पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१९७

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बुध चन्द्र वातान पञ्चनरवका उदय और पवम्यान जानका उपाय- २ दर्शनशासकानामा, दशम जानवाना, दार्थ निका। ६ घंटेसे ७ घंटा तक वाम नापिकामें वायु चलेगो, उम तत्त्वज्ञान सं०लो) तस्वस्ख बनवख पान. (तत्। समय पृथ्वोतत्त्वका उदय हो कर ५० पन्त (२० मिनट) ब्रह्मधाम, पासवान यायिकों के मसले प्रमाण, प्रमेय, तक उसको स्थिति होगी। इसके बाद जलतत्वका उदय मशय. प्रयोजन, दृष्टान्त, अवयव, ता, निर्णय, वाद, पौर ४० पल (१६ मिनट ) तक उमकी स्थिति होगो, जल्प, वितण्डा, स्वाभाम. छस. जाति, निधास्थान, रन फिर पग्नितत्वका उदय ओर ३० पल (१२ मिनट . पोड़श पदार्थ के घामको तत्वज्ञान कहते हैं । (गौतमसू. १) स्थिति, वायतत्व का उदय चौर २० पल ( ८ मिनट ) इनका स्वरूप जान लेनेमे जोव पपवर्ग लाभ कर सकता स्थिति, पाकाशनत्वका उदय और १० पल ( 8 मिनट) है। जब तक इन षोड़श पदार्थोशा नरवधान नहीं होगा समको स्थिति होगी। सपनामापुट में वायको स्थिति- तब तक अपवर्ग महौं हो सकता। गाव देखो। कान, सरत्वका उन्य और स्थितिका उदाहरण- मांस्य पौर पासलके मतसे प्रति पोर पुरुषका घंटा मिनट तत्त्व भेदज्ञान ही सत्त्वज्ञान है। पुरुष जब निरन्तर दुख में २. पृथ्वी बृहस्पति अभिभूत हो कर प्रतिके तत्त्वानुसन्धान महत्त जल शुक्र होगा, तब वह पपनको प्रम प्रकारके ज्ञानसे पृथक करने- अग्नि नेको चेष्टा करेगा कि-'सुख' दुःख पोर मोहमयो प्रति. वाय को मायामें अभिभूत नहीं होना चाहिये, मैं पुरुष आकाश निगुण, निलेप, सच्चिदानन्दमय, प्रशतिने मुझ पत्र दक्षिण नामपुटमें वायके स्थिति कालमें सन्त्वका.उदय- तक विमोहित कर रक्या था, अब सावधान होना उचित घंटा तत्व ग्रह है।" प्रकृति और पुरुषके एम प्रकारके मैदानका नाम पृथ्वो तत्त्वज्ञान है। प्रत्येक पुरुष (जोवारमा ) को वाभो न जल शनि कभी एक बार तत्त्वज्ञान अवश्य हो होता है वा होगा। ४८ अग्नि जब तक यह तत्त्वज्ञान न होगा, तब तक प्रतिसे पुरुष वायु जुदा न हो सकेगा। प्रकृति पुरुषको यह धान उत्पब पाकाश . करा कर निवृत्त हो जाती है। सांख्य देखो। इस नियमके अनुणा किम मम किम तत्त्वका वेदान्तमससे अभिभूत हो कर वस्तु का स्वरूप नहीं उदय होगा, यह जाना जा सकता है। जान पाता। रज में मर्पको सरह सम परिदृश्यमान जैनमतानुमार-तत्त्व मान हैं,-१ जोव, २ अजीव, अगत् अवलोकन करता है। अगत्में जो कुछ दिखलाई ३ पासव, ४ बन्ध, ५ मवर, ६ निजग और ७ मोक्ष । देता है, मब ब्रह्म है, किन्तु पविद्याभिभूत जीव जगत्में इन मात तत्त्वां के मशय, विपरीत अनध्यवमायरहित प्रहको न देख कर घट, पर, मठ भादि देखा करता। यथार्थ जानसे मोक्षको प्राषि होतो है। जब तक विद्याका नाश होगा, तब तक जीवको विस्तृत विवरण के लिए जैनधःशब्द ( भाग ८. पृ॰ ४५३ ब्रह्मका स्वरूप किमो सरर भो मालूम.म होगा। ११) देखो। सत्त्वज्ञ सवि०) तम्त्वं जानाति तत्त्वज-क।१ तत्त्व. ..विद्यामा माग होते हो जगत् नहों दोखेगा, फिर जानी जिस ईखर विषयक जान उत्पन हा हो, वह जगत् ही को ब्रह्म देखने लगेगा। पहले जिसको बायजानो। इस जगत्में मभो वस्सए दुःखमय है, ऐसा । विचित्र समझता था, उसे हो फिर . बह बच समझने जान कर जिसमें तम्व ( ब्रह्म ) को समझ लिया है, लगेगा, "स्व' पह" तुम-मका भेद नरहेगा, सभी बहो तखन तत्वज्ञान प्राप्त करने के लिए समाधितो पर पदबाच हो जायगे । इस प्रकारको मागको तत्त्वज्ञान पावसवता है। जीवन्तक रखो।. कहत। Vol, IX.49 मिनट रवि