पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१२१

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है। स्थानभेदने इसके को भेद हो गये हैं। इसके डूगरगढ़- मध्यप्रदेश सरागढ़ सामन्त राज्यका एक पत्त और मल पौषधमें व्यवात होते हैं। जड़की छाल शहर। यह पचा० २१११३० पौर देशा० ५०.४६ बहुत कड़ाई होती है । उसका चूर्ण धनियाक साथ पू० मध्य बाल नागपुर रेलवे द्वारा बम्बरसे ६४७ मोल- मिला कर सेवन करनमे काश, कफ प्रादि द्रोग जाते की दूरी पर अवखित है। लोकसंख्या प्राय: ५८५६ रहते हैं। है। यह शहर व्यापारका एक केन्द्र है। यहां एक गूलरक पु पुष्प और स्त्रोपुष्पके अलग अलग कोष वर्माक्य लर मिडिल स्याल, बालिका बल और एक होते है। गर्भाधान कीड़ोंको महायतामे होता है। पु पोषधालय है। ज्यों ज्यों बढ़ता जाता है, त्यो त्यों कोडोंको उत्पत्ति होती डूगरपुर-१ राजपूताने के दक्षिणका एक राज्य । यह जाती है। ये कोड़े पुपरागको गर्भ के शरमें ले जात अक्षा. २३२० से २४.१७० और देगा० ७१ २२ से है। ये कीड़े किस प्रकार पराग ले जाते हैं, यह जाना ७४.२३ पू०में अवस्थित है। भूपरिमाण १४४७ वर्ग- नही जाता । लेकिन यह निचय है कि ले अवश्य जाते हैं मोल है। इसके उत्तरमें मेवाड़ या उदयपुर, पूर्व में और उसौसे गर्भाधान होता है तथा कोश बढ़ कर फलके बांसवाड़ा, दक्षिण में रेवाकांठा पजेन्सीको रियामते- रूपमें होते हैं। फल बिलकुल मांसल और मुलायम मंथ व कडाणां और पश्चिममें महोकांठाके अन्तर्गत रिया. होता है। उसके अपर कड़ा छिलका नहीं होता, सत ईडर वा रेवाकांठाक पन्तगत सूनावाड़ा बहुत महीन झिल्ली होती है। डुम्बु र वङ्गदेशक चन्द्रीय भूभागके अन्तर्गत एक राज्य विशेषकर परावलीपर्वत-मालाकी शाखापी- प्राचीन ग्राम । भविथनाखण्ड में लिखा है- से माछादित है। लेकिन जंचाई सब जगह बहुत एक दिन महादेव उमाके साथ पाकाशमार्ग हो कम है। जंचासे जचा शिखर समुहले १८८१ कर इन्द्रपुरको जा रहे थे। अकस्मात् चन्द्रदीप पर फुट ऊँचा है। वर्षाकालमें यहांका दृश्य देखनेयोग्य उनको दृष्टि पड़ी। यहां के भक्तोंका नृत्य देख कर है। जिधर हो दृष्टि डालिये उधर ही सब मखमली विमोहित हो गये और डमरू उनके साथसे नीचे गिर जमीन नजर पातो है । जलको एटा और ही निरालो पड़ा । डमरूक गिरने से अपूर्व शब्द होने लगा। यह है। राज्यका दक्षिणी भाग कुछ समतल है और यही देख कर चन्द्रहोपक ब्राण वेदविधिसे उमरूको पूजा भाग बहुजमाकोण तथा समृदिशाली है। करने लगे। इस पर शिव-उमरुने संतुष्ट को कर वर यहां ऐसी एक भो नदी नहीं है जो बारहो मास दिया। “यहाँक सभी मनुषा धार्मिक, विहान, जानी, बहती हो। जितनी नदियाँ वहां से भी उनमें केवल धनी और निरोगी होंगे।" जिस स्थान पर उमा गिरा दो ही प्रधान , माही पौर सोम । माही नदी राज्य- था वही स्थान कालक्रमसे डम्बरू या इ.म्प र नामसे को पूर्वमें बांसवाडास और दक्षिणमें मूंधसे पथक भरती मशहर हो गया है। ( भ. ब्रह्मख० १३ अ.) है। वर्षाऋतुम ये दोनों नदियाँ बड़ी विशाखाकार हो अम्ब रपर्णी ( म स्त्री० ) दन्तीक्ष। जाती है। मोरन नदो राज्यके मध्यमसे पर खातो हुलि ( स०सी०) दुलि पृषो• साधः । १ कच्छपो, हुई वक्रगतिसे बहती है। इनके पखावा भादर, माजम कमठी, कछुई। २ यामविशेष, वाहन, सवारी. प्रस- चौर वानोक अन्य छोटी छोटी नदियाँ है। इस प्रान्त- वारी। में स्वाभाविक झोल तो नहीं, पर त्रिम तालाबोको जुलिका (स• स्त्री०) लिरिव कायति के क । खुमना- कार पक्षिविशेष, खंजनको जातिका एक पक्षो। भी कमी नहीं है। सबसे बड़ा तालाब गैपसागर राज- हुली ( स्त्रो०) चिल्लो साग, लालपत्तोका बधा। धानीमे है। रेल रियासतक किसो भागसे हो कर नहीं गर (हि. पु.) १खबार, ठोला । २ छोटी गई है। रायान्तर्गतम बोई पनी सड़क भी नहीं। चौर जो एक दोर भी वे केवल एक ही दो मोल तक Vol. Ix.30