पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८७१

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- वीरम - सौरभ ( स. पु०) धीराणां मयेन। १मश्वमेध है?" घोरमद्रने पड़े गर्वसे उत्तर दिया, "मैं दद्र या Miniघोड़ा। २ वीरश्रेष्ठ, शूरवीर । ३ घोरण, स| यो पार्वती नहीं है। मैं इस पाठ, भोजन या कौतूहल. शिवलिङ्गविशेष। शियके पुत्र और अवतार माने । परताय हो वाह्मणों के दर्शन करने नहीं माया । देयी जाते हैं। महाभारतमें इनकी उत्पत्तिका विवरण इस | पार्यतीके दुःखित होने पर भगवान रुद्र बड़े न हुए प्रकार लिखा है। जब दक्षप्रजापतिने महादेवका अपमान हैं। मैं उन्ही के आदेशसे तुम्हारे इस यसको नष्ट करने करने के लिये शिषधिहीन याका अनुष्ठान किया, तब माया है। मेरा नाम है धीरभद्र । रुद्रदेवफे मोधानलसे देवी भगवती यह संवाद पा कर बड़ी दुखित हुई।। में और देवी पार्वतीके फोधसे यह वीरनारी उत्पन्न हुई उन्होंने बड़े बेदके साथ शिवजीसे कहा, 'भगवन् ! मैं हैं। इनका नाम भद्रकाली है। इस समय पदि तुम कैसा धान था तप फर' जिससे मेरे पतिको यज्ञका अपना कल्याण चाहते हो, तो महादेवको शरण लो, माधी या तिहाई भाग मिले। महादेव पार्वतीको गह। M m m तक तुम्हारी रक्षा हो भी सकती है। इस पर दक्षने भयभीत देतेषित सुन कर वोले, 'मैं सभी यशोंके ईश्वर है, मेरे । हो महादेवके अष्टोत्तरसहस्त्रनाम कोर्शन कर उनका स्तव बिना यह पूरा हो ही नहीं सकता। जो हो, तुम्हें मेरे किया। उनके स्तपसे आशुतोपका मोघ शान्त हुमा । पति कता धाय प्रयोग करना चाहिये, यह तुम्हें (महामारत शान्ति माध०८५२०) मालूम नहीं। आज तुम्हारे मोहवशतः इन्द्रादि देवता काशीखएड में लिखा है, कि दक्षकन्या पायतीने प्रव भौर निलोकवासी प्राणी मुग्ध हुए है। अभी तुम्हें पिताके याका विषय नारद मुरासे सुना, नव घे विना प्रसन्न करने के लिये में एक महावीरको सृष्टि करता है। युलाये पिताके घर गई। यहां पतिकी निन्दा सुनकर अनन्तर महादेवने अपने मुखसे पक भर पुरुषको उन्होंने यशस्पलमें प्राणत्याग कर दिया। नारदने यह . सष्टि की। उस महापुरुपके सहि होते ही महादेवने | खधर महादेवको दी। महादेवने फोधसे भधीर हो यद- __. उसका वीरभद्र नाम रख कर कहा, "वीरभद्र।। मूर्तिको धारण किया। उस समय उनके मोधानलसे सुम शल्द पक्ष-यहमें जामी और पार्यतीका फ्रोध शारत पोरमद् उत्पन्न हुए। पीछे पोरभद्रने दक्षपक्षको मस करने के लिये यहको मट कर डालो।' वीरभद्र तैयार हो । किया। (फाशीत०८८, १० म०) गये और देवीके शोधसे उत्पन्न महाकाली भी उनकी पायुपुराणके मतसे दक्षयज्ञका विनाश करने लिपे अनुगामिनी हुई। शिवफे मुख देशसे धीरभद्र सावित हुए। उनके उस समय धीरभद्रक कापसे बिभुवन काप उठा। हजार मस्तक, दो हजार नेत और दो हजार पर है। पोछे धोरमद्रने अपने लोमकूपसे असंख्य रुद्रोंकी एटि उनका परिधृत व्याधाम्बर रक्तविमण्डित है। हाधम को। ये सब रुद्र भयानक शम्द करते हुए यहस्पलमें जा! कुठार और प्रदीप्त धनुप है। दूसरे पुराणमे इन्हें शिवफे धमके और सोने मिल कर यसको विनष्ट कर डाला। पसीनेसे उत्पन्न पतलाया है। महाराष्ट्र देशमे शिवको श्रावकगण इन सबोंके मेयर कार्य देख कर यजुवेदीसे इस मूर्ति की उपासना प्रचलित है। तन्नादिम बोर- भागने लगे। सर्वदेव सुरक्षित यशदेव भी मृगरूप भद्रके पूजामन्तादि लिखे हैं। दक्ष साद देता। धारण कर भाग रहे थे उसी समय धोरमद्रने कोधके परम एक हिन्द राजा । इनके पिताका नाम भद्रेन मावेशमैं भूतोंकी संहायतासे उनका शिर कार डाला । इनको समामे तकप्रदीपक प्रणेता कोएडभट्ट भोर मल्ल मनसे यह घोर शम्द करने लगे। इस विद्यमान थे। २ तन्नसारधृत एक प्रग्यकार। ३५क सिंहनादसे सभी धर्मा उठे। पृथिवी कांपने लगी। प्राचीन कपि। ४ पक ज्योतिर्विद । उत्पलत यहस्. . इसके बाद प्रमादि देवतासी तथा प्रजापति दक्षने / सहिताटीकामें इनका उल्लेख है। ५एक पेचकप्रायके मक समोर मा कर कहा, 'मगवन् ! माप कौन! प्रणेता। ६ नीलकण्ठस्तोस रचयिता। .34