पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१११

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विभुवनमें हम लोगों को पराजित कर सके ऐसा वीर दुर्वासाने इन वाक्योको सन उन पर ऐसो दृष्टि निक्षेप कोई भी नहीं है, हमने महादेवसे समस्त पत्र ले लिये की कि, मानो दोनों के प्राण तक जला दिये। मानो है, पाप लोग निश्चय समझिये कि, कोई भी बत्रहम त्रिलोक भला हो गये। उन्होंने रोषालपनियोंसे नृपतिथयः दोनों को पराजित न कर सकेगा। को कहा-"तुम्हारा यौनको निपात हो, निपात हो, मुमियों ने उत्तर दिया-"राजन् । यदि ऐसा ही है, तुम यहाँसे योन को दूर हो जापो, विलम्ब मत करो। तो हम अवश्य ही शिष सहित पापके पालयको चलेंगे. हम समस्त नृपतियों को दब कर सकते है, किन्तु हम किन्तु अभी हम सो स्थानमें रहेंगे।" इसके बाद यतिधर्मावलम्बो है, हम किसीका अनिष्ट नहीं करेंगे, दोनों वीर सरोवरक उत्तर तोर पर गये, वहां शिष्यों के भूतनाथ भगवान् ही तुम लोगों को रसका फल चखा- साथ भगवान दुर्वासा वास करते थे। उनको ध्यानस्थ वेगे।" इतना कह कर वे वहाँसे प्रस्थान करनेको देख कर वोरहय विचारने लगे-'यह कषाय वस्त्रधारी उद्यत हुए। यह देख कर दोनों वोरों ने उनका हाथ वर्णश्रेष्ठ महाभूत कोन है ? रहस्थाश्रम छोड़ कर यह पकड़ लिया और कहिले उनको कोपीन दिन कर कौनसा पाश्रम ग्रहण किया है। गृहस्थाश्रम हो तो डाली । यह देख कर पन्ध यति सब भागने लगे । अनन्तर धार्मिक भोर धर्म जों में श्रेष्ठ है, गृहस्थ ही सर्वश्रेष्ठ है, इस पोर डिम्भकने कालप्रेरित हो कर मनोधसे महर्षि- रहस्य ही सब जीवो का जीवन और माता है। जो के शिष्य, कमल, दारमय विदस, दण्ड पोर पावसमूह मूढ़ ऐसे ग्रहस्थाश्रमको छोड़ कर अन्य पाश्रम ग्रहण को शिव शिव कर दिया। इसके बाद दुर्वासा अत्यन्त करता है वह तो उन्मत्स, विक्तरूप और महामुख है। अपमानित हो कर श्रीक्षणके पास पहुंचे और उनसे हमारी समझसे यह भगड तपस्वी सिर्फ ध्यानक छलमे अपना सब काल कह सुमाया। बोलणने सब वृत्तान्त लोगों को धोखा देता होगा। ये जिम तरहके घोर सुन कर कहा--"पीघ्र ही हम इसका प्रतिविधान मूढ़ विज्ञानसे पाच्छव है, उससे मालूम होता है इन पर करेंगे।" वलप्रयोग करना पड़ेगा । कोनमा मुख इन दुर्मतियों इसके बाद स पोर डिम्भकने राजस्ययन के लिए का उपदेष्टा है, यह भो नहीं मालूम पड़ता।' इस श्रीक्षण के पास दूत भेजा। बोक्षणमे पन अत्यन्त पोख- तरहको चिन्ता करते हुए दोनों सहसा उस प्रतोन्द्रिय त्यको देख कर योन हो युद्धार्थ नका पाशान किया। दुर्वासाके सामने उपस्थित हो कर क्रोधभावसे कहने मार्ग में दोनों दलोंमें घोर युद्ध एषा। श्रीक्षण इसके लगे-"ब्राह्मण ! हम देख रहे हैं, तुम्ह बिल्कुल साथ भोर सात्यकि डिम्भकके साथ धोरतर युद्ध करने हिताहितका ज्ञान नहीं है. तुम यह क्या कार्य कर रहे लगे। श्रीकृष्ण को बहुत दूर ले गये। स रथसे हो? तुमने जिसका पाश्रय लिया है, वह कौनसा उतर पड़े पौर कालोयादमें आ कर बोक्षणके माथ. पाश्रम है? तुममे गृहस्थाश्रमको छोड़ कर यह कौनसा घोरतर युद्ध करने लगे। इधर डिभक, स श्रीक्षण द्वारा पात्रम ग्रहण किया है ? स्पष्ट हो मालूम पड़ता है कि, मारा गया, यह सुन कर युद्ध छोड़ दिया और यमुनामें घोरतर दम्भ हो इसका मूल कारण है। हमें मालम प्रवेशपूर्वक अपनी जिना उत्थाटन करके प्राणत्याग होता है कि, इन सबका नाश करोगे, सबको नरकर्म किया। इस पात्महत्या के पापसे विन्धक घोर नरकको डालोगे। तुम स्वयं नष्ट हुए हो, पोरों को भी नष्ट गये थे। (हरिवंश २९५।३९०) करने में प्रवृत्ती या कोई तुम पर वासन करने वाला डिभचक्र ( स० की.) डिभ इव च। मनुष्यों के शमा नहीं है। हम कहते हैं, सावधान होवो! यह सब बम निणय करने का चक्र। , छोड़ कर शीघ्र ही रही बनो, पञ्चयनका अनुष्ठान डिज (स• त्रि.) जिसकी उत्पत्ति पण्ड से हो। करो जिससे स्वर्ग प्राश कर सको, स्वर्ग ही मनुषों के लिये जिया (सो .) डिभ-टाप । पति गिद्य, गोदका परम पखासद