पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८६३

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वोतक-चीतशोक ... शेषवत् अनुमानके कारण मायके वायव्यापक'चीतदम्भ (सं.लि.) योतसत्यको दम्भो येन सः। · भावज्ञान नहीं। साध्रभाव और हेत्वमायको वाप्य निरहङ्कार, जिसने दंभ या अहंकारका परित्याग कर वापक-भावधान मावश्यक है। उसके फलसे साध्य. दिया हो। पर्याप-अयसकन् ।। भावका निषेध होता है, सुनरी साध्यशाग हो उठता है। योतन (स० पु० ) गलेका दानों पार्व। हेमचन्द्रने सामान्यतोद्गष्ट अनुमान पूर्ववन्के विपरीत है। जिस कन्धफे मध्य भागको कृक और उस ककके दोनों पार्श्व. 'सायके अनुमानमें प्रवृत्त हो रहा है, उसका या ठीक को बीतन कहा है। अतएव इसके अनुसार भी दोनों • उसी आकारको और वस्तुका प्रत्यक्ष कदापि नहीं। स्कन्धका ठोक मध्यभाग अर्थात् गलदेश फक तथा ' होगा; किन्तु उसको तुलना प्राप्त विविध प्रकार भान उसके दोनों पार्श्व वीतन कहलाते हैं। (हेमचन्द्र ) पथागत यावतीय वस्तुके व्याप्ययापकभावशान और चीतपृष्ठ ( स० वि० ) बोतं कान्त पृष्ठ पश्चादुभागो प्रकृत,हेतु में पक्ष धर्मता ज्ञान होनेसे जो बुद्धिवृत्ति होती है, यस्य। १ जिसका पृष्ठ या पश्चाभाग देखने अति यह सामान्यताद्गए है। जैसे-इन्द्रियानुमान इन्द्रिय. सुन्दर और कमनीय हो । ( मृक १।१६२७) २ विस्ती. प्रत्यक्ष योग्य नहीं । इन्द्रियों कभी भी किसीको भी। गोपरिमाग, चौड़ाईका ऊपरी हिस्सा। दिलाई नहीं देती, उन इन्द्रियोंको जो ज्ञान है, यह __(मथर्व ६६२।२ सायण ) सामान्यताद्रप्ट है। | वीतभय (स'. पु०) वीतं भयं यस्य यस्माता । १ विष्णु । इस अनुमानकी प्रणाली इस तरह "रूपादिशान। (भारत १३३१४६।१११) (लि०) २ भयरहित, जिसका सकरणकं क्रियात्वात् छिदादिवत्" रूपादि प्रत्यक्ष भो । भय छूट गया है। कारण है, क्योंकि पारिका प्रत्यक्ष किया है, यथा--पीतभीत ( स० त्रि०) १भयमुक्त, जिसका भय छूट गया छेदन इत्यादि । छेदनका करण कुठार है। रूप- हो। (पु.)२ असुरभेद । प्रत्यक्षका करण किसको कहोगे, देह करण नहीं, क्योंकि वीतमल (स.लि.) १ निष्पाप, जिसे कोई पाप न हो। अकेला देह है, किन्त रूप उसके प्रत्यक्षके वाहरकी चीज, २ निष्कलङ्क, जिसमें किसी प्रकारका कलङ्क या मल आदि है। देहको करण कदनेसे अन्धेका रूप प्रत्यक्ष होता। । न हो, विमल। पोतराग ( स० त्रि०) पोतो रागो विषयवासना यस्य । जिमको करण करना चाहते हो, वही इन्द्रिय है। कोई विगतराग, जिसने राग या आसक्ति मादिका परित्याग करण या करणत्य प्रत्यक्षदृष्ट होनेसे भो इन्द्रिय आकारका करण विल्कुल अतीन्द्रिय है। कर दिया हो। (पु०) २ युद्धका एक नाम । २जनों के प्रधान देयताका नाम । . जो जो क्रियाये उन सवोंकी करण हैं। इस तरह के | मानके बाद शानपधागत क्रियामि हो करण के सम्बन्धम वीतरागस्तुति (स' स्रो०) जिनकी एक स्तुति । धीतवत् ( स सि० ) मूलयुक्त। (मारप० मी० ११८४) भान होनेसे और रूपादि प्रत्यक्ष क्रिया है, ऐसा उपलब्ध । चीतवारास (स.नि.) १ फास्तवल, जिसने पल होनेसे जो चित्तवृत्ति होती है, यही सामान्यनोगट अनु- पाया हो। मान है। इस अनुमानसे इन्द्रियका मस्तित्व निर्णय होता वीतशोक (i० ति०) १ विगतशोक, जिसने शोक आदिका है, इसमें केवल इन्द्रियका मस्तित्व नहीं है, अप्रत्यक्ष भनेक वस्तुको अस्तित्वसिद्धि इस अनुमानसे होती है। परित्याग कर दिया हो। यही बीत अनुमान है। (सांख्यका०) ___ योगः शोको यस्मात् , अशोकाटम्यां तस्पानेन शोक .' (नि.)४ परित्यक्त, जिसका परित्याग कर दिया नाशत्वात्तस्य तथास्यम् । (पु.)२ अशोकया । पासाती गया हो। ५ मुक्त, जो इट गया हो। ६ विगत, जो मर्यात् चैतमासको शुक्लाष्टमीको इसका पुष्प जलमें रख । बीत गया हो। अनिता जो किसी वांतसे रहित हो। उस जलको निम्नीक मम्न पढ़ कर पान करनेसे सभी ८ कमनीय, सुन्दर। (ऋक् ४७६) शोक ताप दूर होते हैं, इसी कारण इसका अशोक नाम बोतक (२० पु०) योत देखो। पहा है। मन्स प्रकार है-