पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१६२

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१५८ ढीलपुर फलभागी होगी। अंगरेजोको सहायतासे महाराण'का' म राज्यमे १८३ पवाराही, ८४ पदाति पौर २२ तो है राज्य बहुत बढ़ गया था। किन्त महागणाने अपनी ढोलपुर राज्य में सफेद पोर लाल रंग रसोले पत्थर- प्रतिज्ञा पूरी न को। इमा अपराधसे अगरेज गवमटने में स्तम्भ गुम्बज, वक्र पौर अन्यान्य प्राकारके झरोखे उनके माथ मित्रता कोड़ दो और सुअवसर पा कर । प्रस्तुत होते हैं। जो देखने में बहुत अच्छी लगते हैं। सिन्धिया ग्वालियर और गोहद अधिकार तथा माराणा- शिल्पकार्य के तारतम्यक अनुमार इसके मूल्यका कास को बन्दी किया। १८०३ ई में मिन्धियाके प्रतिनिधि, हुआ करता है। ढोलपुरमें पीतल का एक प्रकारका शामनकर्ता अम्बजो इङ्गलियान गोहद, ग्वालियर पोर चित्रित और पलक्षात हुक्का बनता है, जिसे उस प्रान्तमें अन्यान्य कई एक स्थान बृटिशगवमेंटको प्रदान कालो कहते हैं। इस राज्यके काठक बने हुए खिलोना किये। १८०४ ईमें वृटिश गवमटने महाराणा लकि ! और दूसरे दूसरे ट्रय भी अत्यन्त सुन्दर होते है। यहाँ न्दर के पुत्र किरातसिंहको गोहद और उसके अधीन | का पालिश करनेका ट्रय विशेष प्रमिड है। देश लोटा दिये । किन्तु थोडे ममय के बाद दृष्टिग गव ___इसके दक्षिण-पश्चिमके जंगलो में शेर. चोता, भाल, मटन महाराणा किरातमिहसे गोहद प्रदेश ले कर मभर. लकडबन्ध्या, हरिण, नीलगाय और जंगली सपर सिन्धियाको दे दिया। महाराणाको क्षति पूत्ति के लिये आदि जानवर दिखलाई देते हैं । यहाँसे रेतीला पत्थर, बटिश गवमेंटने उन्हें ढोलपुर, बर और रजकोर परगने | गई, और घोको रपतनी होती है । कपड़ा, नमक, चीनी अपंगा किये। इस प्रकार किरातसिह ढोलपुरके महा- चावल और तमाकू बाहरसे आनो हैं। दम राज्यको राणा हुए। १८३६ ई में किरातमिहको मृत्यु होने पर वार्षिक आय ७६००००, रु. है। उनक पुत्र भगवन्त सिने महाराणाको उपाधि पाई।। २ राजपूतानके अन्तर्गत ढोलपुर राजाको राजधानी इन्होने मिपाको विद्रोह के समय टिश गवमटको यथेष्ट भोर शहर। यह प्रक्षा. २६४२ ७० और देशा० महायता को थी । पुरस्कार स्वरूप इन्हें टिशगवमटमे | ७७५३ पूमें पड़ता है। यह पागरेमे बधई तक के. सी० एस० आई० को उपाधि ओर १८६८ ई० में | ग्राण्डट्राङ्गरोड पर आगरेमे ३४ मोल दक्षिण तथा जो० सी० एम० पाईको उपाधि मिलो यो । पटियाले ग्वालियरसे ४. मोन उत्तर-पश्चिममें अवस्थित हैं। महाराजको बहनके माथ इनका विवाह हुआ था। नहाल लोकसंख्या प्रायः १८७१० है। ढोलपुरमे ३ मील दक्षिणा सिह नामक इनके एक पुत्र थे। १८७३ ई०में महा | राजघाटके निकट चम गवती नदोके ऊपर एक नौसेतु है, गणा भगवन्तमिहकी मृत्य के बाद नेहामिह पिटपद | जो १ नवम्बरसे १५ जन तक रहता है। वर्ष के अन्त में पर अभिषिक्त हुए। ये पागरमे प्रिन्स प्राफ वेल्सको अभ्य- उतारेको नाव हारा नदीमें पाते जाते हैं। प्रागरेमे धन-सभा तथा दिल्लीदरबारमें उपस्थित थे। १८०१ ई में | ग्वालियर पर्यन्त मिबिया स्टेट-रेनवे ढोलपुर हो कर उनको मृत्य हुई। बाद उनके लड़के रामसिंह राज्या | गयी है। यह रेलपथ ढोलपरसे ५ मोल टर सेत हो कर धिकारो हए । इनका जन्म १८८३ ई में हुआ था। इनके चम खतो नदो पार होता है। मरने पर उदयभानसिंहने राजसिंहासन सुशोभित कहते हैं, कि राजा ढोलनदेवने वर्तमान नगरके किया : फिरसाल यही वहकि महाराणा है। इनका पूरा दक्षिणमें प्राचीन ढोलपुर नगर बसाया था। सम्राट, नाम है- बाबरने १५२६ ईमें इसे अपने पधिकारमें किया था। ___ एच एच रेस--उद-दौला सिपाहदार उल मुल्क | उनके पुत्र हुमायू चम खतो मदीके गर्म पायी होने की महाराजाधिराज बोमवाई महाराजराणा सर उदय आमासे नगरको नदो तोरसे सठा कर पोर भी उत्तर भामसर सौकिन्द्र, घ दुर. दिल्लरजा जयदेव, के, में ले गये। मम्राट अकबरने यहां एक जचो पौर सुर सो, एस, पाई। क्षित सगय निर्माण को है। नगरका मूतन अश तथा ढोसपुरके महाराणाको १५ तोपोको सलामो है।' राजप्रासाद राणा किरातमि से बनाया गया है। कार्तिक