पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१९०

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१८६ सहि-तबरपरीक्षा सहि (म० ए०) सड़-पापात तर-इन् । १ आघात, चोट। सण्डि ( स० पु.) मत्वयुगके एक ऋषिका नाम । इनोंने (वि० । २ पाघातकर्ता चोट पहुँचानेवाला। दश हजार वर्ष शिवजोको पाराधना को। बाद शिवजोने तसित (मम्सो०) साध्ययभ्रत-पाचात इति प्रत्ययः। इनकी तपस्यासे मतुष्ट हो इन्हें दर्शन देकर कहा था नारे णिलुकन्न । ३॥ १। ..। विद्य त् बिजली। "मैं तुमसे बहुत प्रसव हुआ, तुम्हें मेरे प्रसादसे एक वियत देखा। पुत्ररत्न को प्रालि होगी । वह पुत्र यगखो, तेजस्वी, दिव्य नाटिका (म.प. गों के एक देवता । ये भवनति जानसमन्वित, अमर और वेदका सूत्र कत्ती होगा।" देवाणममे हैं। शिवजीके वरगे तगिड़ के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। सण्डिके सहित्पति ( म०पु.) मेघ, बादग्न । पुत्रने को यजुर्वेदीय तागिड़न शारवाका कल्पमूत्र प्रापयन नहित्प्रभा (म. स्त्रो०) ललित: प्रभव प्रभा यस्याः किया था । ( भारत अनु० १६१७ अ०) बहुव्री०। १ कुमागनुचर मामद, कात्तिकयको एक तगड़, (म पु० ) महादेवजो के हारपाल, नन्दिकेश्वर । 'नन्दी भृगग्टिस्तण्ड नन्दितौ नन्दिकेश्वर:।' (मलिनाथधृत को०) माहकाका नाम। मनोन टिनामा कोशनाप तडित्प्रभा।" तण्ड रोग (म. पु. ) तगड़ा अत्तार्थे उरच तत्र भवः (भारत शल्य ४ : अ०) छः। १ कोटमात्र, कोड़ा मकोड़ा। (लो०) तण्डुले (वि० । २ विद्य त्महश. दोषियता, जिममें बिजलोमो ___भव: छ: लस्य रः। २ तगड लोटक, चावलका पानी । (त्रि ) ३ वर्वर, अमभ्य, जङ्गलो । चमक हो। तण्ड ल (सपु०-को०) तगडाते आहन्यते न उलच । साड़ित्वत् (म. पु० ) सरित, विद्यतेऽम्य मतुप मस्य वः, ___ सानसिवर्णसीति । उण ४।१०। १ निस्तष धान, चावल । पपदासस्वात् तस्य न दः। १ मेघ, बादल । २ मुस्तक, चावल देखा । २ वोड़ा, बायविडङ्ग । ३ तगड लोयशाक, मागरमोथा। वि०) ३ डिविशिष्ट, विद्य त्युक्त। चौलाईका माग। ४ प्राचीन कालको होरेको एक तडित्वतो (म त्रि. ) तारित्ववत् स्त्रियां डोप । सद्धि- तौल जो ८ सरसोंके बराबर होती है। द्यक, जिसमें विजम्नीमो चमक हो। तगड ल-जल (म.पु. ) तण्डुलोदक, चावलका पानो। नडिभ ( म०ए०) सड़ितो गर्भ यम्य. बहुव्री०। मंत्र यह वैद्यकमें वहत हितकर बतलाया गया है। इसके बादल। प्रस्तुत करनेको दो प्रणाली हैं--(१) चावान को कूट कर तडिन्मय ( म० वि० ) सहिदात्मक स्वरूप तहित् मय । अठगुने जलमें पका कर छान लिया जाता है, यह उत्तर तडित स्वरूप, बिजलोके महश। तगड़ ल-जन्न है। (२) चाबल को थोड़ी देर तक भिगो कर तड़िया (हि. स्त्रो० ) समुद्र के तटको वायु । छान लिया जाता है, यह माधारण तगड लजन्न है। नडी (स्त्रिी०)। चन, धोल । २ धोखा, छन्न । लण्ड लपरीक्षा ( म स्त्रो० ) तगड लेन परीक्षा. ३.सत्। ३ वहाना, होला। दिव्यविशेष, नौ प्रकारके दियोमसे एक । वोरमित्रोदय में तगड ( म पु० ) तडि अन् । १ ऋषिविशेष, एक ऋषिका : लिखा है कि किमी चोजको चोरी होने पर विचारक नाम। वी. ) भावे । २ पारति, चोट, मार। इस दिव्यका प्रयोग करें। इसका विधान-चावलको तृण्डक मं० १०) तगड़ते नृत्यते तगड-गवन । १ खनन : प्रच्छी तरह धो कर उसे देवता के मानके जलमें एक पक्षा । : फैन। ३ ममामबहुलवाक्य. वह वाक्य नवीन महोके पात्रमें भिगो कर एक रात तक रख देना जिममें बहतमे ममाम हो। ( लो० ) ४ राहदारुविशेष. . चाहिये। दूसरे दिन विचारक शचि हो कर नियमपूर्वक गृहम्तम्भ, धरमें लगाये जानका खम्भा। ५ तरुस्कन्ध, पासन पर बैठे। बाद जिसके अपर मन्द हो उसे खान पेड़का तना। ई परिष्कार, शनि, सफाई। ७ का कर पूर्व की पोर बैठावे। तब एक भोजपत्रके जपर बापो, बहुरूपिया। ८ रोग। (वि०) ८ मायाबहुल, । अथवा उसके प्रभावमें पोपसके पत्ते के जपर निबलिखित मायावी । १. अपघातक, नाश करनेवाला ।' मन लिख डालें।