पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१२०

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लोहरडागामें यज्ञ डम्बरको हालको सिझा कर कहीं इसे बड़ा तथा जल सी पनि के काम में लाते है। एक प्रकारका काला रंग तैयार होता है जिससे काकड़,म्बर (Ficus hispida)-इमका पेड़ या कपड़ा रंगाया जाता है। यज डु,म्बरके पत्ते. मूल, हुम्वरको पेड़से कुछ छोटा होता है और भारतवर्ष में छाल और फल मबके मब देशोय वैद्योंसे पौषधरूपमें सब जगह तथा मलय, सिंहल,चीन पान्दामन होप, अष्ट्र व्यवहत होते हैं। वरमको छालको विरेचक औषध लिया आदि स्थानों में मिलता है भारतवर्ष में हिमा- रूपमें तथा घाव आदि धोनेके काममें लाते हैं। बाघ लय पहाड़ पर यह पेड़ ३५०० फुट अचे पर उगता है। तथा बिलाव आदि के काटने पर भी यह विषन माना इसको छालसे एक प्रकारकी रस्मो बनतो है। गया है। फल, बीज और छाल वमनकारक तथा विरेचक है। दमका मूलतन्तु आमाशय रोग विशेष उपकारी है। इसके शवफलवर्णको जलमें सिद्ध कर बम्बई और बहुतरे डाकरोंका मत है कि मूलतन्तुका रस बहत तेज- कोण प्रदेश में विदारिका प्रादिमें प्रलेप देते है। स्कर तया बनकारी औषध है। अधिक काल तक व्यव- दुग्धवतो गाय यदि कम दूध देने लगे, तो इसके खिलाने हार करनेसे वह पाश्चयं फल देता है। पित्त के बढ़ने से वह दूध देने लगती है। आयुर्वेदोयके मतसे यह पर इसकी सूखी पत्तियोंको घर कर मधुके साथ मेवन टुग्धकर भोर गर्भस्थ व्रणके लिए हितकर है। करें। पाट किनमन माहब ( Atkinson )-ने लिखा. काकोडुम्बर देखो। -इसके पत्तों पर चेचककै जेसा जो दाग उठ जाते हैं इसके पत्ते प्रादि पशुओंके खाद्यपदार्थ है। लकड़ो उन्हें दूधम भिगो कर मधुक माथ सेवन करनस शीतला जलाने के सिवा पोर किमी काममें नहीं पाती। गेगमें उसका दाग शरीर पर नहीं पड़ता है । यह अनेक चिडियाँ इसके बीजको अट्टालिकाकी दीवारों पर ले प्रकारक रजोगेग, मूत्ररोग. मेघटित रोग पोर काश जा कर खाती हैं और जो बोज वही छोड़ दे तो उमसे रोगमें अनेक तरहसे व्यवहत होता है । अर्थ ओर उदरा- प्रालिका पर पेड़ उग जाता है। यह पड़ मकानका मयरोग या डम्बरका दूध दिया जाता है । उस दूध बहत अनिष्ट करता है। में यदि थोड़ा तिलतल मिला दें, तो वह धावको उत्तम नम्बर (Ficus Roxburgii) -यह वृक्ष हिमा. मरहम बन जाता है। ताजा गूलरका रस धातुघटित लय प्रदेशसे ले कर भूटान. आसाम, श्रीहट्ट, चट्टग्राम पोषधर्क अनुपान के रूप में व्यवाहत होता है। तकके देशों में पाया जाता है। यह पेड़ ६००० फुट टेवकार्य में व्यवद्वत होने के कारण इस देश के कितने ऊँचे पर होता देखा गया है। पड़ मझोले कद का लोग यज्ञडम्बर नहा खाता इसका आकार साधारण होता है । इमका कच्चा फल तरकारोक साथ व्यवहृत गूनरको अपेक्षा कुछ बड़ा, पर उतना सुखादु गहो' होता है। पकन पर यह कोमल, लाल भोर सुगन्ध तथा होता। वैशाखमे भाद्र तक फल लगते हैं। नीच येणो. तोला है। मतमे लोग का गनर खाने । के लोग की गूलर को सरकारोके साथ खाते हैं। पकने पंड़के नोचे तथा शाखा प्रशाखामों में गुच्छाका गुच्छा पर समृचा फल छाई मरोखा लान हो जाता है । अजन्मा फल लगता है। शतद्रु नदीक किनारे गूलरकी लालसे और दुर्दिनके ममय बहुतसे लोग इसे खाते हैं। एक प्रकारको मोटो रस्सी बनता है। इसको लकड़ो ___बकरे भेड़े गूलरको बड़े चावसे खाते हैं। इसके किसी काम में नहीं पाती। मवेशी सके पर्त को बहुत पत्त हायो पादिक खाद्य हैं। पसन्द करते हैं। गूलरको लकड़ी अन्त:सारशून्य, लघु तथा अन्दी भूइम्बु र (Ficus heterophylla) -इस जातिका इटनेवाली होती है। यदि इसे कुछ समय के लिए जलम | गूलर सताके पाकारम पैदा होता है। यह भारतवर्ष रख छोड़ें तो यह बहुत दिन तक ठहरती है। सी. पौर ब्रह्मदेशक उच्च प्रदेशम, चट्टग्राम, तेनारिम, कारण लोग इसे कुएं के चारों ओर रखते हैं और कहीं सिपल पादि स्थानम नदी किनारे उत्पन होता