्चर्य ही क्या है। जो हो, प्रकारको गन्यान्य सोंमें यह सर्वाङ्ग सुन्दर और सम्पूर्ण प्रध कहा पुस्तकोंकी तरह यह प्रय भी हस्तलिखित पाथोके जाता है। आकारमें रखी रहती थी। पहले फिसाने भी इम मूल्य- धकारने लिमोना के प्रदर्शित पन्चानुसरण 'फर वान् प्रधकी खोज नहीं की ; सौभाग्यक्रमसे १८यों । उन्होंके गादर्श पर इस प्रन्यको रचना की थी। इनके शताब्दीफे मध्यभागमें फ्लोरेन्सफे मेग्लियावेफियान यसे ही बादके समयमें लिभोना के लुप्त प्रन्यको लाइबरीसे यह प्रध आविष्कृत हुमा । कुछ मश उद्धत कर जनसमाजमें प्रचारित छुमा'! भरयदेशीय प्रथकारों की तरह लियोनाने भो ___ सन् १५०० ई० में यूरोपमें बीजगणितकी जितनी अशास्त्र में विशेष ध्युत्पत्ति लाभ की थी। ये प्रथम और उन्नति हुई थी, लुकास डी वागाने उन सब विषयों को अपने प्रधमे सन्निवेशित कर इस अन्धको सौपवता , द्वितीय पर्यायका समोकरण कर सकते थे। दिगो. सम्पादन की थी। सम्भवतः इस समय अरव और । फन्तास द्वारा आविष्कृत विभागप्रणाली में भी इनका मफ्रिका प्रदेशमें भो वीजगणितकी अवस्था. वैसी ही . प्रगाढ़ पाण्डित्य था। ज्यामितिमें इनकी विशेष व्युत्पत्ति यो। पावश्यकीय फललाभके उपायस्वरूप धीजगणित. थी। इन्होंने इसी ज्यामिति के नियमानुसार पोज में जो शक्ति निहित है, वह बडूपात द्वारा सहज ही उग. गणितको नियमपद्धति सामञ्जस्य कर लो थी । . अरव 'लग्ध होती है। इस अङ्कपात प्रणालीके वलसे ही देशीय प्रकारेको तरह पे भी विशदभावने अपने मालोच्य सम्पायें सर्वदा दृष्टिपथमे रखी जा सकती सिद्धांत प्रकाशित कर गये हैं । किन्तु इस पयसे अङ्कशास्त्रकी विशेष उन्नति नहीं हुई है। साङतिक हैं। किन्तु लुकास डी बार्गोके समय चीजगणित, आलोच्य विषयके संक्षेपसे अप्रतिपादनकल्पमें सहज- चिहादिका व्यवहार और थोड़ी बातमें मर्म समझाने की । साध्य और सम्पूर्णाङ्ग कोई नियम प्रचलित न था। पद्धति इसके बहुत दिनों बाद भाविकृत हुई है। गणनाके लिये उस समय कई वाक्योंके या नामोंफ परि- लियोना के बाद और मुदाय के भाविष्कृत होने | दर्तनमे संक्षिप्त वाफ्यावली प्रयोग की जाती थी। वही पहले बोजगणितफ गनुशीलनमें विशेष आग्रह दिखाई मालोच्य समयमें साङ्केतिक चितरूपसे ध्यवहत था। यह देता है। इस वीजगणित विद्याकी अध्यापकों द्वारा कंवल एक तरहको संक्षेप लिपि (8hort hand)का अनु. प्रकाश्यरूपसे शिक्षा दी जाती थी। इस समय इम, करण है। इस समय जिन अपातों द्वारा पातें समझाई शास्त्र के सम्बधमें अनेक प्रथादि रचे गये। अधिक जाती हैं, उस समपके वाइपातमि इन बातोंका प्रकाश तर अरवी भाषाम लिखे दो प्राचीन मूलध इटलो करना सम्भवपर नहीं होता। उस समयके थोअगणितके भाषा अनुवादित हुए । इनमें एकका नाम 'वोज- प्रथानुसार अङ्क सम्पादन विशेषरूपसे सीमावद्ध था। गणितका नियम' और दूसरा खुरासानके महम्मद | कितने ही अनावश्यक सहयाविषयक प्रश्नों के , समाधान घिन मूसा प्रणीत मति प्राचीन प्रथका अनुवाद है।। ध्यतीत उस समय घीजगणितके साहायसे विशेष कोई