पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१२२

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११८ राजधानीसे वीरएर कोठी सक गई है। शेष मभो करके आप १२६१० परलोकको बाली माग की। उत्तराधिकारी करमसिंहने २३ वर्ष राज्य किया और __जिम प्रकार और प्रान्तो घोड़ों की मवारी काममें इनके लड़के रावल कामदेवमे लगभग १३८९ १eet. लाई जाती है, उमौ प्रकार इस प्रासमें बैलोंको । पर यह तक राज्य किया। पहोंने कामड़दा पोल बनवार, मां सवारी भारतकं अन्य प्रान्तों में हेय समझी जाती है। पर फिलहाल कोतवाली. खुजाना और हिमाव दफ्तर यहाँका जलवायु अप्रेलसे जून तक गर्म पौर शुष्क, पर है। बाद पातारावल राजमिहामनारूढ़ हुए; इन्होंने मितम्बर और अकबर महीने में बहुत ग्वगब रहता है। १३८८ से १४११०तक राज्य भोग किया। उन्होंने एक शीतकाल मबसे अच्छा समझा जाती है। यरों पर तालाब खुदवाया जो पातेला तालाब कहलाता है। वार्षिक वृष्टिपातका औसत २७ सच है। इन उत्तराधिकारी इन लड़के गेपा गवलजी हुए। इतिहास-डुगरपुरके वर्तमान राजवंशका वर्णन कर लोग इन्हें रावल गोपीनाथ भी कहते थे। इन्होंने अपने नेके पहले यह कर देना उचित होगा, कि इस वशको नाम पर गेप मामका तालाब बनवाया। यहो तालाव स्थापनाके पहले किस किम वशका इस देश पर पाधि- राज्य भरमें सबसे बड़ा है। तालाबके एक किमार पर पत्य रहा। ३री शताब्दीके पूर्व यह प्रान्त मौर्य 'उदयविलास' नामका एक नवीन राजप्रासाद सुशोभित माम्राज्य के अन्तर्गत था। बाद यह कुशनवशके है। इनका देहान्त १४४८ ई० में हुआ था। बाद मोम- संस्थापक कनिष्कके हाथ लगा। इसी प्रकार कालक्रमसे दामजो राजतख्त पर बैठे। इनके समयमें महमद यह क्षत्रप, गुण, इण, वैस तथा परमारव'शके हस्तगत खिलजीने राजधानी पर धावा मारा। जब वे बहुत होता गया। पब वर्तमान डुगरपुर राज्यको स्थापना. उत्पात मचाने लगे तब सोमदासने दो लाख रुपये और के विषयमें करते हैं, कि मेवाड़नरेशके दो पुत्र थे-माहुप २० घोड़े भेंटमें दे कर शव से विण छुड़ाया। और राहुप थे। बड़े पुत्र माहुपने ही वर्तमान राज्य- गङ्गा रावलको उत्तराधिकारी छोड़ पाप १४८११. की स्थापना की। ये कुछ काल तक पहाड़में रहते थे, में परलोकको सिधारे। गङ्गाने १४८रसे ले कर १४८८ इस कारण उनले धशज अहाड़ा कहलाये। डूगरपुरमें सक राज्य किया। बाद रावल उदयसिंहजो १म यह कथा प्रसिद्ध है, कि महारावल वोरसिंहजीने डूगर- सिसनासोन हुए। इस समय मेवाड़ के सिंहासन पुर राजधानोकी स्थापना की है। जहां पर आज कल पर महाराणा सग्रामसिहजो सुशोभित थे। उन्होंके उगरपुरको राजधानी है, वहां पर पहले डुंगरिया नामके समयमें बाबरने दिलोमें मुसलमानी साम्राज्यको नीव एक भीलका पाधिपत्य था। वह भ्रष्टाचारी था। डालनेका विचार किया। दोनोंमें घनघोर युद्धमा । सौ एकपवलाका धर्म बचाने के लिये वोरसिंह रावल सत्यमित संग्रामसिक पक्षमें थे। रणथलमें कटम उसे मार डाला। बाद उसको दो स्त्रियोंने वीरसिंहसे बढ़ाने के पहले इन्होंने राज्यको दो भागों में बांट दिये, एक कहा, "इस स्थान पर पाप अपनी राजधानी बना कर भागका नाम ईगरपुर रखा और दूसरेका बांसवाड़ा। उसका नाम हमारे पतिके नाम पर ही रखना, और डगर धपत्र पृथ्वीराजको चोर बांसवाडा कनिष्ठपुत्र इमारा ही वंशज आपके उत्तराधिकारियोंको प्रथम राज जगमलको सौंप दिया। रावस उदयसि खनवाकी तिखक किया करेगा।" तभोसे यह स्थान डूंगरपुर नामसे लड़ाई में खेत रहे। प्रसिपाहै। बहुत दिनों तक तिलकको भी प्रथा रावल पृथ्वोराजजोके समयसे २० वर्ष तक डूगरपुर. तर जारी रही पर पब नहीं है। में सुख-शान्ति विराजतो रहो। सन् १४४१ पोर १५५४ वीरसिंह बाद भसुण्डो राजसिंहासन पर बैठे। के बीचमें पृथ्वोराजका स्वर्गवास होने पर उनको रोने केवल एक वर्ष तक राज्य किया। इनकी उत्तरा- लड़के पासकरपजी राजसिंहासन पर बैठे। हो । धिकारीगरसिजी हुए। दो ही वर्ष तक राजत्व अपने नाम पर "पासपुर' नामका पाम बसाया । बोम.