पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१२३

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११९ पौर माही नदीक साम पर वेशीवर महादेवका जो १७०० में महारावल रामसिंहलो उगापुरके मन्दिर है, वह भी रही का बनवाया रचा है। इसके सिंहासन पर पाए। वेई प्रतापी और तो सिवा ये राजधानीमें चतुर्भुजजोका मन्दिर निर्माण कर सभावके निकले। समय सार राज्यमें सुख. गये कहते हैं कि लूटमें जो इन्हें ८४ मन सोमानाथ शान्तिका साम्राज्य था। वहां तक कि राज्यको लगा था, उसीसे सोने तूला-दान किया। समाद 'राम-राज्य' कहते थे । १०२८ समभग इसका खम अकबरको बधीनता खोकार कर ये उन्ह वार्षिक कर वासरा। बाद शिवसिजीराव उत्तराधिकारी देने लगे। हुए। ये भो योग्य पिताके योग्य पुत्र थे। विशनीका इनके बाद सहसमलजी राजगहो पर सुशोभित हुए। पादरसन समयमै यथेष्ट था, कारण, पाप खयं विहान इनके शासम-कालमें राज्य भरमें शान्ति विराजतो रही। चौर कवि थे। ये कहर धार्मिक भी.रहे। यहां तक कि गन्य उबतिको चरमसीमा तक पहुंचा हा था। जरावस्था में पाप योगीके भेषमें जटा धारण किये रखने १५८०१०में इन्होंने सुरपुरमै गालो नदों किनार श्री लगे थे। रनोंने राज्यमें पच्छी पछी इमारत बन. माधवराजजोके विशाल मन्दिरका निर्माण कराया। १८ । वाई। करते है, कि गुमटा बाजार पाप ही बनवा वर्ष गज्य कर चुकनेके बाद १६०४ में भाप इस गये हैं। १७८४ में इनका खगवास हुपा। लोकसे चल बसे। इनके उत्तराधिकारी कर्म मिजो इनके पश्चात् महारावल वैरिमालजोने मरपुरको हुए, जिन्होंने केवल पांच हो वर्ष तक राज्य किया । गहीको सशोभित किया। इनकी महिषो मौरहा सनजोने नक समयमें कोई विशेष घटना नघटी। बाद १६११ राजधानी में एक मन्दिर बनवाया जिसमें मुरतधरजीकी में पूंजाजीने डूंगरपुरकी गहो सुशोभित की। इन्हों। मूर्ति स्थापित की गई। अपने लड़के फतहसिहजी पर ने अपने नाम पर पूजपुर स्थापित कर वहां "पूजेरो" राजकाय सौंप पाप १७८८ में इस लोयमे चल बसे। नामका एक वृहत् तालाब खुदवाया। मुगलममारने फतहसिह रातदिन नभेन चूर रहते थे, राज्य शासन इनको डेढ़ हजारोका मन्सब और माही मुरातब पता उनके मन्त्री पेमजी चलाते थे। नये कारण पाप एक किया। पच्चोम वर्षे राज्य करने के बाद १६५६ ई. में बार बन्दो भी हो चुके थे। इगरपुर राज्यमें जहां एक इमका देहान्त हुआ। बाद महारावल गिरिधरजो राजसिंहासन पर पासोन ममय सुख शान्तिका सामान्य था, पात्र वहां पापत्तिका घनघोर गर्जन होने लगा जहा सहा सभी खतम्बको हुए। इस समय मुगलसम्राट औरङ्गजेब और मेवाड़. के शासक राजसिजी थे। आपने दो लड़के छोड़ गये। इसी मौकम १८०५९०को महाराहोंने भो राज. कर मानवलोला समाप्त की। बड़े सड़क जमवन्त- धानी पर धावा मारा। सत्र से मुठभेड़ करनेका तो जोने १६८०० तक राजा किया। इनके छोटे भाई साहम फतहसिंह था नहीं, दो लाख रुपये है कर उनसे अपना पिण्ड छुड़ा लिया। हरिसिंहजी या केशरीसिंहजी थे जिन्हें सावलोको १८०८०म महारावल फतहसिंह पचवको प्राप्त हुए । जागोर मिली। जसवन्तके भी दो लड़के थे, बड़े खुमान- सिजी और छोटे फतहसिहजो। बड़े समानसिंहजो बाद जसवन्तसिंहजी राजगहो पर बैठे। इस समय सिन्धी राज्याधिकारी हुए और छोटे फतहसिजीको नांद- पठानोंने उंगरपुर राज्य में प्रवेश कार उसे चारों पोरसे घेर लिया। दोनों में २० दिन तक धनघोर युद्ध होता लोका ठिकाना मिला। इनको समयका कोई रहा। अन्तमें 'घरका भदिया लहा डावालो कहा- विशेष विवरण नहीं मिलता। इनके पांच लड़कों- वत चरितार्थ हुई। इनसे किसी एक नोपने रातको में रामसिंहबड़े थे। ये बड़े डहण पोर ठकारी थे। किसी कारणवय पिताने र निर्वासनको पात्रा राज-फाटक खोल दिया। जिससे पनेिक योता हताहत दीधी। किन्तु मरत समय वाम उमड़ पाया ए। स्त्री, पुरुष, बाल, बब की मन के शिकार बन और दुवराजको इखवा मंगाया । परी। नगर में हाहाकार मच गया। मकान सूटे पोर इन्ध