पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१५७

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दिलरिमरित २५६ २ मचिके पदोका भाग। लोहेका चौड़ा ट.कहा जो टुकना (हिं• त्रि०) १ प्रवेश करना, घुसमा । २ पात्र किसी कसे जानेवाले पच के सिर पर लगा रहता है इससे मन करना, टट पड़ना । ३ घातमें छिपमा । पेच बाहर नहीं निकलता है। ४ चमड़े या मुंजनी ठुका (हि.पू.) का दखो। चकती । यह चरखे में इसलिये लगाई जाती है. जिसमें ढण्टन (स'को०) गट घुट । अन्वेषण, खोज सकला न पिसे। तलाश। द्विलढिला (हि. वि.) १ ढोलाढाल । २ पानोकी तरह टण्ठा ( म.स्त्रो०) एक राक्षमोका नाम । या हिरण्य- पतला। कशिपुको हिन थी । शिवजोसे बरपा कर यह पम्निमें ढिलाई (Eि'. स्त्री०) १ ढोला होने का भाव । २ शिथिलता भी नही जलतो थी। जब हिरण्यकशिपु प्रसादको मार पालस्य, सुस्ती । ३ ढोलनेको क्रिया। मे के अनेक उपाय करके हार गया तो उसने तुरहाको दिलाना (Eि कि० ) १ ढोलने का काम किसी दूसरेसे माथ पग्निमें बैठ जाने के लिये कहा। बोरामचन्द्रको कराना। २ ढीला करना। गमे इसका परिणाम उल्टा हो गया पक्षाय तोन दिड (हि.वि.) मदर, सस्त। न जले, ठण्डा जल कर भस्म हो गई। दिसरना ( क्रि०) १ प्रवृत्त होना, भुकना । २ फोका दण्टि (स.पु) तुट यतेऽसो टुण्ट रन्। गणेश ये पकना प्रारंभ होना। सब प्रकारको सिधिया प्रदान करते हैं। कायोखल्में ढोंढ (हिं. पु.) १ बड़ा पेट। २ गर्भ । लिखा है-- ठौंढम (हि.पु.) एक प्रकारको सरकारो। "अम्वेषणे दुण्डिरयं प्रधितोऽस्मिधातुः ढोट (हि. स्त्रो) रेखा, लकोर। सर्वार्थदुण्डिततया भव दुण्ढिनामा । ढोठ (हि. वि. ) जो बड़ोंके समान मकोच न रखता काशीप्रवेशमपि को लमतेऽत्र देही । हो. पृष्ठ, बेपदव, शोग्य । २ भयरहित, जिमको डर तोषं विना तव विनायक दुण्डिराज ॥" (काशीब.) न हो। ३ माहसी, हिम्मतवर । . . टुण्टि. यह धातु जगत्में अन्वेषणार्थकरुपमै हो ढोढ यो (चिं. पु.) ढीला देखो। प्रचलित है मारे। विषय तुम्हारे पन्बोषित या ठ प ढोमा ( हि पु० ) पत्थर श्रादिका टुकड़ा, ठेला, ढोका। है, इमोसे तुम्हारा नाम टु रिड है। तुम्हारे मन्तोषक ढोल (हि. स्त्रो०) शिथिलता, सम्तो, मामुस्तैद। बिना कोई मनुष्य कायोमें प्रवेश नहीं कर सकता है, तुम २ बन्धन को ढोला करने का भाव । मुझसे कुछ दक्षिण टुण्डिराजरूप में विराजमान रह कर ढोलना (हिं० कि० ) १ तना न रखना, ढीला करना। मतों को अन्वेषण कर उन्हें समस्त अभिलषित पदार्थ २ बन्धनसे छुटकारा देना, छोड़ देना। प्रदान करते हो, इसी लिये हो तुम्हारा नाम दुल्हि ढोला (हि. वि०) १ जो तना न हो। जो दृढतासे पड़ा है। जो मनुष विविध प्रकारसे गन्धमास्यादि हारा वधा न हो। ३ जो खुजकड़ कर पकड़े हुए महो। ढुण्डिराजकी पूजा करता है, वह शिवजीका पनुपरहो जिममें जलका भाग अधिक हो गया हो, पनोला, बहत कर काशी में प्रवस्थान करता है। प्रतिचतुर्थी जो उस- गोला । ५ जो अपने स'कल्पमें शिथिल हो। शान्त, की पूजा करता है, वह भो इस संसारका पभोर प्रास भरमा मन्द । ७ शिथिल, मन्द, सुम्त । ८ पालमी, सुस्त, करता है। महरानपुसक। माघमामको प्रसाचतोंमें नाव्रत करके जो मनुष ढोलापन (हि. पु. ) शिथिलता, ढोला होने का भाव। दुण्ठिगणेशको पूजा करत, सततिलके मड बना कर टोहरपु०) उँचा टोला। भोग लगाते तथा जो तिनसे होम करते हैं, वे मब प्रकार दवामा ( क्रि०) पन्वेषण कराना, तलाश कगना। को बाधाओंसे रहित हो कर यष्ट सिद्धिलाभ करते है। उही किसी०) बाहु, बाला . . . . (काशीख ) काशी देखो। Vol. Ix. 39