पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/९७

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८. वातापिद्रियाताश्व : : गत्यको प्रणाममन्तः । वृक्ष, रे । २ शतमूली। ३ पुत्रदातो नामको लता।४ 1: "वातापिदितो येन पानापि च निराकृतः। . शेफालिका, निर्गुण्डी । ५ ययानी, मावायन । ६ भागी,

'समुद्रा शोषित। येन' समेऽगस्त्यः प्रसीदतु ॥" . ' भारंगो । ७ स्नुहो, धूर सिविडङ्ग, पायविडडारण,

- २ स्थूल शरीर । “वातापे पोव इद्भव' (मृफ ॥१८७८) जिमीकन्द, भोल।१० भलातक, भिलावा। १९ जतुका. यतिनिदिट् (सं० पु०) वातापि द्वधोति द्विष पिर। | जन्तुका लता। १२ शतावरी, सतावर । १३ श्वेत निर्गुडी, अगस्त्य मुनि। । | सफेद सिंहास। १४ पोत लोध, पोली लोघ । १५ शुक्ल घातापिन् । सं०३०) मातापि नामक असुर। रसोन, सफेद लहसुन । १६ तिलक पक्ष । १७ पृथुशिम्य- यातापिपुर-प्राचीन चालुक्यराज पुलिकेशीको राजधानी श्योणक, श्वेत एरण्ड, सफेदरेड़। १८ नीलपक्ष, नोल- 'गॉज कल हम बादामो कहते हैं। बादामी शब्द देखो।' . ) का पौधा, वातापिसून (सं० पु०) .वातापि सूदते ति सूद ल्यु । यातारि (स० पु०) मुकरद्धि मोर व्रणाधिकारोगमें मौषध गय " विशेष । प्रस्तुतप्रणालो-पारा १ माग, गधक २ माग, घातापिन् (सं० पु०) धातापिं . इन्ति हम पित। सिफला ३ भाग, चितामूल ४ भाग, गुग्गुल ५भाग, इन्हें "मगस्त्य ": : - ... रेडीके तेलको साथ घोंट कर गोलो वनाघे । अनुगान- व.ताया (सं०नि०) १. वायुपूर्ण 1. (पु.) २ उपक, सोठ और रेहके मूलका काढ़ा या अदरकका रस और जल.! ३ सोम। (भूक.१३५ शायण) " तिलतल है। इस जीपघका मेवन करा कर रोगीकी पोट घातामिप्यन्द ( संपु०) धायुजमित नेत्ररोग, घायुफे पर रेडीका तेल लगा स्वेद प्रदान करे। पीछे विरेचन कारण, माखका मानस रोगमें आंखों में सूई चुमने | · होनेसे स्निग्ध और उष्पा द्रष्य भोजन पराये । इससे वृद्धि की-सी घेदना होती और उसे शीतल संधनाव नया रोग प्रशमित होता है। रोगीके शिरमें शूल और रोमांच होता है। । : . . (भपज्यरत्ना० मुकवृद्धि पौर प्रणाधि०) (भावप्र० मेश्ररोगाधि० ) मेरोग देखा। धातारिगुग्गुल (सं० पु० )१ पातशाघि रोगाधिकारमें याताभ (सलो ) वायसे सन्तापित्त मेघाला!: । औषधिशेष । २ आमवात रोगाधिकारम औषयविशेष। घातात (स.पु. )वादाम। ....: .." : प्रस्तुतप्रणालो-डोका तेल, गन्धक, गुग्गुल और घातामोदा (स खी०:) पातेन प्रसूत मामीदो यस्या त्रिफला इन्हें एक साथ पीस उचित मात्रामें एक कस्तूरो। ... . . ........ मास तक लगातार प्रातःकालमें उष्णजल के साथ मेवन याताय. सलो ) पत्र, पेड़का पत्ता। . .. । करनेसे मामपात, फटिशून मोर पङ्गता आदि नाना घातापन (,सं क्लो) वातस्यं अपने गमनागमनमानी1 प्रकारफे रोग शान्त होते हैं। . . .१ गवाक्ष, झरोखा (पु.) यातस्पेव अयनं गतिर्यस्य । " (मपन्यरस्ना० बामवातरोगाधि०)

घोरक, घोड़ा । (प्रका०) ३ मनिला गोलसे उत्पन्नापे | वाताप्य (सं० नि) यात द्वारा पाने योग्य ।

शक १०१११८ पुताके मन्नद्रा ऋषि थे। ४ उलके गोत्रो ] . (ऋग भाष्य सायया ॥१२॥८) त्पमा । ये प्राक १०।१८६ सूकके मन्त्राष्टा ऋषि थे।५ घाारितण्डुला र सं० स्त्री०) विड़वा। (गानि० ) (रामायण के अनुसार एक नगरका नाम ।ौतामी (सं० स्त्री०) वासस्य मालो पन । पात्या, पायु। यातायनीय (सं० पु०).घातायन-प्रवर्तित वेदको एक यातारा (सं० पु.) पातमश्नाति मश घम् । यवनाश, छाया ..... ....: , वायुका पीना। . . . . . . . . भातायु (सं० पु०.).पातमयते. इति अय वाहुल कात् ठण। | पातागिन् ( सं. नि. ) पातमश्नाति अंश-णिनि । हरिण, हिरन 1. 'पवनाशिन, हवा पोका रहनेवाला। . . . पातारि: पु० ) वानस्य वातरोगस्य 'अति ११परएंड | याताश्य (सं० पु०) पात इव शीघ्रगो अश्वः । फुलोन .