पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१६५

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मप्रतिके बाद गद, पड दा, धा, हन्. नद, पद, जोड़ कर १०८ बार अपने वित्र बाधाएँ दूर दान्, दो, मो, दे धे, मा, या, द्रा, सा, वप, वह, यम, चि. होतो। साधरणतः पदय में भूत, प्रेत पादिका पोर, दिर, इन ममस्त धातुओंके पूर्ववर्ती नि उपसर्ग- भय चार होने पर रस महामन्चका नो बार जप किया कान नित्य मुहण्य होता है। जाता है। अनेक जनप्रन्यों में इसके माहात्म्यका वर्णन धातुके पहले यदि प्र, परा, परि पौर निर ये चार लिखा है। यह मंत्र वेदोल गायबो मन्त्र के तुल्य पूज्य उपसर्ग पयवा अन्तर शब्द रहे तो कत् प्रत्यय का न सके प्रत्येक पचरसे सेकड़ो मनोको उत्पत्ति हुई, विकल्पसे मूईण्य होता है। जिनका वर्णन "वमोकारकल्प" नामक अन्यमें किया जिन. धातुओं के प्रारम्भमें तो व्यञ्जन वर्ण हो और गया है। "पुण्याचव" नामक नगन्यमें मके माहा- अन्तिमवर्ण से पहिने पा से भिव स्वर वर्ण हो, तो त्म्यको पाठ कथाएं लिखीं। उनमें एक काथा यहां उनसे आये हुए प्रत्ययका नकार विकल्पमे मूर्धन्य सक्षेपसे लिखी जातो -"किसी समय......... . 'ण' हो जाता है। वर्ती छा खगहोंको जोत कर सातवें खण्डको जय करने. खन्त धातुके उत्तर विहित कत् प्रत्ययका न विकल्य- से मूईण्य होता है। के लिए समुद्र पार हो रहे थे। मार्ग में उनको पूर्व- ___भा, भू, पू, कम, गम, प्याय, वेप भोर कम्म इन भवके शव एक देवसे साक्षात् हो गया। देवके पानामय समस्त धातुपोंको ण्यन्त करने से उनके उत्तर विहित करते हो उन्होंने णमोकार मन्त्र जपना प्रारम्भ कर दिया, कत्में न मूईण्य नहीं होता है। जिमसे देव उनको स्पर्ष तक न कर सका। कुछ देर कृत् प्रत्ययका न व्यञ्जन वर्ण में मिला रहनेमे मूर्धन्य बाद उनके चुप होने पर देवने धमको दी कि, “यदि 'ण' नहीं होता है। तू मन्त्रको लिख कर मेंट दे तो हम तुझे छोड़ देंगे, नश धाका श मूईण्य होने पर ण मूईण्य होता है। अन्यथा समुद्र में बिना डुबोये नहीं छोड़ेंगे।" अनेक क्षुम्नादिका न मूईण्य नहीं होता है। बादामुवादके पश्चात् चक्रवर्ती अपनी बचासे विचलित णमोकारमन्त्र (म. पु०) जैनौका महामन्त्रविशेष । हो गये और उन्होंने उक्त मन्त्रको लिख कर मैट दिया। जनाका प्रधान मन्त्र। इसमें पाँच पद, और अट्ठावन देवको अभिलाषा पूर्ण हुई, उममें चक्रवर्तीको समुद्र मात्रा पैंतोम अक्षर हैं. यथा-'गमो अरहताण ड.बो दिया। मामो सिहाण णमो आइगेयाण गामो उवमायाण एय ( स० पु. ) ब्रह्मलोकखित एक सरोवर। गामी लोए सव्वसाहूण।" म मन्त्र के पादिमें ॐ "पश्चाणवो ब्रह्मलोके तृतीयस्यां ।" (जान्दोग्य ३०) Vol. Ix.41