पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२००

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तत्त्वप्रकाश-पात्र च नमः पराय उपस्थतस्वात्मने नम: लिंगे । वादी, जो स्पष्टरूपसे यथार्थ बान कहता हो। ९ नम: पराग आकाशतत्व त्मने नमः मान । तत्वमङ्गलम् -मन्द्राज प्रदेश के अन्तर्गत कोचिन गज्यके थं नमः पगय वायुतत्त्वात्मने नम: मुख। विस र जिलेका एक शहर । यह पक्षा. १०.४१ उ० नमः पराप जम्नयात्मने नमः। और देशा• ७६४२ पू०में प्रति है। यहाँ एक खममा परराय जलमने नमः लिंगे। मुन्मफी अदालत है। इसका क्षेत्रफल प्रायः ५६ वर्ग मोल के नमः पगय पृथिवीतल्वात्मने नमः दियोः। और लोकसंख्या प्रायः ६२२२ है। इल्याच्युनीकृततनुर्विदधीत तत्वान्याम मपूर्वकपारन- तत्त्वरश्मि ( स० पु.) तन्त्रके अनुसार स्त्रो देवताका त्यपेतं । भूमपराय च तदायमात्मने । २त्यन्तमुद्धरत तत्व- बी मनुक्रमेण ॥ तत्त्वरायर - १७वौं शतादीके एक विख्यात सामिल शैव सकलवपुषि जीवं प्राणमायोज्य मध्ये संन्यासो। इन्होंने तामिन्न भाषा बहतमे ग्रन्य लिखे हैं। न्यमतुमतिमहं कारनत्वं मनश्च । तन्त्ववत् (म० त्रि.) तत्त्व विद्यतेऽय तत्व:मत । कमुख हृदयगुह्यघिष्वथोशब्दपूर्व तत्त्वविशिष्ट, तत्त्वज्ञानमे भरा हुआ। गुणगणमथकर्णादिस्थितं श्रोत्रपूर्व ॥ तत्त्ववाद ! स. पु० ) दश नशास्त्र सम्बन्धी विवार । भागादीन्द्रियवगमात्मनि नमेदाकाशपूर्व गण । तत्त्ववादो (म पु०) तत्त्वं वदति, वद-णिनि। १ यार्थ- मूदास्ये हदये शिरे चरणयो हेनपुण्डरीकं हृदि । वादो, वह जो स्पष्टरूपमे यथार्थ बात कहता हो। शं नम: पराय हृत्पुनरीकतत्वावने नमः इदि। २ वह जो तत्त्ववादका ज्ञाता और समर्थक हो । है नमः पराय द्वादश कलाव्याप्त-सूर्यमण्डलतत्त्वात्मने नमः हृदि। तत्त्वविद् ( म० पु०) १ तत्त्ववेत्ता । २ परमेश्वा । म नम: पराय पोरश हलाव्याप्तसोममाडलतत्त्वात्मने नम: हृदि । तत्त्वविद्या ( म स्त्रो.) दर्शनशास्त्र । रं नमः पराय दशकलाव्याप्तवहिमठ लतत्त्वात्मने नम: हदि। सन्त्ववेत्ता-एक कविका नाम । ये १६२२ ई में हुए थे। षं नमः पराय परमेष्ठितत्त्वात्मने वासुदेवाय नमः मस्तके । तत्त्ववेत्ता ( म० पु० ) १ तत्त्वज्ञानो वह जिसे तत्त्वका म नमः पराय पुरुषतत्वात्मने संकर्षणाय नमः मुखे । जान हो। २ दार्शनिक, दश मशास्त्र का जाता. फिला. लं नमः पराय विश्वतत्वात्मने प्रद्युम्नाय नमा हाद सफर। सं नमः पराय नि तितत्त्वात्मनेऽनिरुद्धाय नमः लिंगे। सत्त्वशास्त्र (स.पु. ल नमः पराय सर्वतत्त्वात्मने नारायणाय नमः पादयो। सत्त्व बहान ( स० क्लो०) जिस वस्तु का जो स्वरूप है सं नमः पराय कोपतत्त्वात्मने नृसिहाय नमः सर्वगात्र । उसका उमो तरहसे श्रद्धान करना। जैन शास्त्रानुसार ५५ तत्त्वानि विन्यस्य प्राणायाम समाचरेत् । (तन्त्रता) मम्यगदृष्टिके यह होता है। इस प्रकार उक्त मन्त्र हारा सर्वाङ्गम न्यास कर प्राणा- तत्त्वमञ्चय ( स० पु. ) बौडशास्त्रका एक भेद । तत्त्वाथ धान--(संलो . ) तस्वश्रद्धान देखो। याम करना चाहिये। यथानियममे तत्त्व याम करने पर समस्त सिद्धि लाभ होता है और वह मनुषा विष्णुको सत्त्वार्थ सूत्र ( स० क्लो. ) जैनधर्म का मूलतत्त्व प्रकाशक सूत्र ग्रन्यविशेष । यह ग्रन्य संस्कृत भाष में लिखा हुआ है खरूपता प्राप्त करता है। काय सपु. ) तत्त्वस्य प्रकाश:, (तत् । तत्त्व- इसमें प्रायः समस्त हो जैनधर्म को हातव्य बातोंका दोपन, तत्त्वज्ञानका प्रामा। उन्लेख है। पाचार्य श्रीउमाम्खामोने से बनाया है। नत्वबोधिनी ( स. स्त्रो. ) वह जिमके दाग तत्त्वज्ञान दिगम्बर खेतांबर दाना मप्रदायवाले कुछ परिवर्तनके उत्पबीता हो। . साथ ममानभावसे उमै मानते हैं। इस के सूत्रांका पाठ करने- तखभाव (स.पु०) प्रकृति, स्वभावं। से एक उपवास करका फल मिलता है। बहुत से जैनी तत्वभाषो ( वि.) तत्त्वं भाषते भाष णिनि यथार्थ- इसका प्रतिदिन पाठ करना अपना कर्तव्य समझते है,