पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८५

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८६ वोतध्याधि . . . सिरम सश्चित होनेसे सन्धियां फूल जाती, पदांका , यह दिखाई देता है। यहां पहले एक अलजला फोड़ा उत्पन्न . घमा लाल, उत्तप्त और चमकोला तथा नसे फैल जाती होता है पोछे यह फट जाता और उससे दूधकी तरह एक "भोर 'फूला हुआ स्थानमें मंगुली दवानेसे दर जाता | शुभ्र रस निकलता है। इस प्रकार २३ फुन्सियां हो जाती हैं है। जलन कम होनेसे त्यक समलित होता दिखाई देता और रसके गाढ़ा होने पर मालाको गुरिका-सी दिखाई देती और वहां खाज हो जाती है। . . . है। अधिक इस यात रोगसे पीड़ित होने पर शरीर जोर्ण

शोत मौर, कम्पके साथ पोहा भारम्भ होती है। शीर्ण और दुल तथा पाण्डु वर्णका हो जाता

शरीर गर्ने मोर पसीनेसंतश्यतर हो जाता है किन्तु है। इसके साथ ही हत्कग और पेशियों में स्पन्दन प्रवल पात रोगकी तरह त्यधिक पसीना नहीं दिखाई। | आदि लक्षण मौजूद रहते हैं। समय समय पर सोने में 'देवा हैं। मून थोमा काले रंगका और यह युरेट्स धारा दांत किरकिटाना और सामान्य ज्वर होता है। मूत्र में

  • परिपूर्ण हो जाता है। स्वभावतः २४ घण्टे में ८ प्रन पलघूमेन रहता है। किन्तु उसका आपेक्षिक गुरुत्य अपेक्षा.

.: यूरिक एसिड मूबके साथ बाहर निकलता है। ऐसा | कृत न्यून होता है। पीड़ित व्यक्तिकी देव पोतपर्णिका "मालूम होता है, किंगठिया पातरोगने यूरिक ऐसिद्ध अधिन (माटिकरिया ) गणिका ( परिधिमा , पामा (एक- • गिर रहा है, किन्तु वास्तव में स्वाभाविकको अपेक्षा अधिक जिमा ) और विधिका ( सोरापेतिस ) आदि चर्मरोग • महीं गिरता। म्यूरेसिड (litrexid ) परीक्षा द्वारा होते हैं। किसी किसी रागोवा नाक पोयक्रम से नित्य १.यह निर्णय किया जाता है। सिवा इसके, मूत्र में अधिक उत्तप्त और लाल होते देखा जाता है। । परिमाणमें गुलाबी रंग या सूखीकी तरह गन्दगी भनियमित या स्थानान्तरगामी वात । होती है। प्रात:कालघर होता है। अन्यान्य गठिया पात रोग गांठों में दिखाई न दे कर शरीरफे . लक्षणोंमें गोको - मनिद्रा, स्थिरता, क्षधामान्य, | अन्यान्य स्थानों में आक्रमण करता है, इससे इमो -पिपासा, कोष्ठव और पैरमें कंपकपी दिखाई देती है। स्थानांतरगामो यात कहते हैं। यह लुप्त (Suppressed) • पाकासप और यहको निशा व्यतिकम हो जाता है। और आभ्यन्तरिक ( Retrocedent ) भेदसे दो तरहफा भरतमें पसीना, उदरामय या अस्वच्छ मूत्रत्यागके बाद । है। गांठोंमें पातके लक्षण सामान्य मायसे रह कर अन्यान्य घर और घेदनाका सम्पूर्णरूपसे रुक जाता है। चार स्थानों में प्रकाशित होने पर यह लुप्त हो कर स्थान 'पांच दिन अथवा दो चार सप्ताहमें ध्याधिको शान्ति देखी। पिप (letastasis ) द्वारा अन्यान्य स्थानों में जाती है। पोड़ा वर्ष के अनमें फिर पैदा हो जाती है। संचालित होता है। इसको रिटोसीडेएट गाउंट · राग यदि जड पकड़ लेता है, ना वर्ष में दो या तीन पार करते हैं। . . . भी हो सकता है। . • इससे स्नायुमण्डली यदि जाफ्रान्त है। से शिरमें इस तरह बारम्बार और पर्यायक्रमसे रोग होने दर्ग, शिरका घूमना, मृगो और पापो शादि - पर पोड़ा पुरातन हो जाती और पीड़ित सन्धि टूढ विच उपस्थित हो जाती हैं। कभी कभी मेनिन्जाइटिस् या द्वित और विहान हो जाती है। यहाँको चमड़ा बेंगनी संन्यास रोग दिखाई देता ही है। अन्यान्य लक्षणों में कर और नीली धमनियोंसे घिर जाता है। सब मन्धियों में | तरह के स्नायु शाल, हाथ पैरकी काटकर कपकपी या अय- यूरेट गाय सोश सचिन को मिट्टीयत्हो जाता। उसको शता धनमान रहती है। कमी कमी कटिस्नायुशाल चमोन पारोफाई (Tophai) मस्थित म्फीति छडीका (Sciatica ) उपस्थित हो जाता है. ...... 'फूलना कहते है । अन्तर्मे चमड़ा फर कर क्षत उत्पम्म हो। पाकयान मामात होने पर पीशियतिर जाता है और यहां से पोला पदार्थ बाहर निकलता रहता है। आक्षेपिक घेदगा, अत्यन्त भोर मय समय पर दुई कभी कभी माग्ने, कान और नाकफे कार्टिलेजोलता और दिगाईको चिह दिखाई देता मोमो टोकाई सश्चित होता है । सदा कामके पिछले भागमें हो 'भोजन करने में भी काट होता कहीं कहीं भगवान भाई