पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८६६

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'७५८ वीथी-चोप्सा है। संवरणकारी उत्तरको प्रहेलिका कहते है, अतएव , पहले गुण और पीछे दोष समझा गया, इस कारण दोनों जहाँ कमसे कम किसी प्रकार असङ्गत माघ दिखाई देता है। हो जगह मृदववीथी हुई। तथा पीछे प्रत्युत्तर द्वारा किसी कौशलसे यदि उसका ४ रविमार्ग, सूर्णका गमनपथ । ५ प्रकाशम नक्षतों- फिर सवरण किया जाय, तो यहां नालिका पीथी होती | के रहनफे स्थानोंके कुछ विशिष्ट माग जो वीथो या है। जैसे रत्नावलीमें सागरिकाके प्रति सुसङ्गताकी | सड़क के रूपमे माने गये है। आकाशम उत्तर, मध्य उक्ति है-"सखि | तुम जिसके लिये आई हो, वह / और दक्षिणमें क्रमशः ऐरावत, जरदुगय और पश्यानर यहीं पर है" इस पर सागरिकांने कहा, "मैं किसके | नामक तीन स्थान हैं । इनमेसे प्रत्येक स्थानमें तीन तीन लिये माई ?” इस वाक्यसे सागरिका के भावका धैप. पोधियां हैं। प्रत्येकका विवरण नीचे दिया जाता है। गेत्य समझ कर सुसङ्गताने सरल भाषमें फिरसे कहा, ___ अश्विनी, भरणी और कृत्तिका इन तीन नक्षत्रोम नाग- "क्यों चित्तफलकके लिये नहीं" इस भावसंघरणसेवायो, रोहिणी, मृगशिरा और मार्दा नक्षत्र में गजवीधी; यहां नालिकावीथी हुई। पुनर्वसु, पुष्या और अश्लेषा नक्षत्रोंमें ऐरावतो. . ____ असत्पलाप-प्रश्न या उत्तरको जगह यदि असम्बन्ध यीथी है, ये तीनों बौथियां उत्तरांशको अन्तर्गत है। मघा, अर्थात् पूर्यापर सम्वन्धरहित घापयका व्यवहार हो अथवा पूर्व फल्गुनी और उत्तरफल्गुनी में भाभी, इस्ता, किसी जगह अवाध्य मूर्खको अकारण हितभाषय कद्द चित्रा और स्वाति नक्षत्रों में गायोथी, विशाखा, अनुराधा कर उपदेश दिया गया हो, तो वहां असत् प्रलाप होता, गौर ज्येष्ठामें जारद्वो है, ये तीनों योथियां मध्यमार्गमें। है। जैसे, प्रभावती नाटिकामें प्रद्युम्न सहकार लता है। मला. पर्यापाढा, और उत्तरापाढा नक्षत्रों में मोज. लक्ष्य कर कहता है, "अहो ! अलिकुलगुजित निविड़फेशा वाधीश्रयणा, धनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्रोंमें मृगयीयो; गन्धवती रसाला किशलयकोमलपाणि कोकिलमाविणी | पूर्वाभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद और रैयती नक्षत्रों में वैश्वा मेरो यह तरङ्गी प्रियतमा यहां क्यों ।" यहां पूर्यापर नरो है, ये तीन पोथियां दक्षिणपथको अन्तभुक्त है। . विशेषणेमि गन्धधती गौर रसाला शब्द दा मनुष्यों के योध्या (सं० स्त्री०) वीच्या अङ्गमिवाङ्ग यस्य । नाटक. विशेषण है तथा प्रधानतः लताको मनुष्य जान कर उस. ! भेद । वीथो शब्द देखो। का वर्णन किया गया है, इससे यह भसत्प्रलाप हुआ। योध्र ( स० लो० ) विशेषेण इन्धत दोप्यते इति वि. घेणीसंहारनाटकके तृतीय अङ्गमें गुरुवाफ्यफै उलङ्घन इन्ध (याविन्धः । उप २।१६ ) इति कुन्। १ नम, करनेवाले दुर्योधनादिके. प्रतिगान्धारोको उक्तियां भी आकाश । २ वायु, हवा । ३ अग्नि, आग। (नि.) असत्प्रलाप हैं। ४ विमल, निर्मल। ___ व्याहार-दूसरेके लिये हास्य वा लोभजनक जिस वीध्यू ( स० वि०) बोध-यत । शरत्काल के निर्मल चाफ्यका प्रपोग किया जाता है उसका नाम वाराहार है। असे मालविकाग्निमित्रमें मालविकाकी उक्तिमें नायकका) मेघसे उत्पन्न | (शुक्लयजु० १६।३८) . झास और लाभका उदय हुगा है. इस कारण यहां वाहार वोनाह (सपु०) विशेषेण नह्यते इति घि-मह-धम् । वीथी हुई। I..उपसर्गस्य दीर्घः । कूपका मुखवन्धन, यह अगला या __मृदव-जहां दोषोंको गुण और गुणोंको दाप समझा ढकना जो फूर के ऊपर लगाया जाता है। " . . . . : .. जाता है वहां मृदययोथी होती है। जैसे, "हे प्रिय निष्ठ- वीनाहिन् ( स० पु०) फूप। . रता, निःस्नेहता और कृतघ्नता आदि मेरो देहम तुम्हारे बोन्पूर्फ (स० ति०) सूर्य और चन्दयुक्त । ' : .. . विरहसे दोषमें तथा तुम्हें देख कर गुणमें परिणत . ... (संधुजातक) . . होती हैं ।" अर्थात् तुम्हारे घिरहसे में उनको दोष और घोपा ( स. स्त्री०) विद्युत्, विजली। ... . . . . तुम्हारे देखनेसे गुण समझता हूं।" यहां रूप और यौवन 'घोप्सा ( स० स्त्री० ) वि-अपि सम् अंच-टाप । किया-