पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१७५

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शिला योकका वर्णन पढ़नेसे मालूम पड़ता है, कि सक्ष, गौरव चौर धनमालितामा पूर्ण परिचय दे रहे है। शिला मगरके चारों पोर पीक शहरोंकी नाई प्राचोर तक्षशिलाका भग्नावशेष कर एक पंगामें विभक्त है, और शहरमें बहुतसी गलियो थौं। कार्टि यमने नगरके जो अभी भिव भिक नामोसे पुकारे जाते है। ये दक्षिण- एक सूर्य का मन्दिर, एक उद्यान और एक मनोहर सरी- सिमसे उत्तर-पूर्व में विस्त त है। दक्षिणको पोर इनके वरका उल्लेख किया है। उम ममय नगरके बाहरमें भी नाम (१) वीर (२) हतियाल (३) शिर-कप-का- एक बड़े बड़े स्तम्भोंसे घिरा हुआ मन्दिर था। प्रोकके कोट ( 8 ) काछ कोट (५) बाबरवाना चौर (६) बाद बहुत काल तक तक्षशिलाका विवरण नहीं मिलता शिर-सुख मा-कोट है। इस मगरके स्त प, मठ इत्यादि है। ४थो शताब्दोमें फाहियान इस राज्यमें पाये थे। अत्यन्त पाश्चर्य जनक । पञ्जाबके पम्पान्य स्थानोंकी उन्होंने तक्षशिलाको चौ-श-शि-लो कहा है। बुडदेवने अपेक्षा रस प्रदेश में प्राचीन मुद्रा और पुराकोसि बहत इस स्थान पर अपना मस्तक किसो मनुष्यको दान दिया पायी जाती है। बच्छकोटके समानलका निकटवतों था। इसी कारण चोन चमणकारीनं रम नगरका उक्त स्थान बहुत उपग है। ट्रावो और जिनो दोनों कहते है, नाम रखा था। भारतीय बोडगण तक्षशिलाको तक्षशिर कि चारों घोर विस्त त पर्वतके उपत्यका प्रदेश पर तक्ष- करते हैं । ६३० ईमें युएन-चयाङ्ग यहों आये थे। म शिला पवस्थित है। शाहधेरो नगरको पस्थिति और ममय राजवशविलभ तथा तक्षशिला काश्मोरके प्रधान इसके भग्नावशेषके साथ प्राचीन तक्षशिलाको अवस्थिति हो गया था। बोहमठको संख्या कम नहीं थो; किन्तु और उसको अहानिकापोंका सामञ्जस्य देखनमें पाता थोड़े हो महायान मतावलम्बी उनमें वास करते थे। है। यहाँ जो शिलालेख पाया गया है, उमके पढ़नेमे भो इस नगरकी अवस्थिति के विषयमें बहुत मदभेद है। यही प्रतीत होता है कि यही स्थान तक्षशिलाके नाममे लिनी कहते है कि प्राचीन तक्षशिला हस्तिना नगरसे प्रमिड था। गेहग्रन्थमें लिखा है, कि बुडदेवमे तक्षशिला. ५५ मोल दूरमें है। प्लिनीके वर्णनानुसार यह नगर के अनेक पात्मोत्सर्ग के कार्य किये थे, जिनका निदर्शन सिन्धु नदसे दो दिनकं गस्ते पर हार नदोके किनारे भी इस मगरमें पाया जाता है। इन्हीं सब कारणोंसे शाह अवस्थित है। किन्तु चीनपरिव्राजकोंके चमग-वृत्तान्तमे धरो नगर हो प्राचीन तक्षशिला है, ऐसा अनुमान किया मालूम पड़ता है कि सिन्धु नदसे पूर्व दिशाको पोर जाता है ! सोन दिन तक पटल चलने पर इस नगरमें पहुँचते हैं। यह पन्नाव विभागके रावलपिही जिलेके अक्षा ३५ चीनको लिपिके अनुमार कल कमरे के निकटस्थ किसा १०० और देशा० ७२४० पू०में अवस्थित है। स्थानमें तक्षशिला नगर था, ऐसा अनुमान किया जा यह नगर अत्यन्त प्राचीन है। रामायणमें भोरमका सकता है। जेनरल कनिहम कहते हैं कि शाहधे। उल्लेख है। यह नगर गन्धर्वो की राजधानी था। भरतने प्राचीन तक्षशिला है। मभो प्राचीन लेखकोंन यह राज्य जय किया था । केकयभूपति बुधाजितने इस तक्षशिलाको धनाढ्य शहर बतलाया है। रायको जीतने के लिए जब रामचन्द्रजीसे अनुरोध तक्षशिलाको प्रजा अब ममध-राज विन्दुसारके विरुद्ध किया, तब भरत गन्धर्व देश अधिकार करने के लिये भेजे विद्रोही हुई थी, तब विन्दुसारके आदेशानुसार मुसिमन गये । भरतने राज्यको अय कर अपने पुत्र सक्षको वहां था कर यह नमर पवरोध किया था। किन्तु उनके खापन किया । रामायणमें तक्षशिलाको मिन्धुमदके पडतकार्य होने पर प्रयोकके जपर इस कार्य का भार उत्तर पवखित बतलाया है। सौंपा गया। अशोकके पाने पर तक्षशिलावासोन उनको तशिलादि ( स० पु. ) तक्षशिला पादियं स्य, बहुव्री। अधीनता स्वीकार की। महाराज प्रयोकके शासनकालमें पाणिनिका गण । सोऽस्याभिजनः म अर्थ में सक्षशिलाक तक्षशिलाको आय ३६ करोड़ रुपये की थी। शाहधरी उत्तर प्रथमान्त और षष्यनसके उत्तर यथाकमसे अण, मगरका भग्नावशेष पोर स्त पादिपभो भी इसके पूर्व और धन होता है, तक्षमिला, बत्स्योरण, दुर,