पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८६४

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'७५६ वीतसूव-वीथिका "त्यामशोक हराभीष्ट मधुमाससमुद्भव। .. वीषिका (स० स्त्री०) बोधिरेव स्वार्थे कन् तताए। पिवामि शोकसन्तप्तो मामशोकं सदा कुरु ॥" (तिथितन्य) | . .. वीप देखो ! वोतसून ( स०क्लो) पछोपवीत, जनेऊ। । पोथी (स'. स्त्री०) विधि ङोप या। १ राजपथ, बड़ा घीतहज्य (सपु०) स्वनामप्रसिद्ध अङ्गिरसव शोभय रास्ता, सड़क । २ नाटकाङ्गभेद, दृश्य काय या रूपक- पिभेद, एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ऋषि जो अगिराके वंशमें | फे २७ मेदोंमसे एक भेद। यह पफ हो शङ्कका होता है थे। ( मा ६।१३०१) २शुनके पुत्र का नाम । ३ एक | और उत्तम, मध्यम वा मघम जिस किसी प्रकारका हो, गनाफा नाम । (वि०) ४ दत्तहविष्क, पछमें आहुति | एक ही नायक कल्पित होता है। इसमें माकाशभापित देनेवाला। और शृङ्गाररसकी अधिकता रहती है। अन्याय रस धीतहोत्र ( स० पु०) वोतिहोत्र देखा। यहुत थोड़े रहते हैं। किंतु मुखादि पञ्चाङ्ग सन्धि चीताशोक (सपु०) अशोकवृक्षभेद । सार्थकताके साथ सम्पूर्णभावमें विद्यमान रहती है। वीति (मस्त्रोक) वो-किन् ।१ गति, चाल । २ दीप्ति, ____ मनोपियोंने बोधोके निम्नलिखित तेरह अग निर्देश चमक । ३ प्रजन, गर्भ धारण करनेको क्रिया । ४ असन, 'किपे हैं, यथा--उद्घात्यक, अवल गित, प्रपञ्च, विगत, खाना। ५ धावन, दौड़ना। ६ पान, पीना। ७ प्राप्ति । | छल, याकलि, अधिगएड, गण्ड, अयस्यन्दित, नालिका, ८ पज्ञ | घोटक, घोड़ा। असत्प्रलाप, पायहार और मृदय । उनके लक्षणादि घोतिका (सं० स्त्री०) यष्टिमधु, मुलेठी। २ नीलिका, साहित्य दर्पण में इस प्रकार लिखे हैं-. . नीली निगुड़ी। (वैद्यक नि०) । उद्घात्यक-दूसरेके वापयका महत भाध सहज में योतिन् (सपु०) ऋषिमेव । बहुवचनमें उनके घंशधरका - समझमे न आयेगा, इस कारण द्वार्थ घटित शम्द शोध होता है। द्वारा कोई पाषय प्रयुक्त होनेसे यदि कोई उसका प्रकृत योतिराधस ( स० वि०) दत्तधम, धन देनेवाला । . अर्थ समझ कर दूसरे पद द्वारा उसी समय उसका (फ ६६२।२६ मायण) यथार्धा भाव वाक्त कर दे, तो उसे उद्घात्यक कहते हैं। यातिहोत ( स० पु० ) वी गतिकान्स्यसनणादनेषु यो । जैसे, "ये सब सफेतु करग्रह सम्पूर्णमण्डल चद्रको पल. तिन, योतिः पुरोडाशादिः यतेऽस्मिन्निति । हुयोमा. पूर्णक अमिभव या परास्त करनेकी इच्छा करते हैं" मुद्रा- शुभसिभ्यस्तन इति-एन ( उण ११२७) अथवा पीतये राक्षसके सूत्रधारको इस गूढार्श-यांजक उक्तिके वाद हो पानाय होत हव्यं यस्य। १. अग्नि । २ सूर्य। नेपथ्यमें कहा गया कि, "मेरे जीते जी कौन चन्द्रगुप्तको ३ प्रियव्रत राजाके एक पुनका नाम । (भागवत अभिभव या परास्त कर सकता है? जिस उद्देश्यसे ५।१।२५) ४ एक राजाका नाम । ( महाभारत ६८९०) वाफ्यका प्रयोग किया गया था, दूसरे वाक्यसे ठीक यही ५ हैहयवंशीय एक राजाका नाम । (हरिवंश ३३५०) भाव व्यक्त होनेके कारण यहाँ उद्घात्यकाङ्गक घीयो हुई। . ६ कान्तयज्ञ । (ऋक् २२३८४१) (लि०) ७ मासयक्ष, जो यज्ञ करता हो। • अवगित-जहां एकत्र समावेश होने के कारण एक धोती-वीतिन देखो। कार्य के याद दूसरे कार्यको सूचना होतो यहां अपल्गिता. . योताशययन्ध ( स० वि० ) उन्मुक्तप्रन्थि । ङ्गक योधि' होती है। जैसे, 'शकुन्तलामें नटरी के प्रति . (किरात ८५१) सूतधारको उक्तिके बाद ही राजाका प्रवेश वर्णित हुमा वोतोचर ( ( सवि०) उत्तर देने में मनिच्छु। . वीत्त (सं० वि० ) यिदा-क्त। वित्त, धन । ' ___ प्रपञ्च-परस्पर मिथ्याभूत हास्यजनक बायका योथि (स': स्त्रो०) विध्यतेऽनया विध-इन इगुपधात् । व्यवहार करनेसे उसको प्रपञ्च कहते हैं। जैसे, विक किदितीन वाहुलकात् । पंक्ति, श्रेणी २ गृहाङ्ग।। मोर्वशोर्मे बड़मोस्य. विदुषक और ; चेटीका ' परस्पर ३ बम, राजपथा . .. . . . . . ! कथोपकथन ।