पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१९६

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१९२ मधुर रमको उत्पत्ति और मतमै मिर्फ पीतवर्ण से विषयों ११ पूर्व फाल्गुनो, २५ पूर्व भाद्रपद, १५ स्वाति । को चिन्ता होगो। किमी प्रकरण के करने पर पोत- वायुतत्त्वका लक्षण-इसमें खास तोय कगामी अर्थात वर्णका दर्शन होगा। उत्तम टपगम निःश्वास त्यागनः नामापुटमें तिरको तरहमे किनारोंमें लग कर चलता है। मे चतष्कोण और पासवर्ण दिग्वलाई देगा। जान इम वायु का परिमाण ८ अ,ल है। उस समय गले में देश में इसका स्थिति ढाई दण्ड ममय के भीतर ५० पल अल्प रमको उत्पत्ति होतो है; दयंगम खाम निक्षेप कर ममय तक रम अवस्थामें स्थित रहेगा। इस प्रकारका नसे वर गोलालति और श्यामवण किम्वा नीलवर्ण काय दोन पर उमको पृथ्वोतत्त्व ममझ। रविग्रहके टोखता है। नाभिमूलमें इमको स्थिति है। दक्षिण याकर्षणमे वाम नामिकामें पृथ्वोतत्वका उदय होता है नामिका-बहन के ममय राह ग्रह और वामनासिका वहन. तथा दक्षिगा नामिकाके बहनकालमें जब पृथ्वीतत्त्वका के समय वृहस्पति अधिपति होता है। इस तस्वमें ये उदय होता है, तब बुधग्रड उमका अधिपति होता है। नक्षत्र होते हैं-१६ विशाखा, १२ उत्तर फल्गुनो १३ पृथ्वीतत्त्व के मक्षव-२३ धनिष्ठा, २७ रेवतो. १८ ज्येष्ठा, हस्ता, १४ चित्रा, ७ पुनर्वसु. १ अखिनो, ५ मृगशिरा । ११ अनुराधा, २२ यवगा, अभिजित्. २१ उत्तराषाढ़ा। आकाशतत्त्वका लक्षण-इसमें नामापुटके मर्व स्थान जलतत्त्व का लक्षण - इमको गति अधगामी अर्यात में वायु निकलती है। मगामो होने से इसके परिमाया नामिकापुटके निम्रभागमें छट कर वाम चलेगा। स्वाभ- का निर्णय नहीं किया जा सकता। गले में कट रस का परिमाण १६ अङ्गल होगा। उस समय गले में कषाय का उद्भव होता है। दर्पण पर नि:श्वास छोड़नेसे वह रमका अनुभव होता है, पंण पर नि:श्वास त्यागनमे विन्दु विन्दु नाना वाँका दोखता है तथा मिश्रितवर्ण वह भई चक्राक्त और मफेट दोग्वेगा। हृदयम वन माल म पड़ता है। इसको स्थिति ढाई दगडकालके वर्ण उदित होगा। किमो प्रकरण के होने पर खेतवर्ग भोतर १० पल मात्रको है। यह तत्त्व मव कार्य में निष्फल दृष्टिगोचर होगा। पादान्त में इसकी स्थिति भी ढाई है। इसलिये इस तत्त्व के बहनकालमें कोई भी कार्य दगड के मध्य ४० पम्न ममय होगी। इन कार्या को जनः न करना चाहिये, करनेमे वह काम मिड नहीं होता। सत्वका लक्षण समझना चाहिये। सिग-नामिका पृथ्वोतत्त्व के अधिष्ठात्री देवता ब्रह्मा, जलसत्त्व बहनकालमें शनिग्रह ओर वाम नामिकाक पहनकानम विष्णा, अग्नितत्वके रुद्र, वायतत्वके ईश्वर और प्राकाश. चन्द्र शम तत्वका अधिपति होता है। रमतत्वके नक्षत्रां तत्त्वक मदाशिव है। के नाम-२० पूर्वाषाढा, ८ अश्लेषा, १८ मूला. पृथ्वी अथवा जलतत्त्व समय प्रश्न होनेसे कम का ६ श्रा, ४ गेडिगो, २६ उत्तरभाद्रपद, २४ शतभिषा शुभ फल होता है। वह्नितत्वके ममय प्रश्न होने पर अग्नितत्त्वका लक्षण -इमको गति अध्र्व गामो अर्थात् शुभाशुभ मिश्रफल होता है। वायु वा पाकाशतत्त्वक नामिकापुटक उपरिभागमें लग कर वाम चलता है। समय प्रश्न होने पर हानि और मृत्य कर फल होता है। प्रखामका परिभाग ४ अङ्गल है। गले में तिक्त रमका अग्नितत्व के उदयकालमें मारणादि कार्य करमा उजव होता है। दपंगा पर नि:ग्वाम त्यागनेमे वह चाहिये। जल तत्व-वनकालमें शान्तिकार्य, वायुतत्व में त्रिकोणाकार और लान दोखेगा। ढाई दण्ड के मध्य ३० उच्चाटन, पृथ्वोतन्त्वमें स्तम्भनादि कार्य और प्राकाशतत्त्व- पल तक उमो प्रकारसे स्थिति रहेगो तथा मनमें रक्तवर्ग के समय कोई भी कार्य न करना चाहिये । पृथ्वोतत्त्व के का उदय होगा और प्रकरण करनसे रक्तवर्ण दिखलाई समय स्थिरकार्य और जलतत्त्व के समय चर कार्य करें। देगा। स्कन्धदेशमै रमको स्थिति है। दक्षिण-मामिका जलसत्त्व पश्चिम, दिशाका अधिपति है, पृथ्योतत्व पूर्व- बहनकालमें मनग्न ग्रह पोर वाम नामिका बहनकालम दिशाका, अम्मितत्त्व दक्षिणदिशाका, वायुतत्व उत्तरदिशा- एक ग्रह इसका अधिपति होता है। रम सत्त्व के नक्षत्रों का और पाकाशतत्त्व जई, प्रध: और मध्यसलका तथा के नाम-२ भरणी, ३ लतिका, ८ पुष्पा, १० मघा, अम्लि, व्यान, वायु, नैऋत दियाका अधिषति है।