पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१९८

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'बीव समाचावार होत हो ब्रह्म हो जाता है, कारणलाका प्रभाव नहीं होता । जैन पनिका संयोग पानासारदुःखको अतिक्रम करता है, इत्यादिश्रुति- होने पर भो मषिमन्त्रादि प्रतिबन्धकके कारण दास-कार्य बाबोंके प्रमाणसे और तदनुकूल बुलियोंसे स्थिर होता प्रवास रहता है, उमो प्रकार श्रवणफख तत्त्वज्ञान मामा कि, तत्वज्ञान के मिया जीवके लिए दुःखातोस दोनेका प्रतिबन्धको हारा अवरुद्ध रहता है। प्रतिबन्धकका चय और कोई उपाय नहीं है। बाम हो मैं , त्याकार होते ही उसका उदय होता है। कपिल पादिका ऐसा पमन्दिग्ध अनुभवका नाम है तत्त्वज्ञान, रम तत्त्वज्ञान हो हुआ था। उनके पूर्व जन्म के ऋषणने इस जन्ममें प्रधान उपाय श्रवण,मनन पौर निदिध्यामन उसके महा। प्रतिबन्धक शून्य हो कर तत्त्वज्ञान उत्पन्न किया था. इस यकमन्त्र है। शास्त्रकथा सुननेसे हो श्रवण होता है लिये इस जन्ममें उनको श्रवण-मननादि नहीं करना पड़ा ऐसा नहों। गुरुकै मुखसे शास्त्रीय उपदेश सुनना. उदय- था। अतएव श्रवण ही तत्त्वज्ञानका प्रधान कारण है, में समका विधारित पर्थ धारण करना, साक्षात् अथवा मनन पौर निदिध्यासन उमके सहकारी है। तत्त्वमसि' परम्परासे ब्रह्म ही समम्तशास्त्रका तात्पर्य है, इम इस महावाक्य के श्रवण करनेमे, उसके अर्थ में जो अवि- विषय विखाम, न मबके एकत्र होने पर तब कहाँ खास और असम्भव बोध आदि जो कार्य होते हैं, वे काय वह श्रवण कहलाता है। इनके बिना श्रवण नहों सनन हारा निवारित होते हैं। मनन के बाद भी यदि होता। इसका एक लौकिक दृष्टान्त दिया जाता है। स्पष्ट रूप से 'मैं ब्रह्म है और कुछ नहीं, ऐमा अनुभव न कल्पना कीजिये, पापके घर में जा कर हमने पापके हो, तो निदिध्यासनकी जरूरत पड़ता है । निदिध्या पनसे नोकामे कहा, "एक ग्लास पानो लामो।" पान्तु वह सिद्धि प्राप्त कर लेनेसे हो यह अनुभव स्थिातर होता है, पाना नहीं लाया। पीछे हमने दुःखित हो कर पापसे अन्यथा करनेसे तत्त्वज्ञान नहीं होता । कहा "पापके नोकरने हमारो बात नहीं सुनी।" पब कोई कोई पाचार्य कहते है कि निदिव्यासन हो देखना चाहिये कि सचमनी क्या मौकरने हमारी तत्त्वज्ञानका मल कारगारे, श्रवण और मनन उसके बात नहीं सुनो या "एक ग्लास पानो ला" ये शब्द सहायक मात्र हैं। अपने ब्रह्मभावका अपरोक्ष ज्ञानमें उसके कानमें प्रविष्ट हो नहीं हुए अथवा प्रविष्ट हुए पारूढ़ होना ही तत्त्वज्ञान है। जैसे मरु-मरोचिकामें थे, उमने सुना था पर ध्यान महो दिया या उम अनु. जम्मको भ्रान्ति होतो है, उमी तरह ब्रह्ममें दृश्यको भ्रान्ति मार कार्य नहीं किया। होती है। इसलिए दृश्यप्रपञ्च मिथ्या और ब्रह्म हो सत्य पतएव जपरका सुनमा सुनना नहीं है। मैकड़ी है। पहले यह जान-अर्जन भो दृढ़ करना पड़ता है. मनुष्य वेदान्त अध्ययन करते है, 'सत्त्वमसि' वाक्य भो बादमें में की जान है और उसके अवलम्बन शरीर, मन सनते है और उसका अर्थ भी पादरपूर्वक ग्रहण करते पोर इन्द्रियां सभी भान्तिविशेषका विलाम है, इसलिये

  1. , फिर भी उनको सवधानका उदय नहीं होता। मैं की जान ओर ज्ञानका अवलम्बन ई, समस्त हो ब्रह्ममे

संमारंमें ऐसे भी बहुत मनुथार,जो बिना वेदान्त पध्य है, रज सपंकी भाँति यह मिथ्याज्ञान जब पवि. यन किये पोर तत्त्वममि' वाक्यको बिना सुने ही तत्त्व. चाल्य होता है, तब अपने आप "" अर्थात् “मैं" यह जान प्राप्त करते है। शासमें कहा गया कि, कपिल, भान इन्द्रिय और मन पादिको त्याग कर ब्रह्ममें जा वामदेव पादि जन्मने ही मत्वज्ञानी थे, अतएव श्रवण के मिलता है। पहंचानके बयावगाही होते हो तत्त्वज्ञान लिये तत्वज्ञान वा तत्वज्ञान वषका कार्य है, यह बात मा है, ऐसो अवधारणा करनी चाहिये। ऐमा सत्त्व को मानी जा सकती है। पाचार्य देव शहर करते धान होते ही मोक्षको प्रालि होती है। तत्त्वज्ञान हो ..सकी प्रत्युत्तरमें हमारा यह काना, किचित्तको बोबके सहारका एकमात्र उपाय है, ऐसा तत्त्वज्ञान होने पनिर्ममता और जम्मान्तरीय पाप पादि प्रतिबन्धकोसे पर उसको पामधाम यामधान कहा जा सकता है। अगरफरान पवना रहता है। उसमें उसको या तत्त्वज्ञान साविक, राजसिक पौर तामसिक मनो-'