पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१४०

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___ महामहोपाध्याय पण्डित हरप्रसाद पाखीजोका पूजा बोच धर्मानुगत मीसमें प्रायः सबोरस कहना है कि भारतवर्ष से चौडधर्म पब तक भो सम्म का मकते है। परन्तु बोधर्म का इतिहास पर यह रूपसे लम नहीं हमा है भारतवर्ष के भिव भिव खामो- मन्देश जाता रहता है । भोटदेयोय तारानाथ पुस्तक में डोम बोधर्म के अस्तित्व का सालो देते हैं। वे यह में लिखा है कि रामपाल के राजस्व काल में विलय धावि- भो कहते कि डोम बागांका प्रभुत्व खोकार नहीं भूत हुए। वे धर्म पाल नामसे भो प्रसिह थे। धर्मपाल के करता। धर्म पुरोहित श्रेणोके डोमोसे उनका धर्मानु- शिष्यका नाम काल-विरुप और काल विरूपके प्रधान ठाम किया जाता है। बुद्धटेवका एक नाम धर्मगज शिवका नाम विरूप-कक था।ये त्रिपुरा के राजा थे। ये है। मबमे पहले काय डोमने धर्म गजका योगेरिस्थ पाचार्य कालविरूपके निकट दोक्षित इए, बाद मिहि- प्रान किया था । घनगमको पुस्तक में लिखा है कि गोर्ड- लाभ करने के लिये भविष्यवाणी के अनुसार इन्होंने डोम वर धर्म पालने मामढको मन्त्रोके पद पर नियुक्त किया जातिको पद्मावतो नामको किसी स्त्रोको शक्ति रूपसे ग्रहण था। मामद रक्षाको अत्यन्त घृणा करता था। किन्त किया। इस पर प्रजाने उन्हें राज्यसे निकाल दिया। धर्मराज रखाको बहस चाहते थे। महामद अपने राजा डोमनो के साथ जङ्गल जा कर वन रक्षा करने लगे भाजा रज्जाके पुत्र नाउमेनको विविध उपायसे विमष्ट और मिह हो कर डोमराज या डोमा चाय नामसे परिचित करनेकी चेष्टा करने लगा। परन्तु धर्म गजका प्रियपात्र इए। बाद एक दिन त्रिपुरा राज्य में भारी उपद्रव उप. होनेके कारण वह उसका कल भी अनिष्ट कर न मका स्थित होने पर ये विशेष अनुरुड हो कर वहां गये। महामदको मारी चेष्टा निष्फल होने पर उसने माउसेन यहां पा कर वे धर्म मामक बोद्ध तान्त्रिक मत प्रचार को युबके लिये कामरूप भोर पडोसा भेजा। धर्मराज करने लगे। बहुत से इनके शिथ हो गये । डोमाचाय - अनुग्रहसे लाउसेन प्रत्येक कार्य में ही जातकार्यपा । को बहुत क्षमता देख कर गढ़देश के गाने भी उनका अन्तमें महामद अपना भ्रम समझ कर अपने भांजको शिवत्व स्वीकार किया और दूसरे दूसरे लोग भी प्यार करने लगा। मद्य पोर शूकरका मांस खामेको इनका यथेष्ट सादर करने लगे। धर्म उपासनाने भो खाधोगता देकर लासमेनका प्रिय सेनापति कालु डोम धि पाई। बोडधम के शेषकालमें ध में उपासना प्रव- धर्मराजका पुरोहित बनाया गया। धर्मपाल बौद्धधर्माः तित हुई। धम राजकी अर्चमा बोड उपासमाको वाम्बी थे। साधारण मनुष्यों को सुविधा के लिये मालम तान्त्रिक पाकति है। इस उपामना प्रणालोस भनी, पड़ता है कि बौषधर्ममे धर्मराज पूजाकी मुष्टि धर्मपाल- डोम प्रभृति पन्त्वजोंमें पावह है। बौद्धधर्म की शेषाः के समयमें ही हई। वह पूजा पाज भी प्रचलित है। वस्थामें बुद्ध और बोधिसत्वोंकी उपासना परित्यक्ता तथा डोम गम दृश्यसे देवताको पचमा नहीं करते । डोम प्रायः दिक्पाल और धर्म पाल प्रभृतिको पूजा प्रचलित हो सूपरके मामसे धर्मराजको उपाममा करते हैं। ध्यान गई थी। मन्न सुनसे धर्मरान हो बर्दिव है, ऐसा प्रतीत बहुतों के मतसे डोम भारतको पादिनिवासी माय होता है। जानिकी एक श्रेणी है। रनको पाति देखनसे भी "स्पान्तो नादिमध्ये न च कर चरणं मास्ति कायनिदानम्। ये बहुत कुछ उन लोगों ने मिलते जुलते । मया नाकार नादिरूपं नास्ति जन्म झयस्य (?) डोमोंको पालति छोटो, वर्ष काला, बाल बई बड़े योगीन्द्रो ज्ञानगम्यो सफलअनहितं सर्वलोकैकनाथम् । और पांख पनार्यासी होती है। पूर्व बङ्गालक डोमीके सनं तच निराजनं मरबद पातुः शुन्यमूर्तिः।" बाल काले और लम्बहोते। विसोका मत है कि इस मन्त्रको सम्बक पालोचना करनेसे बुदेवका डोम द्राविड़ के प्रवर्ग है। परन्तु इस सम्बन्ध अपनी मनमें उदित हो पाता है। शाखोजोने चोर Journal of the Asiatic Society of Bengal tor 189KE भौमविभूकावलि और ध्यान के लिये धर्मराज ...