पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१६४

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ग.-इत्तविधान "द्विभुजा वरदां रम्या भक्ताभीष्ठप्रदायिनी । शेष हो जाता है उन्हें प्रोषधि कहते है। पोषधिवाचक राजीवलोचनां नित्यो धर्मकामार्थमोड । शब्दमें यदि दो या तोन वर न हो तो नियम लागू एवं ध्यात्वा ब्रह्मरूपां तम्मन्नं दशधा जपेत् ॥" (वर्णोद्धारत.) नहीं है। ये दिभुजा, वरदायिनी, पद्मलोचना, धर्म अर्थ काम पर शु. प्रक्ष, पाम, और खदिर (खर) इन मोक्षदायिनो हैं। ये सर्वदा मतको अभीष्ट प्रदान गब्दोके परस्थित धन शब्द का न सदा मूख्य करतो हैं। (त००टी.) होता है। या ( म० पु. ) -ख-ड पृषो. साधुः। १ विन्दुदेव, ___प्र, निा, अन्तर, अग्र इन शब्दों के परखिम बन एक बुद्धका नाम। २ भूषण, गहना। ३ निर्णय। शब्दका न नित्य मूर्षण्य होता है। अन्य पदस्थित र ४ शिवका एक नाम । ५ पानीका घर। ६ दान। प्रभृति परवर्ती पान शब्दका न विकल्प मे मूर्वण्य होता ७ विगाल में एक गणका नाम । ८ ज्ञान । ( एकाक्षरको०) (म.वि.) गुगारहित गुणान्य । प्र, पूर्व, अपर प्रभृति शदीके परवर्ती पहन शब्दका णकार (म पु०) ण-स्वरूपे कारप्रत्ययः । ण स्वरूप न नित्य मूर्खण्य होता है। . वर्ग, णकार। ___पर, पार. उत्ता, चन्द्र और नारा शब्दोंक परवर्ती पगण-दो मात्राओंका एक मात्रिक गण। अयन शब्द का न नित्य मूईण्य होता है । पत्वविधान ( स० क्लो. ) गत्वस्य विधान, ६ तत्। णस्व अग्र और ग्राम शब्दोंके परवर्ती नो शब्दका न मूर्खण्य विषयकविधान। पाणिनिमें इसका विधान इस प्रकार होता है। लिखा- शूर्प के परस्थित मखका न तथा प्र, द्र, खर और ऋ . र औरष इन चार वर्षों के बाद दन्ता न रहे वानी शब्द के परस्थित नसका न मूण्य होता है । तो वह मून्य होता है। यदि स्वरवर्ण, कवर्ग, गिरि, नदी, स्वर्ण दी, गिरिनितम्ब, गिरिमख, गिरिन, पवर्ग, य, व, ह और अनुसार व्यवधान रहे तो भी चक्रानदी, चक्रनितम्ब, तुर्य मान, माधोग, पाग यन इन दन्ता न मून्य होता है। ममस्त शब्दोंके न विकल्पसे मूर्षण्य होता है। पदका पन्तस्थित दन्ता न मूईन्य नहीं होता है तथा प्र, पग, परि और मिर, इन चार उपसर्गों तथा न भिवतवर्ग युक्त (त, थ, द, ध) एवंप और भ युक्त अन्तर शब्द के बाद यदि नद, नम्, नथ, नह, नो, नु, दन्ता न मूर्पण्य नहीं होता है। मुद्, अन् और हन् ये सब धातु रहें, तो उनका मूखण्य यदि एक पदमें ऋ, ऋ, और ष रहे पोर दूसरे पदमें होता है। रना न रहे तो न मूखन्य नहीं होता है। यदि हन् धातुका म म पोर व युक्त हो तो विकल्पमे यदि अन्य पदस्थित दन्ता न विभक्ति स्थान पर हो मूईय होता है। अथवा विभक्ति युक्त हो या स्त्रीलिङ्गविहित ई प्रत्ययके इन धातुकोह के स्थानमें घ हो तो न मूर्षण्य नहीं साथ मिला हो, तो विकल्पसे मूद्धन्य होता है। परन्तु होता है। यवन, भगिनो, कामिनो, भामिमो, यामिनी, यूनो प्रभः प्र, परा, परि पोर निर ये चार उपसर्ग और पन्तर सिका दन्ता न मूईन्य नहीं होता है। शब्दके बाद निम, निक्ष, पौर निन्द, इन धातुषों के • पोषधिवाचक और वृक्षवाचक शब्दके परस्थित वन विकल्पमें मून्य होता है। शब्दका न विकल्पसे मुख्य होता है परन्तु, सिरिकार प्रभृतिके बाद हिनु पोर मीनका न निस्व मूरस्थ परिवा, रिद्रा, तिमिरा, विदारी और कर्मार इन शब्दों होता है। के बाद वन शब्द रहमेसे मूह न्य नही होता है। ' प्रप्रभृतिक बाद लोट की पानि विभक्तिवान सदा . . धानके पक जाने पर जिन समस्त विदीका जीवन मूखिता।