पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१५०

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पहल समतट माममे मिड था। दोनों नामके पास उत्काल के विख्यात भुवनेबरम पमन्तवासुदेव मन्दिरमें पास रहनेसे वर्तमान ढाका ही पहले डवाक था, ऐसा भभव देवको एक प्रशस्ति है. जिममें बङ्गाधिपरिवर्म. अनुमान किया जाता है। देवका परिचय मिलता है। शायद ये १२वीं शता- प्रवाद है, कि तिके बहुत पहले यहाँ ब्दोके किमी ममय विद्यमान थे। मेनवशीय राजांपोंकि विक्रमादित्य नामक एक राजा राज्य करते थे, उन्हों के समय में दक्षिणगढ, बोर वरेन्द्ररम्हों तीन स्थानों नामानमार विक्रमपुरका नामकरण हुपा है। में उन लोगोंको गजधानी थी। सेन -गाजवंश देखो। मह. भविथ ब्रह्मवगड़में लिखा है-“यहाँ ढकावाद्य पद-इ-वतियारके ११८. ई में नदिया अधिकार प्रिया महाकालो वाम करती हैं, इसोमे देशीय मनुष्य करने पर महाराज लक्ष्मण मेनके पुत्र केशवमेन गौड़राज्य इम स्थानको ढक्का ! ढाका) कहा करते हैं। इसका परित्याग कर विक्रमपुर भाग आये थे। उस समय यों दूमरा नाम जागीरपत्तन (१) ( जहाँगोराबाद ) है। लक्ष्मणसेनके दूसरे पुत्र विखरूपमेन शासनकर्ता स्वरूप ढाका जिलेका प्राचीन इतिहाम अन्धकारमय है। थे। ये भो मुसलमानोंक माथ युद्ध कर स्वाधीनभाव मे महाभारत के समय यहाँ सत्रिय वीरगण राज्य करते राज्य करने लगे। उनके ममयमें पूर्व बङ्गाल पोर थे। 4.। देखो । बौद्ध प्राधान्यके ममय गौड़के दूसरे में समतट स्वाधीन था, मुसलमान उमे ज त न सके थे । बौद्धधर्म को सूचना होने पर भी यहां किसो ममय बोड उनके वाद सदासेनने (?) कुछ काल तक राज्य किया, धर्म प्रबल था, उसका कोई विशेष प्रमाण नहीं है। इस समय सुवर्ग ग्राम में मन राजाको राजधानी थो। छठी शताब्दोमें काश्मोरगज वालादित्य ने पूर्वममुद्र तक तदनन्तर प्रवल पराक्रान्त मेनराश दनोजा माधवने जीत कर काश्मोरियांक रहने के लिये यहाँ कालम्बा बहुत दिनों तक राज्य किया। पोछे दिली नामक एक अनपद स्थापन किया (२)। मम्राट् बलवन तुधिलग्नाँको दमन भरने के लिये गोड़ वों शताब्दोमें गौड़गज्य पालवंशीय राजाओं के गज्य पहुँचे। महाराज दनोजामाधवने जलपथसे मम्राट : अधीन होने पर यहां भी उनके वशीय कोई कोई को यथेष्ट महायता को थो । माल म पड़ता है कि उमी स्वाधीनभावसे राज्य करते थे । दक्षिण प्रदेश के तिरुम कारण लक्ष्मणावतोके सूवादार उन पर विरक्त हए थे लय शिलालेखम लिग्वा है, कि जम (१०वीं शताब्दीमें ) और अब बलवन लौट कर पाया तब मुवादारोंने भो महाराज राजेन्द्रचोलने वनराज्य पर आक्रमण किया, दनोजके अपर अत्याचार प्रारम्भ किया। राजा दनुज- तब यहां गोविन्दचन्द्र नामक एक राजा राज्य करते मटनने गौड़ परित्याग किया ओर चन्द्रहोपमें पा थे: गौड शब्द देखो। कर राजधानी स्थापन को। इस समय वतमान पाश्चात्यवं दिक-कुलपञ्जिकाके मतसे १००१ शकमै ढाका जिलेका अधिकांश मुमतमानोंक अधिकारमें मनाराज श्यामलवर्मा (पूर्व ) वङ्गमें राज्य करते थे। पाया । सुवर्णप्राम देखो । वत्त माम फरोदपुर पोर बाखर (१) "पद्धग गातटे वेदवर्षसाहस्रव्यत्यये । गन ले कर चन्द्रदीप राज्य स्थापित हुपा। दनुज स्थापितव्यत्र यवनै गिर पत्तन महत् ॥ मदनके वंशधरोने बहुत समय तक चन्द्रहीपमें राज्य तत्र देवो महाकाली ढक्कादायप्रिया सदाः। किया। चन्द्रद्वीप देखो। प्रायः १२३०ई०में जब ढाका . गास्यन्ति रत्तन ठक्कासंज्ञा देशवासिनः।" मिला मुसलमानों के हाथ पाया, सब थोडे समयक (भ• ब्रह्मखण्ड, ९ अ.) बाद ही वंधवंशीय बल्लाल नामक एक व्यतिम प्रवल (२.)"यस्यायापि जयस्तम्भाः सन्ति ते पूर्ववारिध।। हो कर विक्रमपुरका पधिकाँधपधिकार किया और वहाँ प्रभावांकन वकाला जित्वा येन व्यधीयत । कुछ काल तक स्वाधीनभावसे राज्य किया था। उनके काश्मीरिकनिवासाय कालव्याख्या जनाश्रयः।" पादेशसे उनकी शिक्षक गोपालमान १३०० शकपर्थात (राजतर. ४२) १३७८ ई० में 'बबालचरित' नामकी पुस्तक बनाई। HIRAM