पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१४९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


जाता है. कि मलमलके लिये चरखेका कता हा पाथ जलवायु। जिसके चारों पोर बड़ी बड़ी नदियों के छटा सूतका मुन्थ ५० न०मे कम नहीं था। आज हनेमे ग्रोभकालमें यहाँको जलवायु कुछ शौसम्म रहती भी दो एक तोतो कुछ शौकीन व्यक्तियों के लिये पहलेसा है। वैशाख के पन्तसे पाखिन मास तक यहाँ वृष्टि होती मलमल थोडा बहत बनाते हैं। अधिकांश ताँतो तरह रहता है। इस समय चागे पोरकी भूमि जलमग्न तरहके देशी वस्त्र बुनते हैं। इनमेंमे अनेक महाजनोंके रहती है। वर्षाकालका अन्त भाग पोतिकर रहता निकट ऋणग्रस्त हैं. अत: महाजन उन्हों से सब कपड़े है। वार्षिक दृष्टिपात प्रायः ७४ रञ्च और सारांश ले कर बेचते हैं। मोने और चाँदीके अलङ्कार बनाने- प्रायः ७८८ फा० होता है। भूमिकम्य भी प्रायः हुपा वाले तथा शङ्ग वणिक को अवस्था व मी नहीं है। वे करता है । १७६२ पौर १७७५१०के मई मासमें भीषण खाधोनभावमे माने अपने कर्मशाले में काम करते हैं और भूमिकम्म हुआ था। अपने ट्य को इच्छानुसार जहाँ तहाँ बेचा करते हैं। सभी रोगों में ज्वर, गलगगड, पामाशय, अतिसार, उसके मिवा यहाँ भिन्न भिन्न प्रकार के वाद्ययन्त्र, मोने वात,आँख का दुख होना इत्यादि साधारण है।ग और चॉदोका फोता, हाथो दोतके कई तरह के द्रव्य, चित्र. वसन्त गेगसे भो कभी कभी बहुत मनुष्यों की मृत्यु फ नदार माड़ो प्रादि बनती हैं। होती है। छोटे छोटे ग्रामवासियों को स्वास्थारचाकी ____ढाका एक बड़ां बाणिज्य का केन्द्र है। जलपथ हो कर ओर किसोका भी ध्यान नहीं है। नवाब अबटुलगणि हो इमका अधिकांग बाणिज्य होता है। अभी रेलपथमे ढाका नगरके स्वास्थाको उन्नति के लिये अर्थसाहाय्य और भी इसका बहुत बाणिज्य च न रहा है। पहले यगेपोय, स्वास्थासमिति संगठन तथा परिष्क त जल प्रालिका यदो. मुण्लमान, वारवाडो आदि जाति के बणिक् तथा अच्छा बन्दोबस्त कर ढाकावासियों का बहुत उपकार देशो वणिक् यतों कपड़े का कारवार बहुत करते थे। कर गये है। दातव्य-चिकित्सालयों में एक पगलागारद, अभी उम व्यवमायका हास हो गया है। नारायणगञ्ज मिटफोर्ट अस्पताल, अबटुनगणिप्रतिष्ठित एक सदावत ओर उम के निकट मदनान ममृशानो नगर हैं। यहाँ ओर १३ दूमरे दूमरे अस्पताल है। बाणिज्य अधिक होता है। मुन्शोगञ्जमें प्रति वर्ष तीन इतिहास। अभी बङ्गाल कहनेसे जिस तरह राढ़, मसाह तक मेला लगता है। उम मेलेमें भारतवर्ष के वरेन्द्र बा, बागड़ी प्रभृति स्थानों का बोध होता है, माना स्थानों मे, यहाँ तक कि दिलो, अमृतसर, आराका। पहले उस तरह नहीं था। अभी जिस्को ढाका विभाग पादि दूर दूर देशोंमे भो बणिक पाते हैं। कहते हैं, उसीका अधिकांश पहले वन नामसे प्रसिद्ध इस जिनमें विद्याको उन्नति के लिये विशेष चेष्टा हो था। इस समय लोग जिसे पूर्व बङ्गाल कहते हैं, महा- रही है। ढाका शहर छोड़ कर अन्यान्य स्थानों में भो भारत और पौराणिक समय से कर गौड़के सेनराजा- छापेखाने स्थापित हुये है और मासिक तथा मालाहिक मोके गजवकान तक उसोको केवल वङ्ग कहते थे। पत्र निकलते हैं। पाठशाने आदिम गवर्म ण्टसे सहा. वर्तमान ढाका जिले का अधिकांश पौर फरीदपुर यता मिलनेको प्रथा प्रचलित हो जानसे छात्रमख्या । जिलेका कुछ अंश सेनराजाओंके समयमे विक्रमपुरनामसे बहुत बढ़ रही है। अगरेजो स्कल भो यहाँ बहुतमे मशहर था: सेनगज विश्वरूपक ताम्रशासन द्वारा है। ढाका नगरमें एक कालेज है। लड़कियोंको पढ़ाने यह प्रमाणित होता है।* के लिये यहाँ कई एक कन्या-पाठशालाएँ हैं। मुसल ढाका नाम कबसे प्रचलित है, उसका स्थिर करना मानांके लिये मदरमा है। कठिन है। महाराज समुद्रगुल के इलाहाबाद के शिलालेख- __शासनकायको सुविधा के लिये यह जिला ढाका, में लिखा है, कि उन्होंने डवा और ममतटकी जय नारायणगञ्ज, माणिकगज और मुन्धोगञ्ज इन चार उप- किया था। बंगालका दक्षिणांश समुद्रकुलवर्ती स्थान विभागों में पौर फिर वे भी कुल १३ थानों में विभक्त हैं। fournal of the Asiatic Society of Bengal for 1895., Vol. IX. 37